शिक्षा

केरल की शिक्षा व्यवस्था भारत के अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा आधुनिक है। केरल के विकास मॉडल में शिक्षा और स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण योगदान है। आजादी के बाद से सबसे अधिक परिवर्तन और विकास शिक्षा के क्षेत्र में ही हुए हैं। राज्य में 1956 से अस्सी के दशक के मध्य तक उच्च शिक्षा क्षेत्र के विस्तार और स्तरीय विकास मद्देनजर उदार शिक्षा नीति चलाई। वर्तमान में दूसरे राज्यों की तुलना में यह राज्य उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सबसे आगे हैं, राष्ट्रीय स्तर पर साक्षरता दर जहां 65.38% है वहीं केरल की 90.86%

केरल में स्कूल, कॉलेज राज्य सरकार या फिर निजी संगठन इसका संचालन करते हैं।केरल में स्कूलों को इंडियन सर्टिफिकेट ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (आईसीएसई), सेंट्रल बोर्ड फॉर सेकेंडरी एजुकेशन (सीबीएसई) और केरल राज्य शिक्षा समिति द्वारा मान्यता प्राप्त होते हैं। राज्य का शिक्षा विभाग प्राथमिक शिक्षा पर विशेष ध्यान देता है। केरल के प्राथमिक विद्यालयों में निजी सहायताप्राप्त, निजी गैर सहायताप्राप्त और सरकारी विद्यालय शामिल हैं। राज्य के विद्यालयों को अंग्रेजी और मलयायम दोनों भाषाओं में विद्यालयों में शिक्षा के माध्यम के रूप में चुनने की अनुमति है वैसे अधिकांश निजी विद्यालय अंग्रेजी माध्यम में ही शिक्षा देते हैं। माध्यमिक स्तर की दस साल की शिक्षा के पड़ाव को पार करने के बाद विद्यार्थी उच्च माध्यमिक शिक्षा की पढ़ाई के लिए तीन विषयों विज्ञान, वाणिज्य और मानविकी में से किसी एक विषय का चयन कर सकते हैं। इसके अलावा शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान, शारीरिक रूप से अक्षम लोगों और एंग्लो भारतीय विद्यालय भी मौजूद हैं।

केरल का बेहतरीन शिक्षा तंत्र अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विद्यार्थियों को आकर्षित करता है। राज्य में शिक्षण संस्थानों की संख्या तेजी से बढ़ी है। वर्तमान में (2006-07) यहां 12644 विद्यालय, जिनमें 2790 उच्च विद्यालय, 3037 उच्च प्राथमिक विद्यालय और 6817 छोटे स्तरीय प्राथमिक विद्यालय शामिल हैं। विद्यालयों के विभाजन के दौरान यह बात उल्लेखनीय है कि छोटे स्तरीय प्राथमिक विद्यालयों की संख्या 6861 (1980) से घटकर 6817 (2006-07) हो गई है। इसका कारण जनसांख्कीय तरीकों में बदलाव और राज्य के जन्म वृदिध्‍ दर में आई कमी है। निजी गैर सहायताप्राप्त विद्यालयों में उच्च विद्यालयों को अधिक महत्वपूर्ण है, जिसके अंतर्गत कुल विद्यालयों के 13.12% उच्च विद्यालय हैं। वैसे केरल में इन तीन क्षेत्रों में निजी सहायताप्राप्त विद्यालयों की संख्या तेजी से बढ़ी है। इनमें वर्ष 2006-2007 में निजी सहायता प्राप्त विद्यालयों की संख्या 1428, 1870 निजी उच्च प्राथमिक विद्यालय और 39992 निजी सहायताप्राप्त छोटे स्तरीय प्राथमिक विद्यालय थी।

