पढ़ाई अब ज्ञान नहीं, रोज़गार के लिए


विद्यार्थी
अभी भी भारत में कई बच्चे प्राथमिक शिक्षा तक से वंचित हैं
मेरे जन्म के कुछ महीने बाद ही देश को आज़ादी मिली. मैं तब के प्रजातंत्र और अब के प्रजातंत्र के स्वरूप में बहुत ज़्यादा फ़र्क महसूस करता हूँ.

जिन दिनों मैं स्कूल में पढ़ने जाता था तो उस समय शिक्षा में ट्यूशन जैसी कोई बात नहीं थी और तब आज की तरह कोचिंग सेंटर नहीं होते थे.

शिक्षक ट्यूशन पढ़ाते ही नहीं थे. वे कक्षाओं में ही इतने अच्छे ढंग से समझाते थे कि किसी को ट्यूशन करने की ज़रूरत ही नहीं होती थी.

(भारत की आज़ादी के 60 बरस पूरे होने पर हम ऐसे लोगों से आपको रूबरू करवा रहे हैं जो भारत की आज़ादी के साथ-साथ ख़ुद भी 60 वर्ष के हो चुके हैं. इसी श्रंखला में पढ़िए शिक्षा के क्षेत्र में पिछले 60 बरसों के दौरान हुए परिवर्तनों पर प्रोफ़ेसर सचिंद्र नारायण की समीक्षा और दीजिए अपनी राय..)

आज उस तरह के शिक्षक नहीं हैं. मुझे लगता है कि यह शिक्षा और शैक्षिक परिवेश में आया एक बहुत बड़ा बदलाव है.

उस समय ऐसे लोग ही राजनीति में आते थे जिन्हें जनता की सेवा करनी होती थी और वे बाकायदा पढ़े-लिखे भी होते थे. तब कोई भी नेता राजनीति को व्यापार की नज़र से नहीं देखता था.

समय के साथ लोगों की मानसिकता में बदलाव भी आया है, इससे लगता है कि सामाजिक चेतना लुप्त हो गई है और समाज मे विकृति आ गई है.

अब जबकि हम आज़ादी के साठ साल पूरे कर रहें हैं तो हमें सामाजिक मुद्दों पर भी उतना ही ज़ोर देने की ज़रूरत है जितना ज़ोर हम आधारभूत संरचना पर देते हैं.

शिक्षाः बदलते आयाम

एक छात्र और फिर एक शिक्षक के दो रूपों में मैनें समाज में बहुत परिवर्तन देखा और महसूस किया है. यह सारा बदलाव बड़ा ही स्वाभाविक था.

 अब पढाई ज्ञानोन्मुखी न होकर रोज़गारोन्मुखी रह गई है लेकिन इस तरह का बदलाव कोई ग़लत परिवर्तन नहीं है. हालांकि इसके चलते छात्र और शिक्षक के संबंधों में जो परिवर्तन आया है वह ज़रुर ग़लत है

पहले का छात्र अधिक से अधिक पढना चाहता था और ज़्यादा से ज़्यादा विषयों का ज्ञान प्राप्त करना चाहता था लेकिन आज ऐसा नहीं हैं.

अब छात्र ज्ञान हासिल करने की बजाए ऐसे विषय लेना चाहता जिसके ज़रिए उसे रोज़गार प्राप्त हो सके.

अब पढाई ज्ञानोन्मुखी न होकर रोज़गारोन्मुखी रह गई है लेकिन इस तरह का बदलाव कोई ग़लत परिवर्तन नहीं है. हालांकि इसके चलते छात्र और शिक्षक के संबंधों में जो परिवर्तन आया है वह ज़रुर ग़लत है.

विकास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है. भारत में काफ़ी विकास हुआ है. मसलन पहले हम लोग बाँस से कलम बनाते थे और उससे लिखते थे.

उस समय कलम मँहगी होती थी और ख़रीदना कठिन होता था. अब मामूली दामों में कलम मिल जाती है.

आज हमने तकनीक, विज्ञान, कॉमर्स के क्षेत्र में ख़ासी तरक्की हासिल की है. इनसे संबंधित अच्छे पाठ्यक्रम कई कॉलेजों में पढ़ाए जा रहे हैं पर साथ ही कला, साहित्य, भाषा और सामाजिक अध्ययन से जुड़े विषयों के प्रति नई पीढ़ी की रुचि घटी है जो चिंताजनक है.

http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2007/07/070730_60yrs_blog_teacher.shtml

Advertisements

स्कूली शिक्षा का गिरता स्तर : दोषी कौन?

