सवाल शिक्षा की गुणवत्ता का

यूनेस्को की एक ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में बच्चों को शिक्षा की उपलब्धता आसान हुई है. लेकिन गुणवत्ता का सवाल ज्यों का त्यों बना हुआ है और स्कूल जाने वाले बच्चे भी बुनियादी शिक्षा से वंचित हो रहे हैं.

इसके साथ-साथ भारत में वयस्क निरक्षरों की संख्या चौंकाने वाली है. संयुक्त राष्ट्र की संस्ता यूनेस्को की तरफ से जारी किए गए ग्लोबल मॉनिटरिंग रिपोर्ट (जीएमआई) के मुताबिक़ भारत में वयस्क निरक्षरों की संख्या 28 करोड़ 70 लाख है. जो दुनियाभर में कुल वयस्क निरक्षरों की संख्या का 37 प्रतिशत है.

साल 1991 में भारत में साक्षरता का प्रतिशत 48 प्रतिशत था, जो 2006 में बढ़कर 63 प्रतिशत हो गया. रिपोर्ट के अनुसार जनसंख्या में वृद्धि के कारण निरक्षरों की कुल संख्या में कोई परिवर्तन नहीं देखा गया .भारत ने पूर्व-प्राथमिक शिक्षा और प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में  महत्वपूर्ण प्रगति की है. भारत उन देशों में शामिल है जो 2015 तक पूर्व-प्राथमिक (नर्सरी) स्तर पर 70 प्रतिशत नामांकन का लक्ष्य हासिल कर लेंगे. इन देशों में ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया, कनाडा, डेनमार्क, नार्वे, स्वीडन, अमरीका और ब्रिटेन शामिल हैं. हालांकि रिपोर्ट में शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठाए गए हैं. भारत उन 21 देशों में शामिल हैं जहाँ बच्चों का शैक्षिक स्तर काफी कम है.

रिपोर्ट के अनुसार भारत शिक्षा क्षेत्र के ऊपर ध्यान दे रहा है, लेकिन शिक्षा क्षेत्र को मिलने वाले बजट में कमी आयी है. 1999 में कुल बजट का 13 फीसदी शिक्षा पर खर्च हो रहा था. लेकिन 2010 में यह घटकर मात्र 10 फीसदी रह गया है. यूनेस्को की ताजा रिपोर्ट वैश्वक शिक्षा के लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में होने वाले प्रयासों को सामने लाती है. वैश्विक निगरानी रिपोर्ट के मुताबिक़ शैक्षिक लक्ष्यों को 2015 तक हासिल नहीं किया जा सकता है.

यह रिपोर्ट कहती है कि समस्या केवल बच्चों को स्कूल भेजने की नहीं है. स्कूल जाने वाले बच्चे भी शिक्षा के घटिया स्तर के कारण पिछड़ रहे हैं. प्राथमिक स्कूल जाने वाले करीब एक तिहाई बच्चे, चाहे वे कभी स्कूल गए हों या नहीं बुनियादी शिक्षा नहीं प्राप्त कर रहे हैं. यूनेस्को की महानिदेशक इरिना बोकोवा रिपोर्ट में विभिन्न देशों की सरकारों से अपने प्रयासों को बढ़ाने की बात कहती हैं ताकि ताकि ग़रीबी, लिंग और भौगोलिक स्थिति जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद सभी को शिक्षा मुहैया करवाई जा सके.

उनके मुताबिक़, “शिक्षा की कोई व्यवस्था केवल तभी बेहतर हो सकती है, जब शिक्षक अच्छे हों. शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए शिक्षकों की क्षमताओं का विकास करना बहुत जरूरी है. अध्ययन के दौरान मिले साक्ष्यों से यह बात स्पष्ट हुई है कि शिक्षकों को सहयोग मिलने से शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होता है, उनको सहयोग न मिलने की स्थिति में शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट होती है और युवाओं में निरक्षरता अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाती है.”

रिपोर्टे के अनुसार 2015 तक सार्वजनिक प्राथमिक शिक्षा का लक्ष्य हासिल करने के लिए सरकारों को शिक्षकों के खाली पदों को भरने में तेजी लानी चाहिए. वैश्विक स्तर पर 16 लाख शिक्षकों की नियुक्ति करनी होगी. अच्छे शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने और बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दिलाने के लिए चार सूत्रीय कार्यक्रम पेश करती है.

1. अच्छे शिक्षकों का चयन बच्चों की विविधतता को ध्यान में रखते हुए किया जाय.
2. शिक्षकों को शुरुआती कक्षाओं से कमज़ोर बच्चों की मदद करने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए.
3. देश के ज़्यादा चुनौती वाले हिस्सों में सबसे अच्चे अध्यापकों की नियुक्ति की जानी चाहिए. ताकि असमानता को कम किया जा सके.
4. सरकार को शिक्षकों को पेशे में बने रहने लायक प्रोत्साहन देना चाहिए ताकि किसी भी परिस्थिति में यह सुनिश्चित किया जा सके कि सारे बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सके।

लेकिन यह जिम्मेदारी अकेले शिक्षकों पर नहीं डाली जा सकती है. रिपोर्ट शिक्षकों को काम करने के लिए अच्छे तरीके से निर्मित पाठ्यक्रम और मूल्यांकन पर ध्यान देने की बात कहती है. इसके साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र को होने वाली फंडिग में कमी का सवाल भी उठाया गया है. इस बजट को भारत जैसे देशों में कर बढ़ाकर पूरा किया जा सकता है. यूनेस्को की ताजा रिपोर्ट से भारत में प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र की चुनौतियां सामने आती हैं. नामांकन के लक्ष्य के करीब पहुंचने के बाद गुणवत्ता का सवाल सबसे अहम हो गया है. यह बात रिपोर्ट में सामने आती है. सरकार शिक्षकों के प्रशिक्षणों पर कागजों में तो काफी काम दिखा रही है, बजट भी खर्च हो रहा है, लेकिन शिक्षक प्रशिक्षणों से किसी लाभ की बात से इनकार करते हैं. शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों को औपचारिकता के रूप  में देखते हैं. इस मानसिकता में बदलाव के लिए भी प्रयास करने की जरूरत है।

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