महिला साक्षरता के मामले में उत्तर प्रदेश का देश में ३१ वां स्थान है। लड़कों की प्राथमिक शिक्षा पूरी करने की दर जहाँ 50% है वहीँ लड़कियों की दर सिर्फ 27% ही है। सबसे अधिक वंचित समूह की बालिकाएं दलित व मुस्लिम समुदायों की हैं। राष्ट्रीय जनगणना संसथान के आंकड़ों के अनुसार, मुस्लिम बालिकाओं व ग्रामीण उत्तर प्रदेश की महिलाओं की साक्षरता दर मात्र 26.7% है और सिर्फ 9.6% ही अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी कर पाती हैं। दलित बालिकाओं की ग्रामीण साक्षरता दर अत्यंत ही ख़राब है व 24.6% आंकी गयी है और इनमे केवल 10.4% ही अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी कर पाती हैं।
शिक्षा की असंतोषजनक स्थिति का पता अन आई यू पी ऐ द्वारा जारी किये गए शिक्षा के विकास के सूचकों से ही पता चल जाता है। इन आंकड़ों के अनुसार प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में ३५ राज्यों की सूची में उत्तर प्रदेश का स्थान २७ वां है और उच्च प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में राज्य 30 वें स्थान पर है। राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् की एक ताज़ी रिपोर्ट के अनुसार लगभग 38543 घर बिना प्राथमिक विद्यालयों के हैं या शिक्षा गारंटी योजना के कार्यक्षेत्र से बाहर हैं। उत्तर प्रदेश के लगभग 20 जिलों में साक्षरता दर 50 % से कम है। इसके अलावा हाशिये व वंचित समुदायों के 7.85 लाख बच्चे अभी भी मुख्यधारा से बाहर हैं। दलित व आदिवासी बच्चों के साथ साथ मुस्लिम लड़कियों के नामांकन का स्तर राष्ट्रीय औसत से कम बना हुआ है। साथ ही मुस्लिम बच्चों की एक बड़ी संख्या 15000 से अधिक मदरसों व 10000 से अधिक मख्ताबों में नामांकित हैं। ये दोनों ही प्रकार के औपचारिक व अनौपचारिक विद्यालय धार्मिक शिक्षा व उर्दू सिखाने के लिए राज्य भर में चल रहे हैं. मदरसे, प्रवाह के प्रतिकूल चल रहे संसथान होते हैं जो की गरीब मुस्लिम परिवारों से आनेवाले बच्चों को अस्थिर व अपर्याप्त शिक्षा देते हैं. उनकी स्थिति की अंदाज़ा उनके कमज़ोर बुनियादी ढांचों, पुराने व अप्रचलित अध्यापन, निम्न स्तरीय शिक्षकों व सीखने के अत्यधिक निम्न परिणामों से लगाया जा सकता है ड्रॉप आउट बच्चों की दर चेतावनीपूर्ण है खासतौर पर हाशिये पर रहनेवाले परिवारों के बच्चों की क्यूंकि इन बच्चों के द्रोपौत की दर ऊंची जाती व समुदायों से आनेवाले बच्चों से ज्यादा होती है (4). इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य ये है किऐसे कई बच्चे जो कि सरकारी विद्यालयों से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं वे ठीक से पढ़ लिख नहीं पाते और न ही अंकगणित के साधारण सवाल ही सुलझा पाते हैं। शिक्षा कि इस स्थिति के लिए कई कारक ज़िम्मेदार हैं।(अतुल कुमार श्रीवास्तव)