स्वयंसेवी संगठन प्रथम ने हाल ही में प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर जो रिपोर्ट जारी की है उसके अनुसार शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के तीन साल बाद भी प्राथमिक शिक्षा के स्तर में कोई परिवर्तन नजर नहीं आता हैं बल्कि साल दर साल स्थिति और भी बदतर होती जा रही है। रिपोर्ट में बताया जा रहा है कि ग्र्रामीण विद्यालयों में कक्षा पॉच के विद्यार्थीं न तो गणित का साधारण सा जोड़-घटाना कर सकते हैं और न ही मात्र भाषा में लिख पढ़ पाते हैं। वैसे स्वयंसेवी संगठन प्रथम ने यह रिपोर्ट प्राथमिक विद्यालयों के संदर्भ में जारी की है लेकिन देश के ग्रामीण क्षेत्र के माध्यमिक स्कूलों के छात्रों की स्थिति भिन्न नहीं है। क्योंकि आठवीं कक्षा का विद्यार्थी भी गणित और भाषाई ज्ञान के मामले में पॉचवीं के बच्चों से कुछ अलग नहीं है। स्वयंसेवी संगठन प्रथम की रिपोर्ट के बाद शिक्षा का अधिकार अधिनियम के आलोचक यह कह सकते है कि प्राथमिक विद्यालयों में परीक्षाएॅ न होना इसकी वजह है।क्योंकि शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अनुसार किसी विद्यार्थी को अगली कक्षा में प्रोन्नत करने से नहीं रोका जा सकता है। मगर शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू हुए अभी सिर्फ तीन ही वर्ष हुए है और शिक्षा का स्तर कई वर्षों से लगातार गिरता जा रहा है। जहॉ जक परीक्षा की बात है तो प्राथमिक शिक्षा के संदर्भ में सिर्फ परीक्षा को शिक्षा के स्तर की सुधार की कसौटी नहीं माना जा सकता है क्योंकि प्राथमिक शिक्षा बच्चे को सीखने का प्रथम अवसर प्रदान करने वाला एक माधयम है।और इसमें गणित और भाषा का ज्ञान आसानी से कराया जा सकता है।चूॅकि इस उम्र के बच्चे में सीखने और ग्रहण करने की क्षमता अधिक होती है अत: बच्चों की क्षमता या ग्रामीण वातावरण को भी दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।

जहॉ तक फण्ड की बात है तो सन् 2004 में केंद्र सरकार का प्राथमिक शिक्षा पर बजट जहॉ मात्र 5,700 करोड़ रूपये था जो सन् 2012में बढ़कर 49,000 करोड़ रूपये हो गया।जब केंद्र सरकार ने प्राथमिक शिक्षा पर अपना आवंटन लगभग दस गुना बढ़ा दिया तो इसके परिणाम भी बांछित मिलना थे लेकिन हुआ उल्टा ?अब इसमें दोषी कौन? प्राथमिक शिक्षा की बेहतरी के लिए साल दर साल बजट आवंटन बढ़ाने वाला मानव संसाधान विकास मंत्रालय?या शिक्षा के अधिकार कानून को गढ़ने वाले देशभर के शिक्षाविद ?या फिर प्राथमिक शिक्षा  व्यवस्था की कमान संभालने वाली राज्य सरकारें?निश्चित रूप से इसकी जिम्मेदारी राज्य सरकारें पर ही डाली जानी चाहिए क्योंकि केंद्र सरकार से मिलने वाले भारी बजट का वो सदुपयोग नहीं कर पायीं। आज सारे देश के प्राथमिक विद्यालयों में दस लाख से अधिक शिक्षकों के पद रिक्त है। राज्य सरकारें केंद्र से इस मद का हिस्सा तो पूरा लेती है लेकिन बच्चों को पढ़ाने का काम दैनिक मजदूरी से  भी कम मानदेय पर रखे गए अतिथि शिक्षकों के भरोसे डाल दिया जाता है। प्रदेश सरकारों का सारा ध्यान इस बात पर केंद्रित रहता है कि सस्ते से सस्ते शिक्षक कैसे नियोजित किए जाए लेकिन इसके कारण शिक्षा का स्तर कैसा होगा इसकी चिंता  न तो राजनेता करते है और नहीं अधिकारी? अभी मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के शिक्षकों द्वारा वर्षों से मिल रहे अल्प वेतन से व्यथित होकर चलाए जा रहे आंदोलन की चर्चा सुर्खिंयों में है। अपने वेतन को बढ़ाने की मॉग पर आंदोलनरत शिक्षक सरकार पर आरोप लगाते हैं कि सरकार का धयान सरकारी स्कूलों की बेहतरी में नहीं है। और वो इसे और पंगु बना बनाना चाहती है ताकि ज्यादातर पालक निजी संस्थाओं की चले जाए।आंदोलनकारि शिक्षकों के नेता बतलाते हैं कि प्रदेश सरकार केंद्र से उनके हिस्से का पूरा वेतन लेकर उसे लोकलुभावन योजनाओं में बांटती है ताकि वोटबैंक मजबूत हो जाए।वास्तव में म.प्र. और छत्तीसगढ़ के आंदोलनकारी शिक्षकों के शोषण और केंद्र से प्राप्त राशि के दुरूपयोग की खबरों को मानव संसाधान मंत्रालय को संज्ञान में लेना चाहिए क्योंकि ये मुद्दे शिक्षा के स्तर से जुड़े हुए है।शिक्षा के अधिकार कानून के मुताबिक शिक्षकों के पदों की पूर्ति के लिए निर्धारित समय सीमा 31 मार्च आने में मात्र दो माह शेष है लेकिन अकेले म.प्र. के प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों के लगभग एक लाख पद रिक्त हैं।प्रदेश के हजारों स्कूल अतिथि शिक्षकों के हवाले है। प्रदेश में केंद्र सरकार द्वारा प्राथमिक शिक्षा की बेहतरी के लिए आवंटित धानराशि का भारी दुरूपयोग के अनेक मामले सामने आ रहें हैं।म.प्र. में शिक्षा विभाग द्वारा करोड़ों की राशि से देवपुत्र नामक अनजानी सी पत्रिका खरीदे जाने की बात भी चर्चा में है। ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूल शिक्षक विहीन तो है ही साथ ही सुविधा विहीन भी है।बैठने के लिए बेंचें नहीं है पीने पानी नहीं हैं और शौचालय तो दूर की बात है।पढ़ाई के मुद्दे पर शिक्षक बतलाते हैं कि उनका अधिकांश समय मध्यान्ह भोजन की व्यवस्था में गुजरता है, क्योंकि यह संवेदनशील मुद्दा और इसमें ढील मतलब बच्चों की जान पर बाजी। मधयान्ह भोजन की कथा व्यथा ही अलग है यह बहुत ही गंदी परिस्थितियों मे तैयार किया जाता है, इसके लिए न तो व्यवस्थित किचन है और न ही प्रशिक्षित रसोईये और इसमें अक्सर छिपकली और कीड़ें निकलते रहतें हैं जिसकी जिम्मेदारी भी शिक्षकों की रहती है।

