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पढ़ाई अब ज्ञान नहीं, रोज़गार के लिए


विद्यार्थी
अभी भी भारत में कई बच्चे प्राथमिक शिक्षा तक से वंचित हैं
मेरे जन्म के कुछ महीने बाद ही देश को आज़ादी मिली. मैं तब के प्रजातंत्र और अब के प्रजातंत्र के स्वरूप में बहुत ज़्यादा फ़र्क महसूस करता हूँ.

जिन दिनों मैं स्कूल में पढ़ने जाता था तो उस समय शिक्षा में ट्यूशन जैसी कोई बात नहीं थी और तब आज की तरह कोचिंग सेंटर नहीं होते थे.

शिक्षक ट्यूशन पढ़ाते ही नहीं थे. वे कक्षाओं में ही इतने अच्छे ढंग से समझाते थे कि किसी को ट्यूशन करने की ज़रूरत ही नहीं होती थी.

(भारत की आज़ादी के 60 बरस पूरे होने पर हम ऐसे लोगों से आपको रूबरू करवा रहे हैं जो भारत की आज़ादी के साथ-साथ ख़ुद भी 60 वर्ष के हो चुके हैं. इसी श्रंखला में पढ़िए शिक्षा के क्षेत्र में पिछले 60 बरसों के दौरान हुए परिवर्तनों पर प्रोफ़ेसर सचिंद्र नारायण की समीक्षा और दीजिए अपनी राय..)

आज उस तरह के शिक्षक नहीं हैं. मुझे लगता है कि यह शिक्षा और शैक्षिक परिवेश में आया एक बहुत बड़ा बदलाव है.

उस समय ऐसे लोग ही राजनीति में आते थे जिन्हें जनता की सेवा करनी होती थी और वे बाकायदा पढ़े-लिखे भी होते थे. तब कोई भी नेता राजनीति को व्यापार की नज़र से नहीं देखता था.

समय के साथ लोगों की मानसिकता में बदलाव भी आया है, इससे लगता है कि सामाजिक चेतना लुप्त हो गई है और समाज मे विकृति आ गई है.

अब जबकि हम आज़ादी के साठ साल पूरे कर रहें हैं तो हमें सामाजिक मुद्दों पर भी उतना ही ज़ोर देने की ज़रूरत है जितना ज़ोर हम आधारभूत संरचना पर देते हैं.

शिक्षाः बदलते आयाम

एक छात्र और फिर एक शिक्षक के दो रूपों में मैनें समाज में बहुत परिवर्तन देखा और महसूस किया है. यह सारा बदलाव बड़ा ही स्वाभाविक था.

 अब पढाई ज्ञानोन्मुखी न होकर रोज़गारोन्मुखी रह गई है लेकिन इस तरह का बदलाव कोई ग़लत परिवर्तन नहीं है. हालांकि इसके चलते छात्र और शिक्षक के संबंधों में जो परिवर्तन आया है वह ज़रुर ग़लत है

पहले का छात्र अधिक से अधिक पढना चाहता था और ज़्यादा से ज़्यादा विषयों का ज्ञान प्राप्त करना चाहता था लेकिन आज ऐसा नहीं हैं.

अब छात्र ज्ञान हासिल करने की बजाए ऐसे विषय लेना चाहता जिसके ज़रिए उसे रोज़गार प्राप्त हो सके.

अब पढाई ज्ञानोन्मुखी न होकर रोज़गारोन्मुखी रह गई है लेकिन इस तरह का बदलाव कोई ग़लत परिवर्तन नहीं है. हालांकि इसके चलते छात्र और शिक्षक के संबंधों में जो परिवर्तन आया है वह ज़रुर ग़लत है.

विकास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है. भारत में काफ़ी विकास हुआ है. मसलन पहले हम लोग बाँस से कलम बनाते थे और उससे लिखते थे.

उस समय कलम मँहगी होती थी और ख़रीदना कठिन होता था. अब मामूली दामों में कलम मिल जाती है.

आज हमने तकनीक, विज्ञान, कॉमर्स के क्षेत्र में ख़ासी तरक्की हासिल की है. इनसे संबंधित अच्छे पाठ्यक्रम कई कॉलेजों में पढ़ाए जा रहे हैं पर साथ ही कला, साहित्य, भाषा और सामाजिक अध्ययन से जुड़े विषयों के प्रति नई पीढ़ी की रुचि घटी है जो चिंताजनक है.

http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2007/07/070730_60yrs_blog_teacher.shtml

महिला साक्षरता के मामले में उत्तर प्रदेश का देश में ३१ वां स्थान है। लड़कों की प्राथमिक शिक्षा पूरी करने की दर जहाँ 50% है वहीँ लड़कियों की दर सिर्फ 27% ही है। सबसे अधिक वंचित समूह की बालिकाएं दलित व मुस्लिम समुदायों की हैं। राष्ट्रीय जनगणना संसथान के आंकड़ों के अनुसार, मुस्लिम बालिकाओं व ग्रामीण उत्तर प्रदेश की महिलाओं की साक्षरता दर मात्र 26.7% है और सिर्फ 9.6% ही अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी कर पाती हैं। दलित बालिकाओं की ग्रामीण साक्षरता दर अत्यंत ही ख़राब है व 24.6% आंकी गयी है और इनमे केवल 10.4% ही अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी कर पाती हैं।
शिक्षा की असंतोषजनक स्थिति का पता अन आई यू पी ऐ द्वारा जारी किये गए शिक्षा के विकास के सूचकों से ही पता चल जाता है। इन आंकड़ों के अनुसार प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में ३५ राज्यों की सूची में उत्तर प्रदेश का स्थान २७ वां है और उच्च प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में राज्य 30 वें स्थान पर है। राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् की एक ताज़ी रिपोर्ट के अनुसार लगभग 38543 घर बिना प्राथमिक विद्यालयों के हैं या शिक्षा गारंटी योजना के कार्यक्षेत्र से बाहर हैं। उत्तर प्रदेश के लगभग 20 जिलों में साक्षरता दर 50 % से कम है। इसके अलावा हाशिये व वंचित समुदायों के 7.85 लाख बच्चे अभी भी मुख्यधारा से बाहर हैं। दलित व आदिवासी बच्चों के साथ साथ मुस्लिम लड़कियों के नामांकन का स्तर राष्ट्रीय औसत से कम बना हुआ है। साथ ही मुस्लिम बच्चों की एक बड़ी संख्या 15000 से अधिक मदरसों व 10000 से अधिक मख्ताबों में नामांकित हैं। ये दोनों ही प्रकार के औपचारिक व अनौपचारिक विद्यालय धार्मिक शिक्षा व उर्दू सिखाने के लिए राज्य भर में चल रहे हैं. मदरसे, प्रवाह के प्रतिकूल चल रहे संसथान होते हैं जो की गरीब मुस्लिम परिवारों से आनेवाले बच्चों को अस्थिर व अपर्याप्त शिक्षा देते हैं. उनकी स्थिति की अंदाज़ा उनके कमज़ोर बुनियादी ढांचों, पुराने व अप्रचलित अध्यापन, निम्न स्तरीय शिक्षकों व सीखने के अत्यधिक निम्न परिणामों से लगाया जा सकता है ड्रॉप आउट बच्चों की दर चेतावनीपूर्ण है खासतौर पर हाशिये पर रहनेवाले परिवारों के बच्चों की क्यूंकि इन बच्चों के द्रोपौत की दर ऊंची जाती व समुदायों से आनेवाले बच्चों से ज्यादा होती है (4). इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य ये है किऐसे कई बच्चे जो कि सरकारी विद्यालयों से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं वे ठीक से पढ़ लिख नहीं पाते और न ही अंकगणित के साधारण सवाल ही सुलझा पाते हैं। शिक्षा कि इस स्थिति के लिए कई कारक ज़िम्मेदार हैं।(अतुल कुमार श्रीवास्तव)