उत्तर प्रदेश में 92 हजार शिक्षा मित्रों का समायोजन शीघ्र

लखनऊ: प्रदेश के बेसिक शिक्षामंत्री राम गोविन्द चौधरी ने बताया कि विभाग द्वारा अध्यापकों की कमी को दूर करने हेतु प्राथमिकता के आधार पर भर्ती की जा रही है। अभी तक 18,127 अध्यापकों की भर्ती की जा चुकी है। इसके अतिरिक्त 15,000 बी0टी0सी0 अभ्यर्थियों के चयन हेतु विज्ञापन जारी किया जा गया है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2014-15 में प्राथमिक विद्यालयों के लिए 72,825 बी0एड0, टी0ई0टी0 अर्हताधारी प्रशिक्षु की भर्ती की प्रक्रिया गतिमान है।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2014-15 में उच्च प्राथमिक विद्यालयों में विज्ञान/गणित अध्यापकों की सीधी भर्ती हेतु 29,334 पदों पर सीधी भर्ती की प्रकिया गतिमान है। बेसिक शिक्षामंत्री ने बताया कि प्रदेश में 1,65,306 शिक्षा मित्र कार्यरत थे, जिसमें से प्रथम चरण में प्रशिक्षण पूर्ण कर चुके 58,903 शिक्षा मित्रों का सहायक अध्यापक के पदों पर समायोजन किया गया है। द्वितीय चरण में लगभग 92,000 शिक्षा मित्रों का प्रशिक्षण पूर्ण हो चुका है। परीक्षा परिणाम घोषित होने के उपरान्त इनके समायोजन की कार्यवाही की जायेगी। उन्होंने कहा कि विभाग द्वारा शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हेतु प्रत्येक जनपद के प्राचार्य जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी, खण्ड अधिकारी एवं सह-समन्वयक, बी0आर0सी0 द्वारा दो-दो विद्यालय गोद लेने के निर्देश दिए गये है। इस संबंध में जनपदों से सूची एकत्रित की जा रही है। उन्होने बताया कि विद्यालय में पठन-पाठन की समुचित व्यवस्था एवं शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हेतु राज्य स्तरीय, जनपद स्तरीय एवं विकास खण्ड स्तरीय टास्कफोर्स गठित की गई है। सभी अधिकारियों को विद्यालय निरीक्षण के लक्ष्य आवंटित किये गये है, जिसके अनुसार विद्यालयों का निरीक्षण हो रहा है।
उन्होंने बताया कि शिक्षकों की विद्यालयों में शत-प्रतिशत उपस्थित सुनिश्चित करने के निर्देश दिये गये है। जिन जनपदों में बेसिक शिक्षा की प्रगति खराब पाई जायेगी तो वहां के बेसिक शिक्षा अधिकारी के विरूद्ध कठोर कार्यवाही की जोयगी। उन्होंने कहा सभी जनपदों में नियुक्तियों को पारदर्शी तरीके से करने के निर्देश दिये गये हैं जहां कहीं पर भी भ्रष्टाचार की शिकायत प्राप्त होगी वहां कठोर कार्यवाही की जायेगी।(अतुल कुमार श्रीवास्तव)

शिक्षा

केरल की शिक्षा व्यवस्था भारत के अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा आधुनिक है। केरल के विकास मॉडल में शिक्षा और स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण योगदान है। आजादी के बाद से सबसे अधिक परिवर्तन और विकास शिक्षा के क्षेत्र में ही हुए हैं। राज्य में 1956 से अस्सी के दशक के मध्य तक उच्च शिक्षा क्षेत्र के विस्तार और स्तरीय विकास मद्देनजर उदार शिक्षा नीति चलाई। वर्तमान में दूसरे राज्यों की तुलना में यह राज्य उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सबसे आगे हैं, राष्ट्रीय स्तर पर साक्षरता दर जहां 65.38% है वहीं केरल की 90.86%

केरल में स्कूल, कॉलेज राज्य सरकार या फिर निजी संगठन इसका संचालन करते हैं।केरल में स्कूलों को इंडियन सर्टिफिकेट ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (आईसीएसई), सेंट्रल बोर्ड फॉर सेकेंडरी एजुकेशन (सीबीएसई) और केरल राज्य शिक्षा समिति द्वारा मान्यता प्राप्त होते हैं। राज्य का शिक्षा विभाग प्राथमिक शिक्षा पर विशेष ध्यान देता है। केरल के प्राथमिक विद्यालयों में निजी सहायताप्राप्त, निजी गैर सहायताप्राप्त और सरकारी विद्यालय शामिल हैं। राज्य के विद्यालयों को अंग्रेजी और मलयायम दोनों भाषाओं में विद्यालयों में शिक्षा के माध्यम के रूप में चुनने की अनुमति है वैसे अधिकांश निजी विद्यालय अंग्रेजी माध्यम में ही शिक्षा देते हैं। माध्यमिक स्तर की दस साल की शिक्षा के पड़ाव को पार करने के बाद विद्यार्थी उच्च माध्यमिक शिक्षा की पढ़ाई के लिए तीन विषयों विज्ञान, वाणिज्य और मानविकी में से किसी एक विषय का चयन कर सकते हैं। इसके अलावा शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान, शारीरिक रूप से अक्षम लोगों और एंग्लो भारतीय विद्यालय भी मौजूद हैं।