वास्तव में प्राथमिक शिक्षा का स्तर लगातार गिरते जाना चिंतन का विषय हैं और इसमें राज्य सरकारों की ढील ज्यादा समझ में आती हैं। अगर राज्य सरकारें स्कूलों में सुयोग्य शिक्षकों की तैनाती करें उन्हें सम्मानजनक वेतन दे,विद्यालयों में मूलभूत सुविधाओं की पूर्ति करें और रोचक पाठयसामग्री को पढ़ाई में शामिल छात्रों के शैक्षणिक स्तर में सुधार अवश्य होगा।शिक्षा का अधिकार अधिनियम तो शैक्षणिक सुधार की गारण्टी है बशर्ते इसके अनुरूप व्यवस्था और क्रियान्वयन होना चाहिए।  (अतुल कुमार श्रीवास्तव)

कब होगा पूरा सपना

तुल कुमार श्रीवास्तव

सर्व शिक्षा अभियान एक समयबध्द एकीकृत योजना के रूप में राज्य सरकारों के सहयोग से सब तक प्रथामिक शिक्षा पहुंचाने के दूरगामी लक्ष्य प्राप्त करने की एक ऐसी ऐतिहासिक पहल हैं। जो देश की प्राथमिक शिक्षा का रूप बदल देने के लिए प्रतिबध्द है और जिसका उद्देश्य 6-14 वर्ष के आयु के सभी बच्चों को उपयोगी और गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा दिलवाना हैं। एसएसए को प्राथमिक शिक्षा के 2007 तक एंव बुनियादी शिक्षा के 2010 तक सर्वत्रीकरण कर लेने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। बाद में इसकी समयसीमा को 2012 तक बढ़ा दिया गया। वर्ष 1998 में राज्यों के शिक्षामंत्रीयों के सम्मेलन में दिए गए सुझावों के आधार पर 2001 में सर्व शिक्षा अभियान को शुरू किया गया था।

यद्पि 2002 में किए गए 86वें संविधान संशोधन में बुनियादी शिक्षा को मूलभूत अधिकार बना दिया गया। नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने के प्रानधान को लागू करने के लिए बच्चों को नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार का अधिनियम संसद से अगस्त 2009 तक पारित नहीं कराया जा सका था। वर्ष 2001 सर्व शिक्षा अभियान को लागू किए जाते समय 6-14 आयु वर्ग के 3.40 करोड़ बच्चे स्कूल नहीं जा रहे थे। इसके चार वर्ष बाद 85 प्रतिशत आंवटित धनमाशि खर्च होने के बावजूद 40 प्रतिशत बच्चे (1.34 करोड़) बच्चे स्कूल से बाहर रह गए थे।