उत्तर प्रदेश में 92 हजार शिक्षा मित्रों का समायोजन शीघ्र

लखनऊ: प्रदेश के बेसिक शिक्षामंत्री राम गोविन्द चौधरी ने बताया कि विभाग द्वारा अध्यापकों की कमी को दूर करने हेतु प्राथमिकता के आधार पर भर्ती की जा रही है। अभी तक 18,127 अध्यापकों की भर्ती की जा चुकी है। इसके अतिरिक्त 15,000 बी0टी0सी0 अभ्यर्थियों के चयन हेतु विज्ञापन जारी किया जा गया है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2014-15 में प्राथमिक विद्यालयों के लिए 72,825 बी0एड0, टी0ई0टी0 अर्हताधारी प्रशिक्षु की भर्ती की प्रक्रिया गतिमान है।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2014-15 में उच्च प्राथमिक विद्यालयों में विज्ञान/गणित अध्यापकों की सीधी भर्ती हेतु 29,334 पदों पर सीधी भर्ती की प्रकिया गतिमान है। बेसिक शिक्षामंत्री ने बताया कि प्रदेश में 1,65,306 शिक्षा मित्र कार्यरत थे, जिसमें से प्रथम चरण में प्रशिक्षण पूर्ण कर चुके 58,903 शिक्षा मित्रों का सहायक अध्यापक के पदों पर समायोजन किया गया है। द्वितीय चरण में लगभग 92,000 शिक्षा मित्रों का प्रशिक्षण पूर्ण हो चुका है। परीक्षा परिणाम घोषित होने के उपरान्त इनके समायोजन की कार्यवाही की जायेगी। उन्होंने कहा कि विभाग द्वारा शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हेतु प्रत्येक जनपद के प्राचार्य जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी, खण्ड अधिकारी एवं सह-समन्वयक, बी0आर0सी0 द्वारा दो-दो विद्यालय गोद लेने के निर्देश दिए गये है। इस संबंध में जनपदों से सूची एकत्रित की जा रही है। उन्होने बताया कि विद्यालय में पठन-पाठन की समुचित व्यवस्था एवं शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हेतु राज्य स्तरीय, जनपद स्तरीय एवं विकास खण्ड स्तरीय टास्कफोर्स गठित की गई है। सभी अधिकारियों को विद्यालय निरीक्षण के लक्ष्य आवंटित किये गये है, जिसके अनुसार विद्यालयों का निरीक्षण हो रहा है।
उन्होंने बताया कि शिक्षकों की विद्यालयों में शत-प्रतिशत उपस्थित सुनिश्चित करने के निर्देश दिये गये है। जिन जनपदों में बेसिक शिक्षा की प्रगति खराब पाई जायेगी तो वहां के बेसिक शिक्षा अधिकारी के विरूद्ध कठोर कार्यवाही की जोयगी। उन्होंने कहा सभी जनपदों में नियुक्तियों को पारदर्शी तरीके से करने के निर्देश दिये गये हैं जहां कहीं पर भी भ्रष्टाचार की शिकायत प्राप्त होगी वहां कठोर कार्यवाही की जायेगी।(अतुल कुमार श्रीवास्तव)

शिक्षा

केरल की शिक्षा व्यवस्था भारत के अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा आधुनिक है। केरल के विकास मॉडल में शिक्षा और स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण योगदान है। आजादी के बाद से सबसे अधिक परिवर्तन और विकास शिक्षा के क्षेत्र में ही हुए हैं। राज्य में 1956 से अस्सी के दशक के मध्य तक उच्च शिक्षा क्षेत्र के विस्तार और स्तरीय विकास मद्देनजर उदार शिक्षा नीति चलाई। वर्तमान में दूसरे राज्यों की तुलना में यह राज्य उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सबसे आगे हैं, राष्ट्रीय स्तर पर साक्षरता दर जहां 65.38% है वहीं केरल की 90.86%

केरल में स्कूल, कॉलेज राज्य सरकार या फिर निजी संगठन इसका संचालन करते हैं।केरल में स्कूलों को इंडियन सर्टिफिकेट ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (आईसीएसई), सेंट्रल बोर्ड फॉर सेकेंडरी एजुकेशन (सीबीएसई) और केरल राज्य शिक्षा समिति द्वारा मान्यता प्राप्त होते हैं। राज्य का शिक्षा विभाग प्राथमिक शिक्षा पर विशेष ध्यान देता है। केरल के प्राथमिक विद्यालयों में निजी सहायताप्राप्त, निजी गैर सहायताप्राप्त और सरकारी विद्यालय शामिल हैं। राज्य के विद्यालयों को अंग्रेजी और मलयायम दोनों भाषाओं में विद्यालयों में शिक्षा के माध्यम के रूप में चुनने की अनुमति है वैसे अधिकांश निजी विद्यालय अंग्रेजी माध्यम में ही शिक्षा देते हैं। माध्यमिक स्तर की दस साल की शिक्षा के पड़ाव को पार करने के बाद विद्यार्थी उच्च माध्यमिक शिक्षा की पढ़ाई के लिए तीन विषयों विज्ञान, वाणिज्य और मानविकी में से किसी एक विषय का चयन कर सकते हैं। इसके अलावा शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान, शारीरिक रूप से अक्षम लोगों और एंग्लो भारतीय विद्यालय भी मौजूद हैं।