सत्तर के दशक के बाद जनसंख्या में आई गिरावट के बाद विद्यालयों में विद्यार्थियों के नामांकन संख्या में भी काफी कमी आई। वर्ष 2006-07 की तुलना में 2007-08 में विद्यार्थियों के नामांकन में गिरावट का प्रतिशत 1.97 आंका गया। छोटे स्तरीय प्राथमिक विद्यालयों, उच्च प्राथमिक विद्यालयों और उच्च विद्यालयों में नामांकन का प्रतिशत क्रमश: 31.14%, 31.76%, 31.10% था। केरल में विद्यालय छोड़ने का प्रतिशत काफी कम रहा है, छोटे स्तरीय प्राथमिक विद्यालयों में 0.59%, उच्च प्राथमिक विद्यालयों में 0.52%, उच्च विद्यालयों में 1.29% ही रहा है। वयांद जिले में विद्यार्थियों के विद्यालय छोड़ने का अनुपात(10.65%) सर्वाधिक रहा और इस दृष्‍टि से कसारगोड़ में उच्च प्राथमिक विद्यालयों और उच्च विद्यालयों में यह अनुपात अधिक रहा।

विद्यालयों में कुल नामांकन 49.23% की तुलना में हर कक्षा में लड़कियों की संख्या अधिक होती है। इसके अलावा व्यावसायिक माध्यमिक विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या 469968 है, जिनमें 51.86%संख्या लड़कियों की है और स्नातक तथा स्नातकोत्तर स्तर पर भी लड़कियों का अच्छा-खासा प्रतिशत होता है, जो क्रमश: 67% और 78.2%(2006-07) के लगभग होती हैं। इससे यह तस्वीर साफ होती है कि विश्वविद्यालयीन शिक्षा में भी लड़कियां आगे हैं, इससे साबित होता है कि सरकार भी लड़कियों की शिक्षा पर जोर देती है और उन्हें सामान्य विद्यालयों में पढ़ने के लिए प्रेरित करती है। इससे बढ़कर केरल सरकार महिलाओं की स्थिति में आधारभूत परिर्वतन लाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

शिक्षकों के मामले में यहां टीटीआई शिक्षकों को मिलाकर कुल 1,76,126 शिक्षक हैं। इनमें 31.3% सरकारी क्षेत्र में, 60.72% निजी सहायताप्राप्त विद्यालयों और 7.98% गैर सहायताप्राप्त विद्यालयों में हैं। इन तीनों क्षेत्रों में भी महिलाएं पुरुषों की तुलना में 7.4% (2006-07) आगे हैं। यदि पॉलिटेक्निक की बात की जाए तो राज्य में (2007-08) सरकारी पॉलिटेक्निक की संख्या 43 है और 6 निजी सहायताप्राप्त पॉलिटेक्निक थे। हर साल सरकारी पॉलिटेक्निक में नामांकन लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या 8160 और निजी सहायताप्राप्त पॉलिटेक्निक में यह संख्या 1500 है। यहां भी लड़कियां लड़कों से 10% आगे है और इतने ही अनुपात का अंतर तकनीकी उच्च विद्यालयों में भी है।

तकनीकी शिक्षा व्यवस्था के तहत राज्य में इंजीनियरिंग तकनीक, प्रबंधन और वास्तुकला आदि विषय डिप्लोमा डिग्री, स्नातकोत्तर और शोध स्तर पर शामिल हैं। इंजीनियरिंग महाविद्यालय, तकनीकी उच्च विद्यालय, ललित कला महाविद्यालय, पॉलिटेक्निक महाविद्यालय, सरकारी व्यावसायिक संस्थान, सिलाई एवं परिधान निर्माण केंद्र और व्यावसायिक विद्यालय राज्य के तकनीकी शिक्षा व्यवस्था के अंर्तगत आते हैं। कोझिकोड का राष्ट्रीय तकनीकी संस्थान स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के विषयों की पढ़ाई के लिए मान्य विश्वविद्यालय स्तर प्रदान करता है। कोच्चि की विज्ञान एवं तकनीकी (सीयूएसएटी) को एमएचआरडी, भारत सरकार ने आईआईईएसटी स्तर के लिए चुना है। स्वयं वित्त पोषक संस्थानें भी तकनीकी शिक्षा क्षेत्र में मुख्य रूप से संचालित करती हैं।