वर्ष 1999-2000 से 2009-10 तक के केन्द्रीय बजटों में लगभग 57,000 करोड़ रूपये एसएसए के लिए आंवटित किए गए थे। पर देश को विश्व में बच्चों की शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी बनाने के लिए आधारभूत संरचना तैयार करने,प्रशिक्षित अध्यापकों की उपलब्धता और शिक्षक-छात्र अनुपात में भी कमी लाने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी हैं। चूंकि ईएफए ग्लोबल मॉनीटरिंग रिपोर्ट 2010, यूनेस्को के अनुसार भारत का स्थान 128 देशों में 105 वां है। और अपना देश अभी भी आंकड़ों के अनुसार कुछ अफ्रीकी देशों जैसे पाकिस्तान और बांग्लादेश के उस वर्ग में है जिसका शैक्षिक विकास सूचकांक (ईडीआई) कम है।

भारतीय ‘भविष्य’ के कुचलते सपने…

अतिया फिरदोस

“मूनमून क्या कर रही हो? जल्दी से जलावन के लिये लकड़ियां चुन के ले आ… बहुत देर हो गयी है. आज घर में कुछ बनेगा भी कि नहीं…” परेशान आवाज़ में मूनमून की माँ मूनमून को आवाज़ लगा रही थी.

मूनमून ग्यारह साल की बच्ची थी. वह दरवाजे पर खेल रही थी. माँ के ये आवाज़ सुनते ही वो मन मसौस कर जलावन चुनने निकल पड़ी. जिस रास्ते से मूनमून लकड़ी चुनने जाती थी, वही रास्ता एक सरकारी स्कूल की तरफ भी जाता था.

मूनमून रोज़ बहुत सारे बच्चों को स्कूल जाते देखती थी. उसका भी मन उन बच्चों को स्कूल जाते देख स्कूल जाने को करता था. वह कई बार अपनी माँ से ये पूछा भी करती थी कि वह स्कूल क्यों नहीं जाती. माँ का हमेशा एक ही जवाब होता – “अगर तुम स्कूल जाओगी तो खाना बनाने के लिये जलावन कौन लाएगा? घर के और घरेलू काम कौन करेगा? पढ़ने लिखने से घर थोड़े न चलता है…”

मूनमून की तरह न जाने ऐसे कितने ही बच्चे होंगे जो शिक्षा से महरूम हैं. ज़का सोचिए! भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के लिये ये कितने शर्म की बात है कि 3 मिलियन बच्चे रोड पर रहने को मजबूर हैं. 150 मिलियन से अधिक बच्चे किसी न किसी तरीके से बाल मजदूरी का शिकार हैं. इतना ही नहीं, हर छह लड़कियों में से एक अपना पन्द्रहवां जन्मदिन कभी नहीं मना पाती.

ये कितना हास्यप्रद है कि बाल शिक्षा के राष्ट्रीय नीति होने के बावजूद देश में केवल 50 फीसदी बच्चे ही शिक्षा ग्रहण कर पाते हैं. हम सशक्त भारत का सपना देखते हैं, लेकिन ये कैसे मुमकिन है कि देश के बच्चे को इतने बड़े पैमाने पर शिक्षा से महरूम रखकर हम ये सपना देखें. नेता से लेकर आमलोग ये कहते मिल जाते हैं कि “बच्चे देश का भविष्य हैं” ये कैसे देश का भविष्य बनायेंगे, जब इनका ही कोई भविष्य नहीं है.

सरकारी आंकड़ों के हिसाब से सितम्बर 2004 तक छह से चौदह आयु वर्ग के 193 मिलियन बच्चे इस देश में रहते थे, जिनमें से 8.1 मिलियन बच्चे का किसी भी स्कूल में नाम था ही नहीं. प्राईमरी स्कूल की बात अगर छोड़ दी जाए, तो 193 मिलियन बच्चों में से केवल 30.5 बिलियन बच्चे ही आगे की पढ़ाई कर पाते हैं. यह आंकड़े पुराने ज़रूर हैं, पर सच्चाई इन आंकड़ों में ही छिपी हुई है. हालात में कुछ खास बदलाव नहीं आ पाया है. जबकि इस देश में 6 से 14 साल के बच्चों के लिये मुफ्त शिक्षा अनिवार्य है. मुफ्त शिक्षा के साथ-साथ मध्याह्न भोजन भी मुफ्त दिया जाता है.