केरल का बेहतरीन शिक्षा तंत्र अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विद्यार्थियों को आकर्षित करता है। राज्य में शिक्षण संस्थानों की संख्या तेजी से बढ़ी है। वर्तमान में (2006-07) यहां 12644 विद्यालय, जिनमें 2790 उच्च विद्यालय, 3037 उच्च प्राथमिक विद्यालय और 6817 छोटे स्तरीय प्राथमिक विद्यालय शामिल हैं। विद्यालयों के विभाजन के दौरान यह बात उल्लेखनीय है कि छोटे स्तरीय प्राथमिक विद्यालयों की संख्या 6861 (1980) से घटकर 6817 (2006-07) हो गई है। इसका कारण जनसांख्कीय तरीकों में बदलाव और राज्य के जन्म वृदिध्‍ दर में आई कमी है। निजी गैर सहायताप्राप्त विद्यालयों में उच्च विद्यालयों को अधिक महत्वपूर्ण है, जिसके अंतर्गत कुल विद्यालयों के 13.12% उच्च विद्यालय हैं। वैसे केरल में इन तीन क्षेत्रों में निजी सहायताप्राप्त विद्यालयों की संख्या तेजी से बढ़ी है। इनमें वर्ष 2006-2007 में निजी सहायता प्राप्त विद्यालयों की संख्या 1428, 1870 निजी उच्च प्राथमिक विद्यालय और 39992 निजी सहायताप्राप्त छोटे स्तरीय प्राथमिक विद्यालय थी।

सत्तर के दशक के बाद जनसंख्या में आई गिरावट के बाद विद्यालयों में विद्यार्थियों के नामांकन संख्या में भी काफी कमी आई। वर्ष 2006-07 की तुलना में 2007-08 में विद्यार्थियों के नामांकन में गिरावट का प्रतिशत 1.97 आंका गया। छोटे स्तरीय प्राथमिक विद्यालयों, उच्च प्राथमिक विद्यालयों और उच्च विद्यालयों में नामांकन का प्रतिशत क्रमश: 31.14%, 31.76%, 31.10% था। केरल में विद्यालय छोड़ने का प्रतिशत काफी कम रहा है, छोटे स्तरीय प्राथमिक विद्यालयों में 0.59%, उच्च प्राथमिक विद्यालयों में 0.52%, उच्च विद्यालयों में 1.29% ही रहा है। वयांद जिले में विद्यार्थियों के विद्यालय छोड़ने का अनुपात(10.65%) सर्वाधिक रहा और इस दृष्‍टि से कसारगोड़ में उच्च प्राथमिक विद्यालयों और उच्च विद्यालयों में यह अनुपात अधिक रहा।

विद्यालयों में कुल नामांकन 49.23% की तुलना में हर कक्षा में लड़कियों की संख्या अधिक होती है। इसके अलावा व्यावसायिक माध्यमिक विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या 469968 है, जिनमें 51.86%संख्या लड़कियों की है और स्नातक तथा स्नातकोत्तर स्तर पर भी लड़कियों का अच्छा-खासा प्रतिशत होता है, जो क्रमश: 67% और 78.2%(2006-07) के लगभग होती हैं। इससे यह तस्वीर साफ होती है कि विश्वविद्यालयीन शिक्षा में भी लड़कियां आगे हैं, इससे साबित होता है कि सरकार भी लड़कियों की शिक्षा पर जोर देती है और उन्हें सामान्य विद्यालयों में पढ़ने के लिए प्रेरित करती है। इससे बढ़कर केरल सरकार महिलाओं की स्थिति में आधारभूत परिर्वतन लाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

शिक्षकों के मामले में यहां टीटीआई शिक्षकों को मिलाकर कुल 1,76,126 शिक्षक हैं। इनमें 31.3% सरकारी क्षेत्र में, 60.72% निजी सहायताप्राप्त विद्यालयों और 7.98% गैर सहायताप्राप्त विद्यालयों में हैं। इन तीनों क्षेत्रों में भी महिलाएं पुरुषों की तुलना में 7.4% (2006-07) आगे हैं। यदि पॉलिटेक्निक की बात की जाए तो राज्य में (2007-08) सरकारी पॉलिटेक्निक की संख्या 43 है और 6 निजी सहायताप्राप्त पॉलिटेक्निक थे। हर साल सरकारी पॉलिटेक्निक में नामांकन लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या 8160 और निजी सहायताप्राप्त पॉलिटेक्निक में यह संख्या 1500 है। यहां भी लड़कियां लड़कों से 10% आगे है और इतने ही अनुपात का अंतर तकनीकी उच्च विद्यालयों में भी है।