वर्तमान में केरल में दो मान्य विश्वविद्यालयों को छोड़कर 7 विश्वद्यालय हैं, जो पूरे देश में मौजूद 297 विश्वविद्यालयों का 2.7% है। 2002 में गैर सहायताप्राप्त महाविद्यालयों को छोड़कर कला और विज्ञान महाविद्यालयों में 1.61 लाख विद्यार्थी अध्ययनरत थे। जिनमें 4 विश्वविद्यालयों में केरल, महात्मा गांधी, कालीकट और कानपुर विश्वविद्यालय में कर्इ तरह के विषय मौजूद हैं और ये सभी सामान्य श्रेणी के हैं। विज्ञान और तकनीकी कोच्चि विश्वविद्यालय (सीयूएसएटी), श्री शंकाराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय और केरल कृषि विश्वविद्यालय जैसे तीन अन्य विश्वविद्यालय राज्य में संचालित हो रहे हैं। श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय और कानपुर विश्वविद्यालय हाल ही में बना है, जिनकी स्थापना क्रमश: 1993 और 1995 में हुई थी। केरल के विश्वविद्यालय अब परंपरागत विषयों से हटकर व्यावसायिक और रोजगारोन्मुखी विषयों को शुरू करने पर जोर दे रहे हैं।

कुल मिलाकर कहा जाए तो विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा में सरकार का योगदान सीमित रहा है और यही वजह है कि 224 महाविद्यालय में से 38 ही सरकारी महाविद्यालय हैं। 66 प्रतिशत महाविद्यालय निजी प्रबंधनों द्वारा संचालित होते हैं,जिससे पता चलता है कि निजी क्षेत्र का एकाधिकार काफी अधिक है और साथ ही निजी सहायताप्राप्त महाविद्यालयों की संख्या भी काफी है। इनके अलावा स्वयं वित्त पोषित या निजी गैर सहायताप्राप्त महाविद्यालयों की संख्या तेजी से बढ़ी है और इनकी संख्या अब राज्य में सरकारी महाविद्यालयों के बराबर यानी 38 हो गई है। यही वजह है कि सहायताप्राप्त महाविद्यालयों में गैर सहायताप्राप्त विषयों की संख्या बढ़ती जा रही है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है राज्य सरकार की योजना। केरल में स्कूली शिक्षा का स्तर सार्वभौमिक है, लेकिन उसके मुकाबले उच्च शिक्षा का फैलाव कम है।

साक्षरता

केरल की संस्कृति में महिलाओं में आदर और उच्च स्तर प्राप्त है। यही वजह है कि विभिन्न संस्कृतियों और परंपराओं के बावजूद यहां देश के अन्य राज्यों के मुकाबले महिलाओं के लिए ज्यादा अवसर हैं।

केरल के इतिहास की समीक्षा की जाए तो समाज में उनके आगे बढ़ने की रफ्तार धीरे भले ही थी लेकिन वह बुद्धिपरक थी। अब वे बच्चे और घर के रोजमर्रा के कामों में अकेली नहीं रह गई हैं। परिवार की जरूरतों को पूरा करते हुए भी वे अपने राज्य और अन्य राज्यों में अपनी एक अलग पहचान और मुकाम हासिल कर रही हैं। हमें ऐसे राज्य पर गर्व होना चाहिए, जहां महिलाओं में साक्षरता दर सर्वाधिक है, स्त्रियों का अनुपात पुरुषों की तुलना में अधिक है, यहां गर्भपात या बालिका भ्रूण हत्या जैसी घटनाएं बहुत ही कम संख्या में होती हैं। केरल से यह बात सामने आती है कि साक्षर पुरुषों की संतानें साक्षर होती है लेकिन साक्षर महिलाएं पूरे परिवार को साक्षर करती है।

राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के तहत साक्षरता दर को 90%तक ले जाने तक की योजना है और इससे पूर्ण साक्षरता को हासिल करने का लक्ष्य रखा गया। इस आधार पर केरल (90.86%) को 18 अप्रैल, 1991 को पूर्ण साक्षर राज्य घोषित कर दिया गया। राज्य में महिलाओं का साक्षरता दर 87.86% है, जो राष्ट्रीय महिला साक्षरता दर (33.7%) की तुलना में कहीं अधिक है। जहां राज्य में पुरुषों को साक्षरता दर 94.2% वहीं महिलाओं का 87.86% है। इससे पता चलता है कि कुल जनसंख्या की तीन चौथाई जनसंख्या साक्षर है और महिला पुरुषों के बीच इस अनुपात का अंतर बहुत अधिक नहीं है। केरल में पुरुष साक्षरता वृद्धि दर 0.58% की तुलना में महिलाओं में साक्षरता वृद्धि दर 1.69% (1991-2001) रही। केरल ने 1951 में जिस स्तर को छू लिया था आज भी देश के कई राज्य वहां तक पहुंचाने के लिए प्रयासरत हैं।