केरल का बेहतरीन शिक्षा तंत्र अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विद्यार्थियों को आकर्षित करता है। राज्य में शिक्षण संस्थानों की संख्या तेजी से बढ़ी है। वर्तमान में (2006-07) यहां 12644 विद्यालय, जिनमें 2790 उच्च विद्यालय, 3037 उच्च प्राथमिक विद्यालय और 6817 छोटे स्तरीय प्राथमिक विद्यालय शामिल हैं। विद्यालयों के विभाजन के दौरान यह बात उल्लेखनीय है कि छोटे स्तरीय प्राथमिक विद्यालयों की संख्या 6861 (1980) से घटकर 6817 (2006-07) हो गई है। इसका कारण जनसांख्कीय तरीकों में बदलाव और राज्य के जन्म वृदिध्‍ दर में आई कमी है। निजी गैर सहायताप्राप्त विद्यालयों में उच्च विद्यालयों को अधिक महत्वपूर्ण है, जिसके अंतर्गत कुल विद्यालयों के 13.12% उच्च विद्यालय हैं। वैसे केरल में इन तीन क्षेत्रों में निजी सहायताप्राप्त विद्यालयों की संख्या तेजी से बढ़ी है। इनमें वर्ष 2006-2007 में निजी सहायता प्राप्त विद्यालयों की संख्या 1428, 1870 निजी उच्च प्राथमिक विद्यालय और 39992 निजी सहायताप्राप्त छोटे स्तरीय प्राथमिक विद्यालय थी।

सत्तर के दशक के बाद जनसंख्या में आई गिरावट के बाद विद्यालयों में विद्यार्थियों के नामांकन संख्या में भी काफी कमी आई। वर्ष 2006-07 की तुलना में 2007-08 में विद्यार्थियों के नामांकन में गिरावट का प्रतिशत 1.97 आंका गया। छोटे स्तरीय प्राथमिक विद्यालयों, उच्च प्राथमिक विद्यालयों और उच्च विद्यालयों में नामांकन का प्रतिशत क्रमश: 31.14%, 31.76%, 31.10% था। केरल में विद्यालय छोड़ने का प्रतिशत काफी कम रहा है, छोटे स्तरीय प्राथमिक विद्यालयों में 0.59%, उच्च प्राथमिक विद्यालयों में 0.52%, उच्च विद्यालयों में 1.29% ही रहा है। वयांद जिले में विद्यार्थियों के विद्यालय छोड़ने का अनुपात(10.65%) सर्वाधिक रहा और इस दृष्‍टि से कसारगोड़ में उच्च प्राथमिक विद्यालयों और उच्च विद्यालयों में यह अनुपात अधिक रहा।

विद्यालयों में कुल नामांकन 49.23% की तुलना में हर कक्षा में लड़कियों की संख्या अधिक होती है। इसके अलावा व्यावसायिक माध्यमिक विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या 469968 है, जिनमें 51.86%संख्या लड़कियों की है और स्नातक तथा स्नातकोत्तर स्तर पर भी लड़कियों का अच्छा-खासा प्रतिशत होता है, जो क्रमश: 67% और 78.2%(2006-07) के लगभग होती हैं। इससे यह तस्वीर साफ होती है कि विश्वविद्यालयीन शिक्षा में भी लड़कियां आगे हैं, इससे साबित होता है कि सरकार भी लड़कियों की शिक्षा पर जोर देती है और उन्हें सामान्य विद्यालयों में पढ़ने के लिए प्रेरित करती है। इससे बढ़कर केरल सरकार महिलाओं की स्थिति में आधारभूत परिर्वतन लाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

शिक्षकों के मामले में यहां टीटीआई शिक्षकों को मिलाकर कुल 1,76,126 शिक्षक हैं। इनमें 31.3% सरकारी क्षेत्र में, 60.72% निजी सहायताप्राप्त विद्यालयों और 7.98% गैर सहायताप्राप्त विद्यालयों में हैं। इन तीनों क्षेत्रों में भी महिलाएं पुरुषों की तुलना में 7.4% (2006-07) आगे हैं। यदि पॉलिटेक्निक की बात की जाए तो राज्य में (2007-08) सरकारी पॉलिटेक्निक की संख्या 43 है और 6 निजी सहायताप्राप्त पॉलिटेक्निक थे। हर साल सरकारी पॉलिटेक्निक में नामांकन लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या 8160 और निजी सहायताप्राप्त पॉलिटेक्निक में यह संख्या 1500 है। यहां भी लड़कियां लड़कों से 10% आगे है और इतने ही अनुपात का अंतर तकनीकी उच्च विद्यालयों में भी है।

तकनीकी शिक्षा व्यवस्था के तहत राज्य में इंजीनियरिंग तकनीक, प्रबंधन और वास्तुकला आदि विषय डिप्लोमा डिग्री, स्नातकोत्तर और शोध स्तर पर शामिल हैं। इंजीनियरिंग महाविद्यालय, तकनीकी उच्च विद्यालय, ललित कला महाविद्यालय, पॉलिटेक्निक महाविद्यालय, सरकारी व्यावसायिक संस्थान, सिलाई एवं परिधान निर्माण केंद्र और व्यावसायिक विद्यालय राज्य के तकनीकी शिक्षा व्यवस्था के अंर्तगत आते हैं। कोझिकोड का राष्ट्रीय तकनीकी संस्थान स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के विषयों की पढ़ाई के लिए मान्य विश्वविद्यालय स्तर प्रदान करता है। कोच्चि की विज्ञान एवं तकनीकी (सीयूएसएटी) को एमएचआरडी, भारत सरकार ने आईआईईएसटी स्तर के लिए चुना है। स्वयं वित्त पोषक संस्थानें भी तकनीकी शिक्षा क्षेत्र में मुख्य रूप से संचालित करती हैं।

वर्तमान में केरल में दो मान्य विश्वविद्यालयों को छोड़कर 7 विश्वद्यालय हैं, जो पूरे देश में मौजूद 297 विश्वविद्यालयों का 2.7% है। 2002 में गैर सहायताप्राप्त महाविद्यालयों को छोड़कर कला और विज्ञान महाविद्यालयों में 1.61 लाख विद्यार्थी अध्ययनरत थे। जिनमें 4 विश्वविद्यालयों में केरल, महात्मा गांधी, कालीकट और कानपुर विश्वविद्यालय में कर्इ तरह के विषय मौजूद हैं और ये सभी सामान्य श्रेणी के हैं। विज्ञान और तकनीकी कोच्चि विश्वविद्यालय (सीयूएसएटी), श्री शंकाराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय और केरल कृषि विश्वविद्यालय जैसे तीन अन्य विश्वविद्यालय राज्य में संचालित हो रहे हैं। श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय और कानपुर विश्वविद्यालय हाल ही में बना है, जिनकी स्थापना क्रमश: 1993 और 1995 में हुई थी। केरल के विश्वविद्यालय अब परंपरागत विषयों से हटकर व्यावसायिक और रोजगारोन्मुखी विषयों को शुरू करने पर जोर दे रहे हैं।

