मिड-डे मिल से बच्चों के साथ-साथ मास्टर साहब का भी पेट भरता है- विशेष रिपोर्ट

अतुल कुमार श्रीवास्तव

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देश भर के सरकारी स्कूलों में मिड-डे मिल एक विषय के रूप में बन गया। कहा जाए तो इसकी वजह से बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पूरी तरह से चौपट हो रही है। मास्टर साहब को भी आराम करने का पूरा समय मिल ही जाता है और तो और विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों की तो मौज ही मौज है। एक तरफ सरकारी दावे और दूसरी तरफ जमीनी हकिकत! सवाल अहम इसलिए हो जाता है कि बच्चे स्कूलों में पढ़ने जाते हैं या फिर दिन गिनने।

मास्टर साहब खाना खा-पीकर खैनी ठोकते हुए आते हैं और यहां बच्चे खाना खाने के समय पर पहुंच ही जाते हैं। राशन पानी का बराबर हिसाब प्रचार्य महोदय स्वयं करते हैं ताकि ारी लगने लगी हैं, उसके बदले वो थाली-कटोरी और चम्मच लेते आते हैं। सरकार और प्रशासन के साथ ग्रामीण भी चुप रहते हैं। सभी लोगों का पेट इसी से भरता है। गरीब-अमीर सबका पेट इस मिड-डे मिल के वजह से भरता है।

स्कूलों में मिड-डे मिल के लिए भोजन पर सरकार हर साल करोड़ो रूपए खर्च करती है, इसके योजना को शुरू हुए करीब 8 साल हो गए लेकिन प्रशासन ने अभी तक स्कूलों में थालियों या पत्तलों की भी व्यवस्था नहीं की। इसकी वजह से बच्चों को बहुत ही परेशानियों का सामना करना पड़ता है । इतना ही नहीं देश के कई ऐसे राज्य हैं जहां पानी पीने तक की व्यवस्था नहीं है। सरकार और प्रशासन चावल के बोरियों को बेच-बेच कर खाद्य सामग्री लाते हैं।

साल 2000 में करीब देश-भर के सभी प्राथमिक विद्यालयों के लिए करीब 2500 रू थाली खरीदने के लिए दिया गया था लेकिन एक रिपोर्ट के अनुसार ये थालियां 6 महीने के अंदर ही गायब हो गई। आज स्थिति यह हो गई कि बच्चे किताबें छोड़कर थालियां ढो रहे हैं।

सरकार को यो स्थानीय प्रशासन को बच्चों की भविष्य की चिंता करनी चाहिए। जो बच्चे कल के हमारे भविष्य हैं वो वर्तमान में अंधेरे में है। ग्रामीण भी इस बात को समझ नहीं पा रहे हैं। सरकार बच्चों की उपस्थिति तो दिखा रही है लेकिन पढ़ाई के आंकड़े कितनी अच्छी है, ऐसा फाईल सरकार के पास अभी तक मौजूद नहीं होगी।

बच्चों की जिंदगी मिड-डे मिल में लगा दिए। हमको पढ़ाई को प्रथमिकता देनी चाहिए, पढ़ाई की वजह से हम आगे बढ़ सकते हैं और अपने बच्चों को भी आगे बढ़ा सकते हैं।(स्रोत-बिकीमीडिया)

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