कब होगा पूरा सपना

तुल कुमार श्रीवास्तव

सर्व शिक्षा अभियान एक समयबध्द एकीकृत योजना के रूप में राज्य सरकारों के सहयोग से सब तक प्रथामिक शिक्षा पहुंचाने के दूरगामी लक्ष्य प्राप्त करने की एक ऐसी ऐतिहासिक पहल हैं। जो देश की प्राथमिक शिक्षा का रूप बदल देने के लिए प्रतिबध्द है और जिसका उद्देश्य 6-14 वर्ष के आयु के सभी बच्चों को उपयोगी और गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा दिलवाना हैं। एसएसए को प्राथमिक शिक्षा के 2007 तक एंव बुनियादी शिक्षा के 2010 तक सर्वत्रीकरण कर लेने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। बाद में इसकी समयसीमा को 2012 तक बढ़ा दिया गया। वर्ष 1998 में राज्यों के शिक्षामंत्रीयों के सम्मेलन में दिए गए सुझावों के आधार पर 2001 में सर्व शिक्षा अभियान को शुरू किया गया था।

यद्पि 2002 में किए गए 86वें संविधान संशोधन में बुनियादी शिक्षा को मूलभूत अधिकार बना दिया गया। नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने के प्रानधान को लागू करने के लिए बच्चों को नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार का अधिनियम संसद से अगस्त 2009 तक पारित नहीं कराया जा सका था। वर्ष 2001 सर्व शिक्षा अभियान को लागू किए जाते समय 6-14 आयु वर्ग के 3.40 करोड़ बच्चे स्कूल नहीं जा रहे थे। इसके चार वर्ष बाद 85 प्रतिशत आंवटित धनमाशि खर्च होने के बावजूद 40 प्रतिशत बच्चे (1.34 करोड़) बच्चे स्कूल से बाहर रह गए थे।

वर्ष 1999-2000 से 2009-10 तक के केन्द्रीय बजटों में लगभग 57,000 करोड़ रूपये एसएसए के लिए आंवटित किए गए थे। पर देश को विश्व में बच्चों की शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी बनाने के लिए आधारभूत संरचना तैयार करने,प्रशिक्षित अध्यापकों की उपलब्धता और शिक्षक-छात्र अनुपात में भी कमी लाने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी हैं। चूंकि ईएफए ग्लोबल मॉनीटरिंग रिपोर्ट 2010, यूनेस्को के अनुसार भारत का स्थान 128 देशों में 105 वां है। और अपना देश अभी भी आंकड़ों के अनुसार कुछ अफ्रीकी देशों जैसे पाकिस्तान और बांग्लादेश के उस वर्ग में है जिसका शैक्षिक विकास सूचकांक (ईडीआई) कम है।

भारतीय ‘भविष्य’ के कुचलते सपने…

अतिया फिरदोस

“मूनमून क्या कर रही हो? जल्दी से जलावन के लिये लकड़ियां चुन के ले आ… बहुत देर हो गयी है. आज घर में कुछ बनेगा भी कि नहीं…” परेशान आवाज़ में मूनमून की माँ मूनमून को आवाज़ लगा रही थी.

मूनमून ग्यारह साल की बच्ची थी. वह दरवाजे पर खेल रही थी. माँ के ये आवाज़ सुनते ही वो मन मसौस कर जलावन चुनने निकल पड़ी. जिस रास्ते से मूनमून लकड़ी चुनने जाती थी, वही रास्ता एक सरकारी स्कूल की तरफ भी जाता था.

मूनमून रोज़ बहुत सारे बच्चों को स्कूल जाते देखती थी. उसका भी मन उन बच्चों को स्कूल जाते देख स्कूल जाने को करता था. वह कई बार अपनी माँ से ये पूछा भी करती थी कि वह स्कूल क्यों नहीं जाती. माँ का हमेशा एक ही जवाब होता – “अगर तुम स्कूल जाओगी तो खाना बनाने के लिये जलावन कौन लाएगा? घर के और घरेलू काम कौन करेगा? पढ़ने लिखने से घर थोड़े न चलता है…”

मूनमून की तरह न जाने ऐसे कितने ही बच्चे होंगे जो शिक्षा से महरूम हैं. ज़का सोचिए! भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के लिये ये कितने शर्म की बात है कि 3 मिलियन बच्चे रोड पर रहने को मजबूर हैं. 150 मिलियन से अधिक बच्चे किसी न किसी तरीके से बाल मजदूरी का शिकार हैं. इतना ही नहीं, हर छह लड़कियों में से एक अपना पन्द्रहवां जन्मदिन कभी नहीं मना पाती.