कुल मिलाकर कहा जाए तो विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा में सरकार का योगदान सीमित रहा है और यही वजह है कि 224 महाविद्यालय में से 38 ही सरकारी महाविद्यालय हैं। 66 प्रतिशत महाविद्यालय निजी प्रबंधनों द्वारा संचालित होते हैं,जिससे पता चलता है कि निजी क्षेत्र का एकाधिकार काफी अधिक है और साथ ही निजी सहायताप्राप्त महाविद्यालयों की संख्या भी काफी है। इनके अलावा स्वयं वित्त पोषित या निजी गैर सहायताप्राप्त महाविद्यालयों की संख्या तेजी से बढ़ी है और इनकी संख्या अब राज्य में सरकारी महाविद्यालयों के बराबर यानी 38 हो गई है। यही वजह है कि सहायताप्राप्त महाविद्यालयों में गैर सहायताप्राप्त विषयों की संख्या बढ़ती जा रही है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है राज्य सरकार की योजना। केरल में स्कूली शिक्षा का स्तर सार्वभौमिक है, लेकिन उसके मुकाबले उच्च शिक्षा का फैलाव कम है।

साक्षरता

केरल की संस्कृति में महिलाओं में आदर और उच्च स्तर प्राप्त है। यही वजह है कि विभिन्न संस्कृतियों और परंपराओं के बावजूद यहां देश के अन्य राज्यों के मुकाबले महिलाओं के लिए ज्यादा अवसर हैं।

केरल के इतिहास की समीक्षा की जाए तो समाज में उनके आगे बढ़ने की रफ्तार धीरे भले ही थी लेकिन वह बुद्धिपरक थी। अब वे बच्चे और घर के रोजमर्रा के कामों में अकेली नहीं रह गई हैं। परिवार की जरूरतों को पूरा करते हुए भी वे अपने राज्य और अन्य राज्यों में अपनी एक अलग पहचान और मुकाम हासिल कर रही हैं। हमें ऐसे राज्य पर गर्व होना चाहिए, जहां महिलाओं में साक्षरता दर सर्वाधिक है, स्त्रियों का अनुपात पुरुषों की तुलना में अधिक है, यहां गर्भपात या बालिका भ्रूण हत्या जैसी घटनाएं बहुत ही कम संख्या में होती हैं। केरल से यह बात सामने आती है कि साक्षर पुरुषों की संतानें साक्षर होती है लेकिन साक्षर महिलाएं पूरे परिवार को साक्षर करती है।

राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के तहत साक्षरता दर को 90%तक ले जाने तक की योजना है और इससे पूर्ण साक्षरता को हासिल करने का लक्ष्य रखा गया। इस आधार पर केरल (90.86%) को 18 अप्रैल, 1991 को पूर्ण साक्षर राज्य घोषित कर दिया गया। राज्य में महिलाओं का साक्षरता दर 87.86% है, जो राष्ट्रीय महिला साक्षरता दर (33.7%) की तुलना में कहीं अधिक है। जहां राज्य में पुरुषों को साक्षरता दर 94.2% वहीं महिलाओं का 87.86% है। इससे पता चलता है कि कुल जनसंख्या की तीन चौथाई जनसंख्या साक्षर है और महिला पुरुषों के बीच इस अनुपात का अंतर बहुत अधिक नहीं है। केरल में पुरुष साक्षरता वृद्धि दर 0.58% की तुलना में महिलाओं में साक्षरता वृद्धि दर 1.69% (1991-2001) रही। केरल ने 1951 में जिस स्तर को छू लिया था आज भी देश के कई राज्य वहां तक पहुंचाने के लिए प्रयासरत हैं।

केरल में पुरुष-स्त्री साक्षरता दर के बीच का अंतर तेजी से घट रहा है। उदाहरण के लिए देखा जाए तो 1951 में जहां यह अंतर 21.9% था और 2001 में घटकर यह केवल 6.3 % ही रह गया। राष्ट्रीय स्तर पर 2001 में यह अंतर 21.7%।

महिला साक्षरता दर – केरल, भारत (1951-2001)
वर्ष केरल –महिला साक्षरता (%) पुरुष- महिला अंतर (%) भारत-महिला साक्षरता (%) पुरुष- महिला अंतर (%)
1951 36.43 21.92 7.93 17.02
1961 45.56 19.33 12.95 21.49
1971 62.53 14.6 18.69 20.77
1981 65.73 9.53 29.76 26.62
1991 86.17 7.45 39.29 24.84
2001 87.86 6.34 54.16 21.69

स्रोत: भारत की जनगणना

जिलेवार आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि ‘कोट्टयम’ जिला पुरुष और महिला साक्षरता दर दोनों में सबसे आगे है और यह भारत का पहला ऐसा शहर है जहां सौ प्रतिशत साक्षरता (यह एक उल्लेखनीय कीर्तिमान है जिसे 1989 की शुरुआत में ही बन चुका था) है। स्त्री पुरुष साक्षरता दर पालाकाड जिले में सबसे निम्न है। यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि इस जिले में महिला और पुरुष साक्षरता दर के बीच 10% है। यह अधिक चिंता का विषय नहीं कि है यह जिला विकास के कई मायनों में राज्य के औसत से भी कम है।

अनुसूचित जातियों की जनसंख्या की दृष्टि से यह विभाजन इस प्रकार है 88.1% (पुरुष) और 77.6% (महिलाएं) और अनुसूचित जनजातियों में यह क्रमश: 70.8% और 58.1% था।

केरल के अलग-अलग जिलों में साक्षरता दर
जिले साक्षरता (%)
पुरुष स्त्री
कसारगोड 90.84 79.8
कनूर 96.38 89.57
वयांद 90.28 80.80
कोझिकोड 96.30 88.86
मालापुरम 91.46 85.96
पालाकोड 89.73 79.31
त्रिसूर 95.47 89.94
एर्नाकुलम 95.95 90.96
इदुकी 92.11 85.04
कोट्टयम 97.41 94.45
अलपुंझा 96.42 91.14
पठानमथिटा 96.62 93.71
कोलम 94.63 88.60
तिरुअनंतपुरम 92.68 86.26
केरल 94.20 87.86