केरल में पुरुष-स्त्री साक्षरता दर के बीच का अंतर तेजी से घट रहा है। उदाहरण के लिए देखा जाए तो 1951 में जहां यह अंतर 21.9% था और 2001 में घटकर यह केवल 6.3 % ही रह गया। राष्ट्रीय स्तर पर 2001 में यह अंतर 21.7%।

महिला साक्षरता दर – केरल, भारत (1951-2001)
वर्ष केरल –महिला साक्षरता (%) पुरुष- महिला अंतर (%) भारत-महिला साक्षरता (%) पुरुष- महिला अंतर (%)
1951 36.43 21.92 7.93 17.02
1961 45.56 19.33 12.95 21.49
1971 62.53 14.6 18.69 20.77
1981 65.73 9.53 29.76 26.62
1991 86.17 7.45 39.29 24.84
2001 87.86 6.34 54.16 21.69

स्रोत: भारत की जनगणना

जिलेवार आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि ‘कोट्टयम’ जिला पुरुष और महिला साक्षरता दर दोनों में सबसे आगे है और यह भारत का पहला ऐसा शहर है जहां सौ प्रतिशत साक्षरता (यह एक उल्लेखनीय कीर्तिमान है जिसे 1989 की शुरुआत में ही बन चुका था) है। स्त्री पुरुष साक्षरता दर पालाकाड जिले में सबसे निम्न है। यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि इस जिले में महिला और पुरुष साक्षरता दर के बीच 10% है। यह अधिक चिंता का विषय नहीं कि है यह जिला विकास के कई मायनों में राज्य के औसत से भी कम है।

अनुसूचित जातियों की जनसंख्या की दृष्टि से यह विभाजन इस प्रकार है 88.1% (पुरुष) और 77.6% (महिलाएं) और अनुसूचित जनजातियों में यह क्रमश: 70.8% और 58.1% था।

केरल के अलग-अलग जिलों में साक्षरता दर
जिले साक्षरता (%)
पुरुष स्त्री
कसारगोड 90.84 79.8
कनूर 96.38 89.57
वयांद 90.28 80.80
कोझिकोड 96.30 88.86
मालापुरम 91.46 85.96
पालाकोड 89.73 79.31
त्रिसूर 95.47 89.94
एर्नाकुलम 95.95 90.96
इदुकी 92.11 85.04
कोट्टयम 97.41 94.45
अलपुंझा 96.42 91.14
पठानमथिटा 96.62 93.71
कोलम 94.63 88.60
तिरुअनंतपुरम 92.68 86.26
केरल 94.20 87.86

स्रोत: भारत की जनगणना, 2001

आंकड़ें बताते हैं कि केरल में महिलाओं की साक्षरता का स्तर समय के साथ सुधरता गया है। इस साक्षरता स्तर को लोगों के स्वास्थ्य से जोड़कर देखा जा सकता है। केरल में जन्म मृत्यु दर काफी कम है और जीवन प्रत्याशा अन्य राज्यों की तुलना में कहीं अधिक है। महिलाओं की साक्षरता दर 36.43% (1951) से 87.86% (2001) तक बढ़ना एक उल्लेखनीय कीर्तिमान है और यह समाज में विकास के लिए एक अच्छे संकेत के रूप में दर्शाता है।

कई स्थानीय असामनाताओं के बीच महिलाओं की साक्षरता जनसांख्यिकीय संकेतों के लिए एक प्रेरणास्रोत है। इन संकेतों की बदौलत केरल में महिलाओं की स्वास्थ्य स्थिति में काफी सुधार आया। महिलाओं की साक्षरता और शिक्षा के कारण ही शिशुओं के मृत्यु दर में कमी, आम स्वास्थ्य और स्वच्छता पर प्रभाव पड़ा है।

स्रोत: आईटी विभाग, केरल सरकार (अतुल कुमार श्रीवास्तव)

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