कभी आपने सोचा है कि शिक्षा की इस बदहाली की असल वजह क्या है? नहीं ना… तो आईए ज़रा इस पर गौर करते हैं. हम जानते हैं कि रोटी, कपड़ा और मकान हमारी मूलभूत आवश्यकता है और हमेशा रहेंगी. इसके आभाव में आदमी न एक क़दम चल सकता है न ही कोई क्रांतिकारी विचारों का सृजन कर सकता है. रोटी, कपड़ा और मकान की आवश्यकता पूर्ण होने के बाद इंसान की पहली आवश्यकता शिक्षा ही होती है. परन्तु अगर मनुष्य उन्हीं तीन मूलभूत आवश्यकता में सिमटा रहेगा तो शिक्षा के बारे में कैसे सोच सकेगा?

सरकार को सबसे पहले लोगों की जीवन शैली को ऊँचा उठाना होगा. ज़रूरतमंद लोगों को मूलभूत अवश्यकता को पूरा करना होगा. तभी लोग अपने बच्चे को स्कूल भेजने का साहस जुटा पाएंगे.

दूसरी अहम वजह हमारी स्कूली शिक्षण व्यवस्था है. जिसकी बदहाली शायद ही किसी से छुपी हुई है. आज भी अगर कोई आराम-तलब नौकरी है तो वो सरकारी स्कूल के शिक्षक की हैं. शिक्षक होते हैं तो बच्चे नदारद, बच्चे होते हैं तो शिक्षक नदारद….

सरकारी स्कूलों में शिक्षा-मित्रों की धांधली पूर्वक नियुक्ति ने भारतीय शिक्षण व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल खड़ा किया है. कई अयोग्य शिक्षक आनन-फानन में भर्ती कर लिये गये हैं, जो अंततः बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ ही करेंगे. सरकारी स्कूल की इन्हीं लचर व्यवस्था की वजह से समाज का तथाकथित संभ्रांत परिवार अपने बच्चों को कभी भी यहाँ नहीं पढ़ाना चाहता. संभ्रांत परिवार तो दूर की बात है, खुद सरकारी शिक्षक भी अपने बच्चों को अपने ही स्कूल में पढ़ाने से कतराते हैं.

जेएनयू में समाजशास्त्र विषय में शोध कर रहे संजय कुमार का कहना है कि शिक्षा को लेकर समाज में अभी भी पर्याप्त जागरूकता नहीं आयी है. उनका कहना है कि शिक्षा की हालत गाँवों में बेहद दयनीय है. बच्चे खासकर लड़कियां वहां उच्च शिक्षा लेने से पहले ही स्कूल से नाम कटवा लेती हैं. इसकी एक वजह यह है कि यहां कम उम्र में ही उनकी शादी करवा दी जाती है या फिर उसे घर के कामों में लगा दिया जाता है. समाज में स्त्रियों की शिक्षा के प्रति उदासीन भाव भी चिंता का एक विषय है.

संजय बताते हैं कि भारत में 5 से 9 वर्ष की आयु समूह की लड़कियों में से 53 प्रतिशत अशिक्षित है. वो शिक्षक छात्र अनुपात पर भी चिंता जाहिर करते हुए बताते हैं कि हमारे देश के 60 प्रतिशत स्कूलों में कक्षा 1 से 5 तक केवल 2 शिक्षक ही मौजूद हैं. यही नहीं, कई गांवों में आज भी स्कूलों का काफी अभाव है. ज़्यादातर गांव में स्कूल दूर-दूर होते हैं, जिनकी वजह से बच्चे लगातार स्कूल नहीं जा पातें.

संजय बताते हैं कि स्कूलों में साफ सफाई का स्तर भी बहुत निम्न किस्म का होता है. खासकर लड़कियों के लिये अलग से शौचालय का निर्माण बेहद ज़रुरी है. बहुत सारे स्कूलों में शौचालय उपयोग करने लायक है ही नहीं. इससे लड़कियों में असुरक्षा की भावना भी उभरती है और स्कूल जाने से कतराती हैं.

मूनमून की तरह लाखों लड़कियां पढ़ना चाहती हैं… कुछ बनना चाहती हैं… परन्तु सरकार और समाज की इन्हीं विसंगतियों की वजह से वो पढ़ नहीं पाती हैं. हम युवा आबादी पर गर्व करते हैं. बहुतेरे का मानना है कि इन्हीं युवा आबादी की बदौलत भारत पूरे विश्व पर छा जाने का माद्दा रखता है. लेकिन अगर आज के बच्चे शिक्षित नहीं होंगे तो कल यही युवा आबादी भारत पर बोझ बन जयेगी. अपर्याप्त शिक्षा इन्हें गलत रास्ते पर ले जा सकती है. अपूर्ण शिक्षित बच्चे भविष्य में ऐसे बेरोज़गार युवाओं की फ़ौज तैयार हो सकती है,जिनकी कार्य क्षमता नगण्य होगी. ये भारत जैसे विकासशील से विकसित देश बनने की चाह रखने वाले देश के लिये कतई शुभ संकेत नहीं है।