स्रोत: भारत की जनगणना, 2001

आंकड़ें बताते हैं कि केरल में महिलाओं की साक्षरता का स्तर समय के साथ सुधरता गया है। इस साक्षरता स्तर को लोगों के स्वास्थ्य से जोड़कर देखा जा सकता है। केरल में जन्म मृत्यु दर काफी कम है और जीवन प्रत्याशा अन्य राज्यों की तुलना में कहीं अधिक है। महिलाओं की साक्षरता दर 36.43% (1951) से 87.86% (2001) तक बढ़ना एक उल्लेखनीय कीर्तिमान है और यह समाज में विकास के लिए एक अच्छे संकेत के रूप में दर्शाता है।

कई स्थानीय असामनाताओं के बीच महिलाओं की साक्षरता जनसांख्यिकीय संकेतों के लिए एक प्रेरणास्रोत है। इन संकेतों की बदौलत केरल में महिलाओं की स्वास्थ्य स्थिति में काफी सुधार आया। महिलाओं की साक्षरता और शिक्षा के कारण ही शिशुओं के मृत्यु दर में कमी, आम स्वास्थ्य और स्वच्छता पर प्रभाव पड़ा है।

स्रोत: आईटी विभाग, केरल सरकार (अतुल कुमार श्रीवास्तव)

शिक्षा : प्राथमिक स्कूलों में डगमगाता देश का भविष्य

शिक्षा का नया सत्र प्रारम्भ हो चुका है। ऐसे में हमारी तैयारी क्या है? क्या हम इस सत्र के लिए तैयार हैं? या हम अब भी वहीं हैं,जहां पिछले वर्ष थे? यह सवाल इसलिए क्योंकि कुछ दिनों पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा जारी की गई रपट डायस(शिक्षा हेतु जिला सूचना व्यवस्था) प्राथमिक शिक्षा की कलई खोलती है और उत्तर प्रदेश की सपा सरकार पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करती है कि आखिर उ.प्र. में प्राथमिक शिक्षा की ऐसी हालत क्यांे? यह रपट बताती है कि प्राथमिक शिक्षा के लिए चलाई जा रही अनेक महात्वाकांक्षी योजनाओं के बावजूद देश में पांचवीं तक के छात्रों की संख्या में पिछले एक साल में ही 23 लाख बच्चों की कमी आई है, जिसमें अकेले उत्तर प्रदेश की कक्षाओं से 7 लाख बच्चे घट गए हैं। रपट की मानें तो देशभर में पांचवीं और आठवीं में क्रमश:13.24 करोड़ और 6.64 करोड़ यानी कुल 19.88 करोड़ बच्चे प्रारम्भिक शिक्षा हासिल कर रहे हैं। लेकिन इतनी बड़ी तादाद में बच्चों का प्राथमिक स्कूल से कम होना सवाल खड़ा करता है कि आखिर इतनी सुविधाओं के बावजूद ऐसा क्यों? कमी कहां हैं? या फिर यह सभी सुविधाएं हवा-हवाई साबित हो रही हैं?

लड़कियों के लिए शौचालय तक नहीं ?
आंकड़े बताते हैं कि देश के 31 प्रतिशत प्राथमिक विद्यालयों में लड़कियों के लिए शौचालय की व्यवस्था नहीं है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय की बेबसाइट पर पड़े आकड़ों पर नजर डालंे तो अभी तक केवल 69 फीसदी विद्यालयों में ही शौचालय की व्यवस्था है। ग्रामीण वातावरण को देखते हुए इस समस्या के कारण अभिभावक लड़कियों को स्कूल जाने से रोक देते हैं, जिससे लड़कियों की पढ़ाई बीच में ही रुक जाती है और वे शिक्षा से वंचित हो जाती हैं। 2013 में यूनीसेफ की टीम ने उ.प्र. के सोनभद्र, चंदोली, भदोही, मिर्जापुर गाजीपुर, मऊ, बांदा सहित कई जिलों का सर्वे किया था। टीम ने इस दौरान पाया कि जहां स्कूल में कुछ स्थान पर शौचालय भी हैं तो वहां साफ-सफाई न के बराबर है,जिसके कारण बीमारी की आशंका से भी लड़कियां शौचालय प्रयोग करने से बचती हैं। ऐसी विषम परिस्थिति में लड़कियों के लिए सामंजस्य बनाना बेहद कठिन होता है।