ये कितना हास्यप्रद है कि बाल शिक्षा के राष्ट्रीय नीति होने के बावजूद देश में केवल 50 फीसदी बच्चे ही शिक्षा ग्रहण कर पाते हैं. हम सशक्त भारत का सपना देखते हैं, लेकिन ये कैसे मुमकिन है कि देश के बच्चे को इतने बड़े पैमाने पर शिक्षा से महरूम रखकर हम ये सपना देखें. नेता से लेकर आमलोग ये कहते मिल जाते हैं कि “बच्चे देश का भविष्य हैं” ये कैसे देश का भविष्य बनायेंगे, जब इनका ही कोई भविष्य नहीं है.

सरकारी आंकड़ों के हिसाब से सितम्बर 2004 तक छह से चौदह आयु वर्ग के 193 मिलियन बच्चे इस देश में रहते थे, जिनमें से 8.1 मिलियन बच्चे का किसी भी स्कूल में नाम था ही नहीं. प्राईमरी स्कूल की बात अगर छोड़ दी जाए, तो 193 मिलियन बच्चों में से केवल 30.5 बिलियन बच्चे ही आगे की पढ़ाई कर पाते हैं. यह आंकड़े पुराने ज़रूर हैं, पर सच्चाई इन आंकड़ों में ही छिपी हुई है. हालात में कुछ खास बदलाव नहीं आ पाया है. जबकि इस देश में 6 से 14 साल के बच्चों के लिये मुफ्त शिक्षा अनिवार्य है. मुफ्त शिक्षा के साथ-साथ मध्याह्न भोजन भी मुफ्त दिया जाता है.

कभी आपने सोचा है कि शिक्षा की इस बदहाली की असल वजह क्या है? नहीं ना… तो आईए ज़रा इस पर गौर करते हैं. हम जानते हैं कि रोटी, कपड़ा और मकान हमारी मूलभूत आवश्यकता है और हमेशा रहेंगी. इसके आभाव में आदमी न एक क़दम चल सकता है न ही कोई क्रांतिकारी विचारों का सृजन कर सकता है. रोटी, कपड़ा और मकान की आवश्यकता पूर्ण होने के बाद इंसान की पहली आवश्यकता शिक्षा ही होती है. परन्तु अगर मनुष्य उन्हीं तीन मूलभूत आवश्यकता में सिमटा रहेगा तो शिक्षा के बारे में कैसे सोच सकेगा?

सरकार को सबसे पहले लोगों की जीवन शैली को ऊँचा उठाना होगा. ज़रूरतमंद लोगों को मूलभूत अवश्यकता को पूरा करना होगा. तभी लोग अपने बच्चे को स्कूल भेजने का साहस जुटा पाएंगे.

दूसरी अहम वजह हमारी स्कूली शिक्षण व्यवस्था है. जिसकी बदहाली शायद ही किसी से छुपी हुई है. आज भी अगर कोई आराम-तलब नौकरी है तो वो सरकारी स्कूल के शिक्षक की हैं. शिक्षक होते हैं तो बच्चे नदारद, बच्चे होते हैं तो शिक्षक नदारद….

सरकारी स्कूलों में शिक्षा-मित्रों की धांधली पूर्वक नियुक्ति ने भारतीय शिक्षण व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल खड़ा किया है. कई अयोग्य शिक्षक आनन-फानन में भर्ती कर लिये गये हैं, जो अंततः बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ ही करेंगे. सरकारी स्कूल की इन्हीं लचर व्यवस्था की वजह से समाज का तथाकथित संभ्रांत परिवार अपने बच्चों को कभी भी यहाँ नहीं पढ़ाना चाहता. संभ्रांत परिवार तो दूर की बात है, खुद सरकारी शिक्षक भी अपने बच्चों को अपने ही स्कूल में पढ़ाने से कतराते हैं.