http://beyondheadlines.in/2015/01/education-2/

मिड-डे मिल से बच्चों के साथ-साथ मास्टर साहब का भी पेट भरता है- विशेष रिपोर्ट

अतुल कुमार श्रीवास्तव

Mid_Day_Meal_Programme_Bangalore-650x330

देश भर के सरकारी स्कूलों में मिड-डे मिल एक विषय के रूप में बन गया। कहा जाए तो इसकी वजह से बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पूरी तरह से चौपट हो रही है। मास्टर साहब को भी आराम करने का पूरा समय मिल ही जाता है और तो और विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों की तो मौज ही मौज है। एक तरफ सरकारी दावे और दूसरी तरफ जमीनी हकिकत! सवाल अहम इसलिए हो जाता है कि बच्चे स्कूलों में पढ़ने जाते हैं या फिर दिन गिनने।

मास्टर साहब खाना खा-पीकर खैनी ठोकते हुए आते हैं और यहां बच्चे खाना खाने के समय पर पहुंच ही जाते हैं। राशन पानी का बराबर हिसाब प्रचार्य महोदय स्वयं करते हैं ताकि ारी लगने लगी हैं, उसके बदले वो थाली-कटोरी और चम्मच लेते आते हैं। सरकार और प्रशासन के साथ ग्रामीण भी चुप रहते हैं। सभी लोगों का पेट इसी से भरता है। गरीब-अमीर सबका पेट इस मिड-डे मिल के वजह से भरता है।

स्कूलों में मिड-डे मिल के लिए भोजन पर सरकार हर साल करोड़ो रूपए खर्च करती है, इसके योजना को शुरू हुए करीब 8 साल हो गए लेकिन प्रशासन ने अभी तक स्कूलों में थालियों या पत्तलों की भी व्यवस्था नहीं की। इसकी वजह से बच्चों को बहुत ही परेशानियों का सामना करना पड़ता है । इतना ही नहीं देश के कई ऐसे राज्य हैं जहां पानी पीने तक की व्यवस्था नहीं है। सरकार और प्रशासन चावल के बोरियों को बेच-बेच कर खाद्य सामग्री लाते हैं।

साल 2000 में करीब देश-भर के सभी प्राथमिक विद्यालयों के लिए करीब 2500 रू थाली खरीदने के लिए दिया गया था लेकिन एक रिपोर्ट के अनुसार ये थालियां 6 महीने के अंदर ही गायब हो गई। आज स्थिति यह हो गई कि बच्चे किताबें छोड़कर थालियां ढो रहे हैं।

सरकार को यो स्थानीय प्रशासन को बच्चों की भविष्य की चिंता करनी चाहिए। जो बच्चे कल के हमारे भविष्य हैं वो वर्तमान में अंधेरे में है। ग्रामीण भी इस बात को समझ नहीं पा रहे हैं। सरकार बच्चों की उपस्थिति तो दिखा रही है लेकिन पढ़ाई के आंकड़े कितनी अच्छी है, ऐसा फाईल सरकार के पास अभी तक मौजूद नहीं होगी।

बच्चों की जिंदगी मिड-डे मिल में लगा दिए। हमको पढ़ाई को प्रथमिकता देनी चाहिए, पढ़ाई की वजह से हम आगे बढ़ सकते हैं और अपने बच्चों को भी आगे बढ़ा सकते हैं।(स्रोत-बिकीमीडिया)

अक्षय पात्र का बढ़ेगा दायरा

अतुल कुमार श्रीवास्तव  

इंफोसिस और टाटा ग्रुप की फिलंथ्रापिक यूनिट्स यानी परोपकार से जुड़े काम करने वाली इकाइयां मिलकर 200 करोड़ रूपये से ज्यादा बेंगलुरू के एनजीओ  अक्षय पात्र को देंगी। यह संगठन स्कूलों में लंच प्रोग्राम चलाता है। यह दुनिया में किसी एनजीओ कि ओर से चलाया जाने वाला इस तरह का सबसे बड़ा कार्यक्रम है। इस रूपये का उपयोग अक्षय पात्र के कामकाज का दायरा बढ़ाने और ताजातरीन फूड टेक्नोलॉजी से लैस किया जाएगा। ताकि खाना जल्द बन सके, उसकी लागत घटे और गुणवत्ता भी बेहतर हो सके।

इंफोसिस के फाउंडर एन नारायनमूर्ति की पत्नी सुधा मूर्ति के नेतृत्व वाला ‘द् इंफोसिस फाउंडेशन’127 करोड़ रूपये देगा, जिससे तीन आधुनिक किचेन बनाये जाएंगे। इसके अलावा 20 करोड़ और देगा। जमशेद जी टाटा ट्रस्ट 55 करोड़ रूपये देगा, जिससे एनजीओ को लेटेस्ट टेक्नोलॉजी हासिल करने और फूड सेफ्टी बेहतर करने में उपयोग किया जाएगा। अक्षय पात्र के काम करने के मॉडल की अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने 2008 में प्रसंशा की थी।उन्होंने कहा था कि इसे दूसरे देशों में भी अपनाया जाना चाहिए।