तकनीकी शिक्षा व्यवस्था के तहत राज्य में इंजीनियरिंग तकनीक, प्रबंधन और वास्तुकला आदि विषय डिप्लोमा डिग्री, स्नातकोत्तर और शोध स्तर पर शामिल हैं। इंजीनियरिंग महाविद्यालय, तकनीकी उच्च विद्यालय, ललित कला महाविद्यालय, पॉलिटेक्निक महाविद्यालय, सरकारी व्यावसायिक संस्थान, सिलाई एवं परिधान निर्माण केंद्र और व्यावसायिक विद्यालय राज्य के तकनीकी शिक्षा व्यवस्था के अंर्तगत आते हैं। कोझिकोड का राष्ट्रीय तकनीकी संस्थान स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के विषयों की पढ़ाई के लिए मान्य विश्वविद्यालय स्तर प्रदान करता है। कोच्चि की विज्ञान एवं तकनीकी (सीयूएसएटी) को एमएचआरडी, भारत सरकार ने आईआईईएसटी स्तर के लिए चुना है। स्वयं वित्त पोषक संस्थानें भी तकनीकी शिक्षा क्षेत्र में मुख्य रूप से संचालित करती हैं।

वर्तमान में केरल में दो मान्य विश्वविद्यालयों को छोड़कर 7 विश्वद्यालय हैं, जो पूरे देश में मौजूद 297 विश्वविद्यालयों का 2.7% है। 2002 में गैर सहायताप्राप्त महाविद्यालयों को छोड़कर कला और विज्ञान महाविद्यालयों में 1.61 लाख विद्यार्थी अध्ययनरत थे। जिनमें 4 विश्वविद्यालयों में केरल, महात्मा गांधी, कालीकट और कानपुर विश्वविद्यालय में कर्इ तरह के विषय मौजूद हैं और ये सभी सामान्य श्रेणी के हैं। विज्ञान और तकनीकी कोच्चि विश्वविद्यालय (सीयूएसएटी), श्री शंकाराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय और केरल कृषि विश्वविद्यालय जैसे तीन अन्य विश्वविद्यालय राज्य में संचालित हो रहे हैं। श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय और कानपुर विश्वविद्यालय हाल ही में बना है, जिनकी स्थापना क्रमश: 1993 और 1995 में हुई थी। केरल के विश्वविद्यालय अब परंपरागत विषयों से हटकर व्यावसायिक और रोजगारोन्मुखी विषयों को शुरू करने पर जोर दे रहे हैं।

कुल मिलाकर कहा जाए तो विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा में सरकार का योगदान सीमित रहा है और यही वजह है कि 224 महाविद्यालय में से 38 ही सरकारी महाविद्यालय हैं। 66 प्रतिशत महाविद्यालय निजी प्रबंधनों द्वारा संचालित होते हैं,जिससे पता चलता है कि निजी क्षेत्र का एकाधिकार काफी अधिक है और साथ ही निजी सहायताप्राप्त महाविद्यालयों की संख्या भी काफी है। इनके अलावा स्वयं वित्त पोषित या निजी गैर सहायताप्राप्त महाविद्यालयों की संख्या तेजी से बढ़ी है और इनकी संख्या अब राज्य में सरकारी महाविद्यालयों के बराबर यानी 38 हो गई है। यही वजह है कि सहायताप्राप्त महाविद्यालयों में गैर सहायताप्राप्त विषयों की संख्या बढ़ती जा रही है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है राज्य सरकार की योजना। केरल में स्कूली शिक्षा का स्तर सार्वभौमिक है, लेकिन उसके मुकाबले उच्च शिक्षा का फैलाव कम है।

साक्षरता

केरल की संस्कृति में महिलाओं में आदर और उच्च स्तर प्राप्त है। यही वजह है कि विभिन्न संस्कृतियों और परंपराओं के बावजूद यहां देश के अन्य राज्यों के मुकाबले महिलाओं के लिए ज्यादा अवसर हैं।