जेएनयू में समाजशास्त्र विषय में शोध कर रहे संजय कुमार का कहना है कि शिक्षा को लेकर समाज में अभी भी पर्याप्त जागरूकता नहीं आयी है. उनका कहना है कि शिक्षा की हालत गाँवों में बेहद दयनीय है. बच्चे खासकर लड़कियां वहां उच्च शिक्षा लेने से पहले ही स्कूल से नाम कटवा लेती हैं. इसकी एक वजह यह है कि यहां कम उम्र में ही उनकी शादी करवा दी जाती है या फिर उसे घर के कामों में लगा दिया जाता है. समाज में स्त्रियों की शिक्षा के प्रति उदासीन भाव भी चिंता का एक विषय है.

संजय बताते हैं कि भारत में 5 से 9 वर्ष की आयु समूह की लड़कियों में से 53 प्रतिशत अशिक्षित है. वो शिक्षक छात्र अनुपात पर भी चिंता जाहिर करते हुए बताते हैं कि हमारे देश के 60 प्रतिशत स्कूलों में कक्षा 1 से 5 तक केवल 2 शिक्षक ही मौजूद हैं. यही नहीं, कई गांवों में आज भी स्कूलों का काफी अभाव है. ज़्यादातर गांव में स्कूल दूर-दूर होते हैं, जिनकी वजह से बच्चे लगातार स्कूल नहीं जा पातें.

संजय बताते हैं कि स्कूलों में साफ सफाई का स्तर भी बहुत निम्न किस्म का होता है. खासकर लड़कियों के लिये अलग से शौचालय का निर्माण बेहद ज़रुरी है. बहुत सारे स्कूलों में शौचालय उपयोग करने लायक है ही नहीं. इससे लड़कियों में असुरक्षा की भावना भी उभरती है और स्कूल जाने से कतराती हैं.

मूनमून की तरह लाखों लड़कियां पढ़ना चाहती हैं… कुछ बनना चाहती हैं… परन्तु सरकार और समाज की इन्हीं विसंगतियों की वजह से वो पढ़ नहीं पाती हैं. हम युवा आबादी पर गर्व करते हैं. बहुतेरे का मानना है कि इन्हीं युवा आबादी की बदौलत भारत पूरे विश्व पर छा जाने का माद्दा रखता है. लेकिन अगर आज के बच्चे शिक्षित नहीं होंगे तो कल यही युवा आबादी भारत पर बोझ बन जयेगी. अपर्याप्त शिक्षा इन्हें गलत रास्ते पर ले जा सकती है. अपूर्ण शिक्षित बच्चे भविष्य में ऐसे बेरोज़गार युवाओं की फ़ौज तैयार हो सकती है,जिनकी कार्य क्षमता नगण्य होगी. ये भारत जैसे विकासशील से विकसित देश बनने की चाह रखने वाले देश के लिये कतई शुभ संकेत नहीं है।

