गरीब के बच्चे

जगदीश ज्वलंत 

शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत शासन ने तय कर लिया कि गरीबी हटाने से अच्छा है गरीब के बच्चों को अमीरों वाले स्कूलों में भर्ती कर दिया जाए। गरीबी न मिटे न सही, गरीबी की हीन-भावना तो मिट जाएगी।

इंग्लिश स्कूल की लकधक मैम चिंचियाते बच्चों को समझाती है, ‘देखो, कल से कुछ गरीब के बच्चे अपने स्कूल में आएंगे। उन्हें प्रेम से अपने पास बिठाना है। उन्हें परेशान नहीं करना, समझे?’

‘मैम, वे कैसे होते हैं? हमें काट खाएंगे तो? कल ही पिंकी को एक कौए ने चोंच मार दी थी…।’

‘ओफ्फो! हनी, गरीब आदमी होते है। जैसे हम हैं वैसे वे भी हैं।’

‘तो वे इतने दिनों से कहां थे? और यहां क्यों आएंगे?

‘इन सब बातों का जवाब प्रिंसिपल मैम के पास है। बस, इतना ध्यान रखने का कि उन्हें देखकर किसी को हंसने का नहीं। चुप रहने का।’

‘मैम, ये स्वीटी पूछ रही है कि हम उन्हें हाथ लगा सकते हैं कि नहीं?’

‘चलो, फालतू बातें बंद करो और पीछे की पंक्ति के सारे चिल्ड्रेन आगे बैठेंगे। उस लाइन का रिजर्वेशन हो चुका है। उस पर गरीब बच्चे ही बैठेंगे।’

सभी बच्चों में जिज्ञासा है। कैसे होते होंगे गरीब के बच्चे? लकी अपने साथियों को समझाता है, एक बार मैं गांव गया था। वहां देखा मैंने एक गरीब का बच्चा। हुआ ये कि मैंने आम के पेड़ के नीचे से एक कच्चा आम उठाया कि वो पेड़ पर से ही कूदा-धम्म्‌। अंडरवियर गायब। बड़े-बड़े बाल और लंबे-लंबे नाखून। बोला, ‘केरी दे नी तो लबूरी दूंगा।’ मैं समझा ये कुछ देने का कह रहा है। मैंने भी कहा, ‘हां दे!” उसने झट बंदर की तरह अपने नाखूनों से मुझे नोंच दिया।’

यह सुनकर स्वीटी रोने लगी। लकी ने उसे समझाते हुए कहा, ‘डर मत स्वीटी, मैम ने उन्हें इसीलिए पीछे बैठाया है। और मैम की लेंग्वेज उनकी समझ में थोड़े ही आना है। वे अलग ही बोली बोलते हैं। उनके पास न पॉकेट-मनी होती है, न ही लंच-बॉक्स। खाद की थैली में तो किताबें रखते हैं और उसी में पानी की लिकेज बॉटल। अपनी मैडम जब इनको होमवर्क देगी तो ये तो क्या इनके पेरेंट्स भी नहीं कर पाएगे। और जब क्वेश्चन पूछेंगी ना, तो दो दिन में नौ दो ग्यारह हो जाएगे। पापा बता रहे थे कि ये सरकारी में समा नहीं रहे हैं। व्यवस्था नहीं है सरकार के पास। न टीचर, न स्कूल। और पढ़ाना सभी को है। कानूनन मजबूरी है। इसीलिए इनको कॉन्वेंट में डालकर सरकार इनके मजे ले रही है। सभी कल देखना कितने मजे आते हैं। वैसे पापा कहते थे उनका मजाक मत उड़ाना, पाप पड़ता है।”

पूरी कक्षा में सन्नाटा पसरा है। गरीब के बच्चे आ चुके हैं। पिछली पंक्ति में वे डरे-सहमे ऐसे बैठे हुए हैं कि जैसे कुछ अप्रत्याशित घटने वाला है। उनके पालक पुनः चार बजे संभाल लेने का आश्वासन देकर मेन गेट के बाहर खड़े उधर ही देख रहे हैं। कक्षा के सभी बच्चे पीछे देखने को आतुर हैं। कुछ तो कनखियों से देख भी रहे हैं। पल-पल दहशत-अब क्या होगा! क्लास टीचर चश्मे की संधि से उन्हें झांक रही है। आंखों से उनकी गहराई से पड़ताल की जा रही है। एक अपराध-बोध स्पष्ट झांक रहा है। सभी बच्चों के चेहरे पर। नवागंतुक बच्चों के परिचय की प्रक्रिया प्रारंभ हो रही है।

‘काना पिता नग्गा कौन है? यहां आओ…’काना खड़ा होता है। मुंह तो धोया किंतु पोंछना भूल गया। मटमैली लकीरों में भाग्य की लकीरें छुप-सी गई हैं। बालों में तेल डाला, किंतु कंघी करना भूल गया। यक्ष प्रश्न-से खड़े हैं बाल। फफककर रो देने के सारे भाव दबाते हुए शेर के निकट जा रहे खरगोश की भांति बेचारा काना पहुंच चुका है। मैडम की आंखों से तीर की भांति निकलती अधिकार, अधिनियम की धाराएं चीर डालना चाहती हैं उस मासूम में छुपी संभावनाओं को।’ ‘वॉट इज योर नेम..?’ बगले झांक रहा रहा काना।
तोते-सा हंस रहा है रट्टू-समुदाय। ‘साइलेंट…हंसने का नहीं।’ मैडम के निर्देश पर सभी की हंसी मुस्कुराहट में बदल जाती है। काना खेत में खड़े वजूके-सा खड़ा है। उसने अधिकार तो पा लिया किंतु स्थान नहीं मिल पाया। एबीसीडी, दस तक पहाड़े, शब्द ज्ञान से उपजे भ्रम ने आज उसे यहां पहुंचा दिया। लेकिन यहां तो सबसे हटकर और भी बहुत कुछ चाहिए जो उसकी पकड़ की परिधि से कोसों दूर है। हवाइयां उड़ रही है। उसकी आंखें पिछली पंक्ति पर जमीं हुई है, जहाँ उसके सजातीय बेसब्री से स्वयं का क्रम न आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अपने इलाके का होनहार काना अपना-सा मुंह लेकर अपने स्थान पर पहुंच जाता है।

‘भेरू पिता पूरा कौन है? चलो यहां आओ…।’ अब भेरू आता है। नजर न लगे, इसलिए उसकी दादी ने काजल अलग लगा दिया। शर्ट का ऊपरी बटन न होने से सारा क्रम बिगड़ गया। शर्ट एक ओर छोटी है, दूसरी ओर बड़ी। नेकर की चेन को भी आज ही बिगड़ना था। पुलिसिया परेड जारी है। सब कुछ दांव पर लगाकर खड़ा है भेरू।

‘एप्पल मीन्स..?’ पूछती है मैम। आंखें फाड़े हकबकाया भेरू मुंह तक रहा है मैडम का। काऊ मीन्स..?’ दूसरा प्रश्न पूछती है मैम। होता तो गाय है किंतु क्या पता यहां क्या होता है। भेरू न बोलने में ही अपनी भलाई समझता है, जैसे पहले काना ने समझी थी। मान-अपमान से परे हो चुकी है, पिछली पंक्ति। बस, भय यही है कि कोई मार-पिटाई न कर दे। ‘नेक्स्ट, गणपत पिता शंकर…’इतने में ही घंटी बज जाती है। पिछली पंक्ति की खुशी का ठिकाना नहीं है। साथ ही यह भय भी बना हुआ है कि कल क्या होगा?

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