शिक्षकों की भारी कमी
जब विद्यालयों में शिक्षक ही नहीं होंगे तो बच्चों को पढ़ायेगा कौन और कौन अभिभावक ऐसी स्थिति में अपने बच्चों का यहां दाखिला करवायेगा। गिरते शिक्षा स्तर का प्रमुख कारण शिक्षकों की कमी है। आंकडे़ चौंकाने वाले हैं,क्योंकि देश में कहीं-कहीं तो 200 बच्चों पर 1 शिक्षक ही तैनात है और कहीं-कहीं तो पूरा का पूरा विद्यालय शिक्षामित्र के सहारे ही चलता है। ज्ञात हो कि इस समय देश में 13.62 लाख प्राथमिक विद्यालय हैं। परन्तु इनमें कुल 41 लाख शिक्षक ही तैनात हैं,जबकि देश में अनुमानित 19.88 करोड़ बच्चे प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ रहे हैं । साथ ही पूरे देश में करीब 1.5 लाख विद्याालयों में 12 लाख से भी ज्यादा पद खाली पड़े हैं। इस कारण करीब 1 करोड़ से ज्यादा बच्चे विद्याालयों से बाहर हैं। प्रतिभाशाली शिक्षकों के अभाव का ही परिणाम है कि उत्तर प्रदेश सहित कई प्रदेशांे के बच्चों के सीखने,पढ़ने व समझने के स्तर में बराबर गिरावट हो रही है। इन विद्यालयों के कक्षा छ: तक के बच्चे ठीक से जोड़-घटाना और गुणा-भाग तक नहीं कर पाते हैं। इन परिस्थितियों में समझा जा सकता है कि प्राथमिक शिक्षा की ढांचागत गुणवत्ता,शिक्षण-प्रशिक्षण तथा शिक्षा की गारन्टी जैसे लक्ष्यांे की वास्तविक दशा का हश्र क्या हो सकता है।
संचार प्रौद्योगिकी की हालत
मानव संसाधन विकास मंत्रालय की बेबसाइट पर इसे लेकर आंकड़े तो ढेर सारे पड़े हैं पर वे हकीकत से कोसों दूर हैं। प्राथमिक विद्यालयों के बच्चे इस क्रान्ति से कितने परिचित हैं इसे लेकर मन डगमगाने लगता है। केन्द्र सरकार द्वारा कुछ शहरी क्षेत्रों के विद्यालयों के लिए कम्प्यूटर आए भी हैं तो वे स्कूल में न होकर ग्राम प्रधान या फिर हेडमास्टर साहब के घर की शोभा बढ़ाते हैं और धोखे से स्कूल में पहुंच भी गए तो भाषा शिक्षक की अनुपलब्धता एवं विजली न आने के कारण धूल ही फांकते रहते हैं ।
मध्याह्न भोजन से चौपट होती पढ़ाई !
सरकार ने यह योजना इसलिए चलाई थी कि गरीब बच्चों को पोषकतत्व युक्त भोजन मिलेगा, जिससे उनके शारीरिक एवं मानसिक विकास में वृद्धि होगी। पर हकीकत में इस योजना से नुकसान ज्यादा हो रहा है। असल में सरकार बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए प्राथमिक व उच्च प्राथमिक बच्चे के लिए 100 से 150 ग्राम प्रतिदिन मीनू के अनुसार भोजन की व्यवस्था करती है, लेकिन जब पाञ्चजन्य ने इस बारे अध्यापकों से इस योजना पर राय जानी तो उन सभी का मानना है कि यह योजना पूरी तरह से दलाली और भ्रष्टाचारियों के चुंगुल में फंसी है और इससे बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह बर्बाद हो रही है। बच्चे पढ़ने के लिए कम सिर्फ भोजन के समय खाने में ज्यादा रुचि दिखाते हैं। ज्यादातर विद्यालयों में तैनात एक दो अध्यापक पल्स पोलियो, जनगणना, चुनाव जैसे तमाम गैर शैक्षिक कार्यों में लगे रहते हैं और बाकी समय बच्चों के मध्याह्न भोजन में। खाना बनाने के लिए सरकार द्वारा बच्चों के हिसाब से कार्य करने वालों की व्यवस्था की गई है पर हकीकत में इतना सारा काम किसी एक के वश की बात नहीं। लिहाजा बच्चे भी इसमें हाथ बंटाते रहते हैं। असल में यह योजना विद्यालयों में भ्रष्टाचार का एक जरिया है। स्कूलों को मिलने वाला राशन खाद्य निगम या कोटेदार उपलब्ध कराता है। कोटेदार और प्रधानाध्यापक की इसमें सांठगांठ रहती है और पहले तो राशन में ही घोटालेबाजी होती है तथा दूसरी ओर भोजन में अन्य सामान बनाने से लेकर अन्य चीजों का पैसा ग्राम प्रधान के ‘कनवर्जन कास्ट’ के तहत भुगतान होता है,जो स्कूल का प्रधानाध्यापक चेक बनाकर देता है। अब यहां भी ग्राम प्रधान और प्रधानाध्यापक के बीच जमकर बंदरबांट होती है। ऐसे हालात में पढ़ाई कहीं गुम सी होती जा रही है।
पेयजल व बैठने की व्यवस्था तक नहीं
यूनीसेफ की रपट बताती है कि देश के 30 फीसदी से अधिक विद्यालयों में पेयजल की व्यवस्था ही नहीं है। साथ ही 40 से 60 फीसदी विद्यालयों में खेल के मैदान तक नहीं हैं। पिछले दिनों देश की शीर्ष अदालत के सामने केन्द्र में रही कांग्रेस सरकार खुद बता चुकी है कि देश में अब भी लगभग 1800 से अधिक स्कूल टेंट और पेड़ों के नीचे चल रहे हैं। 24 हजार विद्यालयों में पक्के भवन नहीं हैं, जो बच्चे पढ़ने के लिए आते भी हैं वे घर से ‘बोरी या टाट पट्टी’ लेकर आते हैं। ऐसे में समझा जा सकता है कि हमारे देश के प्राथमिक विद्यालयों का स्तर क्या है और ऐसे में किन परिस्थितियों में पढ़ाई होती होगी दिन में तारे देखने जैसा है।
निजी विद्यालयों की ओर बढ़ता मध्यवर्ग
प्राथमिक शिक्षा की गिरती साख का ही परिणाम है कि शिक्षा का निजीकरण हो रहा है। इसका परिणाम है कि ग्रामीण क्षेत्रों में जो असहाय एवं वंचित-गरीब वर्ग है वह इससे बेदखल होने को मजबूर है। जिनके पास पैसा और सभी प्रकार से समृद्ध हैं वे अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम और मिशनरी स्कूलों में पढ़ा रहे हैं पर जिनके पास पैसा नहीं है उनके नौनिहाल पढ़ाई छोड़कर खेत-खलिहान में धान लगाने और पिपरमिंट लगाने में अपने पढ़ाई-लिखाई के दिनों को जाया कर रहे हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि गरीब-अमीर के शैक्षणिक स्तर में गहरी विषमता उत्पन्न हो रही है। यूनेस्को की जिस रपट में कहा गया है कि दुनिया में सबसे ज्यादा वयस्क निरक्षर भारत में हैं, वह उस सच की ओर ध्यान दिलाती है, जिस पर राज्य सरकारें परदा डाले रहती हैं। इनकी शिक्षा की उदासीनता और ठोस नीति न होने से यह खाई दिनो-दिन चौड़ी होती जा रही है।
अपने समाज की सच्चाई
प्राथमिक विद्यालयों की शिक्षा की बद से बदतर हालत के लिए कुछ हदतक हमारा समाज भी जिम्मेदार है। इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि देश के अधिकतर अभिभावक मौजूदा दौर को देखते हुए अपने बच्चों को तो अंग्रेजी माध्यम या फिर मिशनरी स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं,लेकिन ठीक इसके विपरीत अभिभावक स्वयं प्राथमिक स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं। इसके पीछे कारण है, क्योंकि प्राथमिक स्कूल में पढ़ाई के अलावा और सभी कार्य होते हैं और आप दबाव वाले हैं तो घर बैठ कर सरकारी पैसों पर मौज कर सकते हैं। बच्चों को वे यहां इसलिए नहीं पढ़ाते क्योंकि यहां पढ़ाई न के बराबर होती है। ऐसे में वे अपने बच्चों को जो बनाना चाहते हैं वह इन परिस्थितियों में रहकर बना नहीं सकते। क्योंकि अंगे्रजी एवं मिशनरी स्कल में शिक्षा का जो अत्याधुनिक रूप है उसके सामने गावों की प्राथमिक शिक्षा कहीं भी नहीं टिकती।
गांव-गाव तेजी से फैलती अंग्रेजी व मिशनरी शिक्षा के सामने सरकारी प्राथमिक शिक्षा की हालत देखते ही बनती है। शिक्षा का अधिकार व मध्याह्न भोजन की योजना के बाद भी हम सही ढंग से खड़े नहीं हो पा रहे हैं। यदि हमारी विद्यालयी शिक्षा की यह दशा है तो शिक्षा के समग्र स्तर पर उत्कृष्टता की उम्मीद कैसे की जा सकती है? सरकारी विद्यालयों से मिशनरी व अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में बच्चों का लगातार पलायन देश में बुनियादी सरकारी शिक्षा की दरकती दीवारों का साफ संकेत दे रही है। इस सच से इंकार नहीं किया जा सकता कि मध्याह़्न भोजन, वेशभूषा, साइकिल, पुस्तकों के लालच में कुछ प्रवेश तो बढ़ सकते हैं लेकिन हकीकत में प्राथमिक शिक्षा की दशा कुछ और ही है।