http://beyondheadlines.in/2015/01/education-2/

शिक्षा का अधिकार अधिनियम

शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 की मुख्य विशेषताएं
बच्चो के लिए मुक्त तथा अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम की मुख्य विशेषताएं निम्न है
 भारत के छह से 14 वर्ष आयु वर्ग के बीच आने वाले सभी बच्चो को मुक्त तथा अनिवाय शिक्षा
 प्राथमिक शिक्षा खत्म होने से पहले किसी भी बच्चे को रोका नही जाएगा, निकाला नही जाएगा या बोर्ड परीक्षा पास करने की जरूरत नही होगी।
 ऐसा बच्चा जिसकी उम्र 6 साल से ऊपर है, जो किसी स्कूल मे दाखिल नही है अथवा है भी, तो अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी नही कर पाया/पायी है, तब उसे उसकी उम्र के लायक उचित कक्षा मे प्रवेश दिया जाएगा; बशर्ते की सीधे तौर से दाखिला लेने वाले बच्चों के समकक्ष आने के लिए उसे प्रस्तावित समय सीमा के भीतर विशेष ट्रेनिंग दी जानी होगी, जो प्रस्तावित हो। प्राथमिक शिक्षा हेतु दाखिला लेने वाला/वाली बच्चा/बच्ची को 14 साल की उर्म के बाद भी प्राथमिक शिक्षा के पूरा होने तक मुक्त शिक्षा प्रदान की जाएगी।
 प्रवेश के लिए उर्म का साक्ष्य प्राथमिक शिक्षा हेतु प्रवेश के लिए बच्चे की उर्म का निर्धारण उसके जन्म प्रमाण पत्र मृत्यु तथा विवाह पंजीकरण कानून, 1856 या ऐसे ही अन्य कागजात के आधार पर किया जाएगा जो उसे जारी किया गया हो। उर्म प्रमाण नही होने की स्थित में किसी भी बच्चे को दाखिला लेने से वंचित नही किया जा सकता।
 प्राथमिक शिक्षा पूरा करने वाले छात्र को एक प्रमाण पत्र दिया जाएगा;
 एक निश्चित शिक्षक छात्र अनुपात की सिफारिश;
 जम्मू-कश्मीर को छोड़कर समूचे देश में लागू होगा;
 आर्थिक रुप से कमजोर समुदाय के लिए सभी निजी स्कूलो के कक्षा 1 में दाखिला लेने के लिए 25 फीसदी का आरक्षण;
 शिक्षा की गुणवन्ता में अनिवार्य सुधार;
 स्कूल शिक्षा को पांच वर्ष के भीतर समुचित यावसायिक डिग्री प्राप्त होनी चाहिए, अन्यथा उनकी नौकरी चली जाएगी;
 स्कूल का बुनियादी ढांचा (जहां यह एक समस्या है) 3 वर्ष के भीतर सुधारा जाए अन्यथा उसकी मान्यता ऱद्द कर दी जाएगी।
 विन्तीय बोझ राज्य सरकार तथा केद्र सरकार के बीच साझा किया जाएगा।

शिक्षा का अधिकार

शिक्षा का अधिकार अधिनियम शिक्षा किसी भी व्यक्ति एवं समाज के समग्र विकास तथा सशक्तीकरण के लिए आधारभूत मानव मौलिक अधिकार है। यूनेस्को की शिक्षा के लिए वैश्विक मॉनिटरिंग रिपोर्ट 2010(पीडीएफ फाइल जो नई विंडों में खुलती है) के मुताबिक, लगभग 135 देशों ने अपने संविधान में शिक्षा को अनिवार्य कर दिया है तथा मुफ्त एवं भेदभाव रहित शिक्षा सबको देने का प्रावधान किया है। भारत ने 1950 में 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए मुफ्त तथा अनिवार्य शिक्षा देने के लिए संविधान में प्रतिबद्धता का प्रावधान किया था। इसे अनुच्छेद 45 के तहत राज्यों के नीति निर्देशक सिद्धातों में शामिल किया गया है। 12 दिसंबर 2002 को संविधान में 86वां संशोधन किया गया और इसके अनुच्छेद 21ए(पीडीएफ फाइल जो नई विंडों में खुलती है) को संशोधित करके शिक्षा को मौलिक अधिकार बना दिया गया है। बच्चों के लिए मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिनियम(पीडीएफ फाइल जो नई विंडों में खुलती है) 1 अप्रैल 2010 को पूर्ण रूप से लागू हुआ। इस अधिनियम के तहत छह से लेकर चौदह वर्ष के सभी बच्चों के लिए शिक्षा को पूर्णतः मुफ्त एवं अनिवार्य कर दिया गया है। अब यह केंद्र तथा राज्यों के लिए कानूनी बाध्यता है कि मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा सभी को सुलभ हो सके। अधिनियम के प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित हैं • छह से चौदह वर्ष तक के हर बच्चे के लिए नजदीकी विद्यालय में मुफ्त आधारभूत शिक्षा अनिवार्य है। • इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए बच्चों से किसी भी प्रकार का कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा और न ही उन्हें शुल्क अथवा किसी खर्च की वजह से आधारभूत शिक्षा लेने से रोका जा सकेगा। • यदि छह के अधिक उम्र का कोई भी बच्चा किन्हीं कारणों से विद्यालय नहीं जा पाता है तो उसे शिक्षा के लिए उसकी उम्र के अनुसार उचित कक्षा में प्रवेश दिलवाया जाएगा। • इस अधिनियम के प्रावधानों को कियान्वित करने के लिए संबंधित सरकार तथा स्थानीय प्रशासन को यदि आवश्यक हुआ तो विद्यालय भी खोलना होगा। अधिनियम के तहत यदि किसी क्षेत्र में विद्यालय नहीं है तो वहां पर तीन वर्षों की तय अवधि में विद्यालय का निर्माण करवाया जाना आवश्यक है। • इस अधिनियम के प्रावधानों को अमल में लाने की जिम्मेदारी केंद्र एवं राज्य सरकार, दोनों की है, तथा इसके लिए होने वाल धन खर्च भी इनकी समवर्ती जिम्मेदारी रहेगी। यह अधिनियम माध्यमिक एवं उच्चतर माध्यमिक शिक्षा तथा बच्चों तक शिक्षा को पहुंचाने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। इस अधिनियम का सर्वाधिक लाभ श्रमिकों के बच्चे, बाल मजदूर, प्रवासी बच्चे, विशेष आवश्यकता वाले बच्चे या फिर ऐसे बच्चे जो सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, भौगोलिक, भाषाई अथवा लिंग कारकों की वजह से शिक्षा से वंचित बच्चों को मिलेगा। इस अधिनियम के कार्यान्वयन के साथ ही यह उम्मीद भी है कि इससे विद्यालय छोड़ने वाले तथा विद्यालय न जाने वाले बच्चों को अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा, प्रशिक्षित शिक्षकों के माध्यम से दी जा सकेगी। भारत सरकार द्वारा शिक्षा का अधिकार अधिनियम(बाहरी विंडो में खुलने वाली वेबसाइट) बनाने का कदम ऐतिहासिक कहा जा सकता है तथा इससे यह भी तय हो गया है कि हमारा देश सहस्राब्दी विकास लक्ष्य (एमजीडी) तथा सभी के लिए शिक्षा (ईएफए) के नजदीक पहुंच रहा है।