केरल के इतिहास की समीक्षा की जाए तो समाज में उनके आगे बढ़ने की रफ्तार धीरे भले ही थी लेकिन वह बुद्धिपरक थी। अब वे बच्चे और घर के रोजमर्रा के कामों में अकेली नहीं रह गई हैं। परिवार की जरूरतों को पूरा करते हुए भी वे अपने राज्य और अन्य राज्यों में अपनी एक अलग पहचान और मुकाम हासिल कर रही हैं। हमें ऐसे राज्य पर गर्व होना चाहिए, जहां महिलाओं में साक्षरता दर सर्वाधिक है, स्त्रियों का अनुपात पुरुषों की तुलना में अधिक है, यहां गर्भपात या बालिका भ्रूण हत्या जैसी घटनाएं बहुत ही कम संख्या में होती हैं। केरल से यह बात सामने आती है कि साक्षर पुरुषों की संतानें साक्षर होती है लेकिन साक्षर महिलाएं पूरे परिवार को साक्षर करती है।

राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के तहत साक्षरता दर को 90%तक ले जाने तक की योजना है और इससे पूर्ण साक्षरता को हासिल करने का लक्ष्य रखा गया। इस आधार पर केरल (90.86%) को 18 अप्रैल, 1991 को पूर्ण साक्षर राज्य घोषित कर दिया गया। राज्य में महिलाओं का साक्षरता दर 87.86% है, जो राष्ट्रीय महिला साक्षरता दर (33.7%) की तुलना में कहीं अधिक है। जहां राज्य में पुरुषों को साक्षरता दर 94.2% वहीं महिलाओं का 87.86% है। इससे पता चलता है कि कुल जनसंख्या की तीन चौथाई जनसंख्या साक्षर है और महिला पुरुषों के बीच इस अनुपात का अंतर बहुत अधिक नहीं है। केरल में पुरुष साक्षरता वृद्धि दर 0.58% की तुलना में महिलाओं में साक्षरता वृद्धि दर 1.69% (1991-2001) रही। केरल ने 1951 में जिस स्तर को छू लिया था आज भी देश के कई राज्य वहां तक पहुंचाने के लिए प्रयासरत हैं।

केरल में पुरुष-स्त्री साक्षरता दर के बीच का अंतर तेजी से घट रहा है। उदाहरण के लिए देखा जाए तो 1951 में जहां यह अंतर 21.9% था और 2001 में घटकर यह केवल 6.3 % ही रह गया। राष्ट्रीय स्तर पर 2001 में यह अंतर 21.7%।

महिला साक्षरता दर – केरल, भारत (1951-2001)
वर्ष केरल –महिला साक्षरता (%) पुरुष- महिला अंतर (%) भारत-महिला साक्षरता (%) पुरुष- महिला अंतर (%)
1951 36.43 21.92 7.93 17.02
1961 45.56 19.33 12.95 21.49
1971 62.53 14.6 18.69 20.77
1981 65.73 9.53 29.76 26.62
1991 86.17 7.45 39.29 24.84
2001 87.86 6.34 54.16 21.69

स्रोत: भारत की जनगणना

जिलेवार आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि ‘कोट्टयम’ जिला पुरुष और महिला साक्षरता दर दोनों में सबसे आगे है और यह भारत का पहला ऐसा शहर है जहां सौ प्रतिशत साक्षरता (यह एक उल्लेखनीय कीर्तिमान है जिसे 1989 की शुरुआत में ही बन चुका था) है। स्त्री पुरुष साक्षरता दर पालाकाड जिले में सबसे निम्न है। यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि इस जिले में महिला और पुरुष साक्षरता दर के बीच 10% है। यह अधिक चिंता का विषय नहीं कि है यह जिला विकास के कई मायनों में राज्य के औसत से भी कम है।

अनुसूचित जातियों की जनसंख्या की दृष्टि से यह विभाजन इस प्रकार है 88.1% (पुरुष) और 77.6% (महिलाएं) और अनुसूचित जनजातियों में यह क्रमश: 70.8% और 58.1% था।

केरल के अलग-अलग जिलों में साक्षरता दर
जिले साक्षरता (%)
पुरुष स्त्री
कसारगोड 90.84 79.8
कनूर 96.38 89.57
वयांद 90.28 80.80
कोझिकोड 96.30 88.86
मालापुरम 91.46 85.96
पालाकोड 89.73 79.31
त्रिसूर 95.47 89.94
एर्नाकुलम 95.95 90.96
इदुकी 92.11 85.04
कोट्टयम 97.41 94.45
अलपुंझा 96.42 91.14
पठानमथिटा 96.62 93.71
कोलम 94.63 88.60
तिरुअनंतपुरम 92.68 86.26
केरल 94.20 87.86