जनसरोकार से जुड़े प्राथमिक शिक्षा

प्राथमिक शिक्षा के गिरते स्तर पर राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद(एनसीईआरटी) के पूर्व निदेशक जे.एस.राजपूत ने पाञ्चजन्य से बात करते हुए कहा कि अनेक योजनाओं के बावजूद प्राथमिक स्कूल के बच्चों का स्तर लगातार घट रहा है। सरकारी आंकड़े यह जरूर बताते हैं कि समय-समय पर इन विद्यालयों में बच्चों की संख्या में बढ़ोतरी तो होती है, लेकिन गुणवत्ता क्या है,उसपर चुप्पी साध लेते हैं। शिक्षा का अधिकार कानून को चार साल गुजर जाने के बाद भी वह पूरी तरह से असफल रहा है। शिक्षा में फैलते भ्रष्टाचार की हालत यह है कि हरियाणा और म. प्र. के भूतपूर्व मंत्री जेल में हैं। यह हालत किसी एक प्रदेश की नहीं है,अपितु अधिकतर प्रदेशों में ऐसे लोगों का बोलबाला है। ऐसे में जब बड़े-बड़े लोग भ्रष्टाचार में संलिप्त होंगे तो छोटे अधिकारियों से क्या उम्मीद रखी जाए। मेरा मानना है कि अगर उच्च पद पर आसीन राजनेता एवं शिक्षा विभाग के अधिकारी ईमानदार हैं तो निश्चित रूप से शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा और भ्रष्टाचार पर लगाम कसेगी। साथ ही अगर सरकार को प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति सुधारनी है तो वह स्थानीय स्तर पर जनता का सहयोग ले और उन्हें बताए कि स्कूल उनका है और उन्हें ही संभालना है। सरकार द्वारा इन विद्यालयों को पर्याप्त धन मुहैया कराया जाए। प्रतिदिन निरीक्षण की व्यवस्था हो एवं शिक्षा के नाम पर लोकलुभावन योजनाओं के द्वारा छात्रों को बरगलाया न जाए।
पहले सीटैट, अब किनारा
केंद्रीय प्रशासनिक पंचाट (कैट) ने केन्द्र व दिल्ली सरकार से शिक्षक नियुक्ति में सीटैट की अनिवार्यता में छूट देने का निर्देश दिया है। इस आदेश का मतलब साफ है कि कि अब सीटैट के बगैर भी आप शिक्षक बन सकते हैं । लेकिन सवाल इस बात का है कि अभी कुछ वर्ष पूर्व सरकार ने शिक्षक बनने के लिए इस परीक्षा को आधार बनाया और इसी के चलते देश के राज्यों में अध्यापक पात्रता परीक्षा की शुरुआत हुई। राज्य सरकारें इसी परीक्षा को आधार बनाकर शिक्षकों की नियुक्त कर रहीं हैं। ऐसे में आगे चलकर राज्यों में भी टेट परीक्षा समाप्त करने की मांग उठेगी। ऐसे में इसको उत्तीर्ण करने वाले स्वयं को ठगा महसूस करेंगे और बाकी उम्मीद करेंगे।
(अतुल कुमार श्रीवास्तव)(पांचजन्य)

स्कूली शिक्षा का गिरता स्तर : दोषी कौन?

स्वयंसेवी संगठन प्रथम ने हाल ही में प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर जो रिपोर्ट जारी की है उसके अनुसार शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के तीन साल बाद भी प्राथमिक शिक्षा के स्तर में कोई परिवर्तन नजर नहीं आता हैं बल्कि साल दर साल स्थिति और भी बदतर होती जा रही है। रिपोर्ट में बताया जा रहा है कि ग्र्रामीण विद्यालयों में कक्षा पॉच के विद्यार्थीं न तो गणित का साधारण सा जोड़-घटाना कर सकते हैं और न ही मात्र भाषा में लिख पढ़ पाते हैं। वैसे स्वयंसेवी संगठन प्रथम ने यह रिपोर्ट प्राथमिक विद्यालयों के संदर्भ में जारी की है लेकिन देश के ग्रामीण क्षेत्र के माध्यमिक स्कूलों के छात्रों की स्थिति भिन्न नहीं है। क्योंकि आठवीं कक्षा का विद्यार्थी भी गणित और भाषाई ज्ञान के मामले में पॉचवीं के बच्चों से कुछ अलग नहीं है। स्वयंसेवी संगठन प्रथम की रिपोर्ट के बाद शिक्षा का अधिकार अधिनियम के आलोचक यह कह सकते है कि प्राथमिक विद्यालयों में परीक्षाएॅ न होना इसकी वजह है।क्योंकि शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अनुसार किसी विद्यार्थी को अगली कक्षा में प्रोन्नत करने से नहीं रोका जा सकता है। मगर शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू हुए अभी सिर्फ तीन ही वर्ष हुए है और शिक्षा का स्तर कई वर्षों से लगातार गिरता जा रहा है। जहॉ जक परीक्षा की बात है तो प्राथमिक शिक्षा के संदर्भ में सिर्फ परीक्षा को शिक्षा के स्तर की सुधार की कसौटी नहीं माना जा सकता है क्योंकि प्राथमिक शिक्षा बच्चे को सीखने का प्रथम अवसर प्रदान करने वाला एक माधयम है।और इसमें गणित और भाषा का ज्ञान आसानी से कराया जा सकता है।चूॅकि इस उम्र के बच्चे में सीखने और ग्रहण करने की क्षमता अधिक होती है अत: बच्चों की क्षमता या ग्रामीण वातावरण को भी दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।