मिड-डे मिल से बच्चों के साथ-साथ मास्टर साहब का भी पेट भरता है- विशेष रिपोर्ट

अतुल कुमार श्रीवास्तव

Mid_Day_Meal_Programme_Bangalore-650x330

देश भर के सरकारी स्कूलों में मिड-डे मिल एक विषय के रूप में बन गया। कहा जाए तो इसकी वजह से बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पूरी तरह से चौपट हो रही है। मास्टर साहब को भी आराम करने का पूरा समय मिल ही जाता है और तो और विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों की तो मौज ही मौज है। एक तरफ सरकारी दावे और दूसरी तरफ जमीनी हकिकत! सवाल अहम इसलिए हो जाता है कि बच्चे स्कूलों में पढ़ने जाते हैं या फिर दिन गिनने।

मास्टर साहब खाना खा-पीकर खैनी ठोकते हुए आते हैं और यहां बच्चे खाना खाने के समय पर पहुंच ही जाते हैं। राशन पानी का बराबर हिसाब प्रचार्य महोदय स्वयं करते हैं ताकि ारी लगने लगी हैं, उसके बदले वो थाली-कटोरी और चम्मच लेते आते हैं। सरकार और प्रशासन के साथ ग्रामीण भी चुप रहते हैं। सभी लोगों का पेट इसी से भरता है। गरीब-अमीर सबका पेट इस मिड-डे मिल के वजह से भरता है।

स्कूलों में मिड-डे मिल के लिए भोजन पर सरकार हर साल करोड़ो रूपए खर्च करती है, इसके योजना को शुरू हुए करीब 8 साल हो गए लेकिन प्रशासन ने अभी तक स्कूलों में थालियों या पत्तलों की भी व्यवस्था नहीं की। इसकी वजह से बच्चों को बहुत ही परेशानियों का सामना करना पड़ता है । इतना ही नहीं देश के कई ऐसे राज्य हैं जहां पानी पीने तक की व्यवस्था नहीं है। सरकार और प्रशासन चावल के बोरियों को बेच-बेच कर खाद्य सामग्री लाते हैं।

साल 2000 में करीब देश-भर के सभी प्राथमिक विद्यालयों के लिए करीब 2500 रू थाली खरीदने के लिए दिया गया था लेकिन एक रिपोर्ट के अनुसार ये थालियां 6 महीने के अंदर ही गायब हो गई। आज स्थिति यह हो गई कि बच्चे किताबें छोड़कर थालियां ढो रहे हैं।