इसे ‘इंटरनेशनल सोसायटी फॉर कृष्ण कांशशनेस’ चलाती हैं। इस रकम के साथ संगठन अगले पांच वर्षों में 10 राज्यों में 50 लाख बच्चों को सुविधा देने का लक्ष्य बनाएगा। अभी यह 15 लाख बच्चों को खाना मुहैया कराता है। इंफोसिस से मिलने वाली रकम से जोधपुर और हैदराबाद में मॉडर्न किचेन बनाए जाएगें।

जोधपुर वाले किचेन में रोज 50,000 बच्चों के लिए और हैदराबाद के किचेन में 1 लाख बच्चों के लिए खाना बनाने की क्षमता होगी।आईटी कम्पनी जोधपुर,हैदराबाद और मैसूर में किचेन को ऑपरेशन कास्ट भी देगी। साथ ही वह राजस्थान में लगभग 1.5 लाख बच्चों को दिए जाने वाले भोजन और बोतल बंद पेयजल का खर्च उठाएगी। टाटा ग्रुप देशभर में 22 किचेन के लिए क्वालिफाइड फूड सेफ्टी इंस्पेक्टर्स की हायरिंग और अहमदाबाद, बेंगलुरू, भुवनेश्वर,और लखनऊ में चार मार्डन फूड लैब्स का खर्च उठाएगी। इनमें से हर लैब पर करीब 50 लाख का खर्च आएगा।

(स्रोत- इंटरनेशनल सोसायटी फॉर कृष्ण कांशशनेस)

बाल साक्षरता में भारत का शानदार सुधार

अतुल कुमार श्रीवास्तव

भारत ने बाल साक्षरता की दिशा में शानदार प्रगति की है।संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2000 से 2012 के बीच भारत में स्कूल न जाने वाले बच्चों की संख्या में 1.6 करोड़ तक की कमी आई है। हालांकि अब भी 14 लाख बच्चे ऎसे हैं जो स्कूल नहीं जाते। रिपोर्ट के अनुसार,स्कूल न जाने वाले बच्चों की संख्या में सबसे अधिक कमी दक्षिण एशिया में आई है। यहां 2000 से 2012 के बीच ऐसे बच्चों की संख्या में 2.3 करोड़ की कमी आई। यह जानकारी यूनेस्को और यूनिसेफ द्वारा तैयार साझा रिपोर्ट फिक्सिंग द ब्रोकन प्रॉमिस ऑफ एजुकेशन फॉर आल :फांइड़िग्स फ्रॉम द ग्लोबल इनीशिएटिव ऑन आउट ऑफ स्कूल चिल्ड्रन में दी गई है। 42 देश ऐसे थे,जो वर्ष 2000 और 2012 के बीच प्राथमिक कक्षाओं में स्कूल न जा पाने वाले बच्चों की संख्या को आधे से ज्यादा कम करने सफलरहे।                                                                                                                    इनमें अल्जीरिया,बुरूंडी,कंबोडिया,घाना,भारत,ईरान,मोरक्को ,नेपाल ,मोजांबिक, निकारागुआ,रवांडा,वियतनाम,यमन और जांबिया शामिल हैं। हालांकि कई देशों द्वारा इतनी प्रभावशाली प्रगति के बावजूद वर्ष 2012 में दुनिया भर में प्राथमिक स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की उम्र के लगभग नौ फीसद बच्चे ऐसे थे जो स्कूल नहीं जाते थे। इनमें लड़को की संख्या इस उम्र के लड़कों की कुल संख्या का 8 फीसद थी और लड़कियों की संख्या इस उम्र की लड़कियों की कुल संख्या का 10 फीसद थी। स्कूल न जाने वाले बच्चों की कुल संख्या 5.8 करोड़ थी और इसमें3.1 करोड़ लड़कियां थीं।   (स्रोत-प्रेट्र)

भविष्य पर ताला

अतुल कुमार श्रीवास्तव

भविष्य पर ताला

शिक्षा पर ताला देश भर में लगभग एक लाख सरकारी स्कूल या तो बंद किए जा चुके है या बंद होने की प्रक्रिया में है। धडल्ले से विभन्न राज्यों में इन स्कूलों पर ताला लग रहा हैं। और इसे नाम दुया जा रहा है युक्तीकरण या सामान्यीकरण।आम भाषा में कहें तो इसका अर्थ है दो या तीन स्कूलो का एक में विलय। इन स्कूलों का एक में विलय।इन स्कूलों को बंद करने के पीछे तर्क देश भर में एक जैसा हैं,बच्चों की कम सख्या ,