जहॉ तक फण्ड की बात है तो सन् 2004 में केंद्र सरकार का प्राथमिक शिक्षा पर बजट जहॉ मात्र 5,700 करोड़ रूपये था जो सन् 2012में बढ़कर 49,000 करोड़ रूपये हो गया।जब केंद्र सरकार ने प्राथमिक शिक्षा पर अपना आवंटन लगभग दस गुना बढ़ा दिया तो इसके परिणाम भी बांछित मिलना थे लेकिन हुआ उल्टा ?अब इसमें दोषी कौन? प्राथमिक शिक्षा की बेहतरी के लिए साल दर साल बजट आवंटन बढ़ाने वाला मानव संसाधान विकास मंत्रालय?या शिक्षा के अधिकार कानून को गढ़ने वाले देशभर के शिक्षाविद ?या फिर प्राथमिक शिक्षा  व्यवस्था की कमान संभालने वाली राज्य सरकारें?निश्चित रूप से इसकी जिम्मेदारी राज्य सरकारें पर ही डाली जानी चाहिए क्योंकि केंद्र सरकार से मिलने वाले भारी बजट का वो सदुपयोग नहीं कर पायीं। आज सारे देश के प्राथमिक विद्यालयों में दस लाख से अधिक शिक्षकों के पद रिक्त है। राज्य सरकारें केंद्र से इस मद का हिस्सा तो पूरा लेती है लेकिन बच्चों को पढ़ाने का काम दैनिक मजदूरी से  भी कम मानदेय पर रखे गए अतिथि शिक्षकों के भरोसे डाल दिया जाता है। प्रदेश सरकारों का सारा ध्यान इस बात पर केंद्रित रहता है कि सस्ते से सस्ते शिक्षक कैसे नियोजित किए जाए लेकिन इसके कारण शिक्षा का स्तर कैसा होगा इसकी चिंता  न तो राजनेता करते है और नहीं अधिकारी? अभी मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के शिक्षकों द्वारा वर्षों से मिल रहे अल्प वेतन से व्यथित होकर चलाए जा रहे आंदोलन की चर्चा सुर्खिंयों में है। अपने वेतन को बढ़ाने की मॉग पर आंदोलनरत शिक्षक सरकार पर आरोप लगाते हैं कि सरकार का धयान सरकारी स्कूलों की बेहतरी में नहीं है। और वो इसे और पंगु बना बनाना चाहती है ताकि ज्यादातर पालक निजी संस्थाओं की चले जाए।आंदोलनकारि शिक्षकों के नेता बतलाते हैं कि प्रदेश सरकार केंद्र से उनके हिस्से का पूरा वेतन लेकर उसे लोकलुभावन योजनाओं में बांटती है ताकि वोटबैंक मजबूत हो जाए।वास्तव में म.प्र. और छत्तीसगढ़ के आंदोलनकारी शिक्षकों के शोषण और केंद्र से प्राप्त राशि के दुरूपयोग की खबरों को मानव संसाधान मंत्रालय को संज्ञान में लेना चाहिए क्योंकि ये मुद्दे शिक्षा के स्तर से जुड़े हुए है।शिक्षा के अधिकार कानून के मुताबिक शिक्षकों के पदों की पूर्ति के लिए निर्धारित समय सीमा 31 मार्च आने में मात्र दो माह शेष है लेकिन अकेले म.प्र. के प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों के लगभग एक लाख पद रिक्त हैं।प्रदेश के हजारों स्कूल अतिथि शिक्षकों के हवाले है। प्रदेश में केंद्र सरकार द्वारा प्राथमिक शिक्षा की बेहतरी के लिए आवंटित धानराशि का भारी दुरूपयोग के अनेक मामले सामने आ रहें हैं।म.प्र. में शिक्षा विभाग द्वारा करोड़ों की राशि से देवपुत्र नामक अनजानी सी पत्रिका खरीदे जाने की बात भी चर्चा में है। ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूल शिक्षक विहीन तो है ही साथ ही सुविधा विहीन भी है।बैठने के लिए बेंचें नहीं है पीने पानी नहीं हैं और शौचालय तो दूर की बात है।पढ़ाई के मुद्दे पर शिक्षक बतलाते हैं कि उनका अधिकांश समय मध्यान्ह भोजन की व्यवस्था में गुजरता है, क्योंकि यह संवेदनशील मुद्दा और इसमें ढील मतलब बच्चों की जान पर बाजी। मधयान्ह भोजन की कथा व्यथा ही अलग है यह बहुत ही गंदी परिस्थितियों मे तैयार किया जाता है, इसके लिए न तो व्यवस्थित किचन है और न ही प्रशिक्षित रसोईये और इसमें अक्सर छिपकली और कीड़ें निकलते रहतें हैं जिसकी जिम्मेदारी भी शिक्षकों की रहती है।

वास्तव में प्राथमिक शिक्षा का स्तर लगातार गिरते जाना चिंतन का विषय हैं और इसमें राज्य सरकारों की ढील ज्यादा समझ में आती हैं। अगर राज्य सरकारें स्कूलों में सुयोग्य शिक्षकों की तैनाती करें उन्हें सम्मानजनक वेतन दे,विद्यालयों में मूलभूत सुविधाओं की पूर्ति करें और रोचक पाठयसामग्री को पढ़ाई में शामिल छात्रों के शैक्षणिक स्तर में सुधार अवश्य होगा।शिक्षा का अधिकार अधिनियम तो शैक्षणिक सुधार की गारण्टी है बशर्ते इसके अनुरूप व्यवस्था और क्रियान्वयन होना चाहिए।  (अतुल कुमार श्रीवास्तव)

अन्य उपयोगी सम्पर्क

एम. आइ. ई. (www.pil-network.com/
educators/expert)
टूल्स फॉर टीचर/ स्टूडेंट (www.pil-network.com)
यूनिसेफ (www.unicef.org)
एन॰ यू॰ ई॰ पी॰ ए(www.nuepa.org)
एन॰ सी॰ ई॰ आर॰ टी (ncert.nic.in)
मा० सं० वि० मं० (mhrd.gov.in)
एन॰ सी॰ टी॰ ई(www.scertup.org)
डी. ई॰ ई (mhrd.gov.in)
सर्व शिक्षा अभियान (ssa.nic.in)
एन॰ बी॰ टी(www.nbtindia.gov.in)
राष्ट्रीय साक्षरता मिशन(nlm.nic.in)
ए॰ एस॰ जी (agvv.up.nic.in)
डी॰ आई॰ एस॰ ई -२००१(www.dise.in)
डी॰ आई॰ एस॰ ई सॉफ्टवेयर(www.dise.in/
dise.html)
स्कूल रिपोर्ट कार्ड(www.schoolreportcards.in/
adsearch09.html)