सरकार को यो स्थानीय प्रशासन को बच्चों की भविष्य की चिंता करनी चाहिए। जो बच्चे कल के हमारे भविष्य हैं वो वर्तमान में अंधेरे में है। ग्रामीण भी इस बात को समझ नहीं पा रहे हैं। सरकार बच्चों की उपस्थिति तो दिखा रही है लेकिन पढ़ाई के आंकड़े कितनी अच्छी है, ऐसा फाईल सरकार के पास अभी तक मौजूद नहीं होगी।

बच्चों की जिंदगी मिड-डे मिल में लगा दिए। हमको पढ़ाई को प्रथमिकता देनी चाहिए, पढ़ाई की वजह से हम आगे बढ़ सकते हैं और अपने बच्चों को भी आगे बढ़ा सकते हैं।(स्रोत-बिकीमीडिया)

अक्षय पात्र का बढ़ेगा दायरा

अतुल कुमार श्रीवास्तव  

इंफोसिस और टाटा ग्रुप की फिलंथ्रापिक यूनिट्स यानी परोपकार से जुड़े काम करने वाली इकाइयां मिलकर 200 करोड़ रूपये से ज्यादा बेंगलुरू के एनजीओ  अक्षय पात्र को देंगी। यह संगठन स्कूलों में लंच प्रोग्राम चलाता है। यह दुनिया में किसी एनजीओ कि ओर से चलाया जाने वाला इस तरह का सबसे बड़ा कार्यक्रम है। इस रूपये का उपयोग अक्षय पात्र के कामकाज का दायरा बढ़ाने और ताजातरीन फूड टेक्नोलॉजी से लैस किया जाएगा। ताकि खाना जल्द बन सके, उसकी लागत घटे और गुणवत्ता भी बेहतर हो सके।

इंफोसिस के फाउंडर एन नारायनमूर्ति की पत्नी सुधा मूर्ति के नेतृत्व वाला ‘द् इंफोसिस फाउंडेशन’127 करोड़ रूपये देगा, जिससे तीन आधुनिक किचेन बनाये जाएंगे। इसके अलावा 20 करोड़ और देगा। जमशेद जी टाटा ट्रस्ट 55 करोड़ रूपये देगा, जिससे एनजीओ को लेटेस्ट टेक्नोलॉजी हासिल करने और फूड सेफ्टी बेहतर करने में उपयोग किया जाएगा। अक्षय पात्र के काम करने के मॉडल की अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने 2008 में प्रसंशा की थी।उन्होंने कहा था कि इसे दूसरे देशों में भी अपनाया जाना चाहिए।

इसे ‘इंटरनेशनल सोसायटी फॉर कृष्ण कांशशनेस’ चलाती हैं। इस रकम के साथ संगठन अगले पांच वर्षों में 10 राज्यों में 50 लाख बच्चों को सुविधा देने का लक्ष्य बनाएगा। अभी यह 15 लाख बच्चों को खाना मुहैया कराता है। इंफोसिस से मिलने वाली रकम से जोधपुर और हैदराबाद में मॉडर्न किचेन बनाए जाएगें।

जोधपुर वाले किचेन में रोज 50,000 बच्चों के लिए और हैदराबाद के किचेन में 1 लाख बच्चों के लिए खाना बनाने की क्षमता होगी।आईटी कम्पनी जोधपुर,हैदराबाद और मैसूर में किचेन को ऑपरेशन कास्ट भी देगी। साथ ही वह राजस्थान में लगभग 1.5 लाख बच्चों को दिए जाने वाले भोजन और बोतल बंद पेयजल का खर्च उठाएगी। टाटा ग्रुप देशभर में 22 किचेन के लिए क्वालिफाइड फूड सेफ्टी इंस्पेक्टर्स की हायरिंग और अहमदाबाद, बेंगलुरू, भुवनेश्वर,और लखनऊ में चार मार्डन फूड लैब्स का खर्च उठाएगी। इनमें से हर लैब पर करीब 50 लाख का खर्च आएगा।

(स्रोत- इंटरनेशनल सोसायटी फॉर कृष्ण कांशशनेस)