अध्यापकों की कमी और बुनियादी सुविधाओं का अभाव।स्कूलों को बन्द करना सीधे-सीधे वर्ष 2009 में बनें शिक्षा के अधिकार कानून की मूल भावना का उल्लघंन हैं,जो हर बच्चे को शिक्षा पाने का मौलिक अधिकार देता है और जिसका नारा है और जिसका नारा है,घर के दरवाजे पर स्कूल।लाखों बच्चों भविष्य अंधकार हो रहा है और देश की शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी कहती है कि उन्हें पता ही नहीं कि ऎसा कुछ घटित भी हो रहा है। इस बात का अंदेशा है कि यह सब विश्व बैंक के इसारे पर हो रहा है।

बंद किए जाने वाले स्कूलों के आकड़ों पर बात करें तो राजस्थान में 17 हजार 129 स्कूल ,महाराष्ट्र में 13 हजार 905,कर्नाटक में 6000,गुजरात में 13,450,आंध्रप्रदेश में 5,503,तेलंगाना में 4000,उड़ीसा में 5000, मध्यप्रदेश में 3500,उत्तराखंड में 1200 तथा तमिलनाडु में 3000 स्कूलों के बंद किए जाने की सूचना है। मिसाल के तौर पर बिहार,झारखण्ड,पश्चिम बंगाल आदि में सरकारी स्कूलों को बंद करने की रफ्तार कम हैं।

प्रमुख राज्यों में बंद किए स्कूल:-

क्रमांक     राज्य बंद स्कूल क्रमांक          राज्य  बंद स्कूल
1. राजस्थान 17,129 6. उड़ीसा 5000
2. गुजरात 13,450 7. तेलंगाना 4000
3. महाराष्ट्र 13,905 8. मध्य प्रदेश 3500
4. कर्नाटक 6000 9. तमिलनाडु 3000
5. आंध्र प्रदेश 5,503 10. उत्तराखंड 1200

 स्रोत:तहलका                      

अभी भी दूर हैं बच्चे

अतुल कुमार श्रीवास्तव

                                                        अभी भी दूर हैं बच्चे

मानव संसाधन विकास मंत्रालय के द्वारा कराये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में 6 से 13 वर्ष के आयु के बच्चों की कुल संख्या 20.41 करोड़ है, जिसमें से लगभग 60.41 (2.97प्रतिशत) लाख बच्चे स्कूल से बाहर हैं। इस आयु के बच्चों का 2009 में स्कूल से बाहर रहने का प्रतिशत 4.28 था। और 2006 में 6.99 प्रतिशत था। इस वर्ष के आकड़े पिछले आकड़ो की तुलना में कम हैं। यह अध्ययन सरकार द्वारा प्रयोजित योजनाओं और नीतियों के सकारात्मक प्रभाव के संकेत करते हैं। ऐसे रिपोर्ट नियमानुसार परिवार सर्वेक्षण पर आधारित होते हैं। ऐसे सभी बच्चों को इस सीमा में शामिल किया जाता हैं जो एक शैक्षिक वर्ष में 45 दिन तक स्कूल में उपस्थित नहीं थे।

इस सर्वेक्षण से पता चलता है कि बालकों (2.77%) की अपेक्षा  बालिकाओं(3.23%)की स्कूल से बाहर रहने की प्रतिशत बहुत ज्यादा हैं,शहर के बच्चों (2.54%) की अपेक्षा गांव के बच्चे (3.13%) में स्कूल से बाहर रहने की दर ज्यादा हैं। इसके अलावा 4.43 प्रतिशत मुस्लिम बच्चे,4.7 प्रतिशत अनुसूचित के बच्चे और 28.07 प्रतिशत विशेष आवश्कता वाले बच्चों का (children with special needs) स्कूल से बाहर होने का अनुमान हैं। हाल के दिनों में कुछ अन्य सर्वेक्षणों में भी इस तरह के क्षेत्रीय ,लैंगिक और ग्रामीण/शहरी अन्तर दिखाई पड़ा हैं। स्कूल से बाहर रहने के पीछे गरीबी और शैक्षिक अरूचि सामनें आयी हैं।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय की अगस्त,2014 की रिपोर्ट ‘सभी के लिए शिक्षा’ (Education for all)  में ढ़ाचागत सुधार, परिवहन उपलब्ध कराने, किताबें,वर्दी आदि पर बहुत ज्यादा जोर दिया जाता हैं। इस तरह के सर्वे से अन्तर वर्गीय विश्लेषण होता है। इस अध्यन मे ये भी पता चला की शिक्षा में किस प्रकार भेद भाव होता हैं। उच्च जाति-शहरी बालक की अपेक्षा निम्न जाति-ग्रामीण-बालिका या बालक के संसाधन का भी पता चलता है। ( स्रोत—क्रानिकल)