स्रोत: भारत की जनगणना, 2001

आंकड़ें बताते हैं कि केरल में महिलाओं की साक्षरता का स्तर समय के साथ सुधरता गया है। इस साक्षरता स्तर को लोगों के स्वास्थ्य से जोड़कर देखा जा सकता है। केरल में जन्म मृत्यु दर काफी कम है और जीवन प्रत्याशा अन्य राज्यों की तुलना में कहीं अधिक है। महिलाओं की साक्षरता दर 36.43% (1951) से 87.86% (2001) तक बढ़ना एक उल्लेखनीय कीर्तिमान है और यह समाज में विकास के लिए एक अच्छे संकेत के रूप में दर्शाता है।

कई स्थानीय असामनाताओं के बीच महिलाओं की साक्षरता जनसांख्यिकीय संकेतों के लिए एक प्रेरणास्रोत है। इन संकेतों की बदौलत केरल में महिलाओं की स्वास्थ्य स्थिति में काफी सुधार आया। महिलाओं की साक्षरता और शिक्षा के कारण ही शिशुओं के मृत्यु दर में कमी, आम स्वास्थ्य और स्वच्छता पर प्रभाव पड़ा है।

स्रोत: आईटी विभाग, केरल सरकार (अतुल कुमार श्रीवास्तव)

शिक्षा : प्राथमिक स्कूलों में डगमगाता देश का भविष्य

शिक्षा का नया सत्र प्रारम्भ हो चुका है। ऐसे में हमारी तैयारी क्या है? क्या हम इस सत्र के लिए तैयार हैं? या हम अब भी वहीं हैं,जहां पिछले वर्ष थे? यह सवाल इसलिए क्योंकि कुछ दिनों पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा जारी की गई रपट डायस(शिक्षा हेतु जिला सूचना व्यवस्था) प्राथमिक शिक्षा की कलई खोलती है और उत्तर प्रदेश की सपा सरकार पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करती है कि आखिर उ.प्र. में प्राथमिक शिक्षा की ऐसी हालत क्यांे? यह रपट बताती है कि प्राथमिक शिक्षा के लिए चलाई जा रही अनेक महात्वाकांक्षी योजनाओं के बावजूद देश में पांचवीं तक के छात्रों की संख्या में पिछले एक साल में ही 23 लाख बच्चों की कमी आई है, जिसमें अकेले उत्तर प्रदेश की कक्षाओं से 7 लाख बच्चे घट गए हैं। रपट की मानें तो देशभर में पांचवीं और आठवीं में क्रमश:13.24 करोड़ और 6.64 करोड़ यानी कुल 19.88 करोड़ बच्चे प्रारम्भिक शिक्षा हासिल कर रहे हैं। लेकिन इतनी बड़ी तादाद में बच्चों का प्राथमिक स्कूल से कम होना सवाल खड़ा करता है कि आखिर इतनी सुविधाओं के बावजूद ऐसा क्यों? कमी कहां हैं? या फिर यह सभी सुविधाएं हवा-हवाई साबित हो रही हैं?

लड़कियों के लिए शौचालय तक नहीं ?
आंकड़े बताते हैं कि देश के 31 प्रतिशत प्राथमिक विद्यालयों में लड़कियों के लिए शौचालय की व्यवस्था नहीं है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय की बेबसाइट पर पड़े आकड़ों पर नजर डालंे तो अभी तक केवल 69 फीसदी विद्यालयों में ही शौचालय की व्यवस्था है। ग्रामीण वातावरण को देखते हुए इस समस्या के कारण अभिभावक लड़कियों को स्कूल जाने से रोक देते हैं, जिससे लड़कियों की पढ़ाई बीच में ही रुक जाती है और वे शिक्षा से वंचित हो जाती हैं। 2013 में यूनीसेफ की टीम ने उ.प्र. के सोनभद्र, चंदोली, भदोही, मिर्जापुर गाजीपुर, मऊ, बांदा सहित कई जिलों का सर्वे किया था। टीम ने इस दौरान पाया कि जहां स्कूल में कुछ स्थान पर शौचालय भी हैं तो वहां साफ-सफाई न के बराबर है,जिसके कारण बीमारी की आशंका से भी लड़कियां शौचालय प्रयोग करने से बचती हैं। ऐसी विषम परिस्थिति में लड़कियों के लिए सामंजस्य बनाना बेहद कठिन होता है।

शिक्षकों की भारी कमी
जब विद्यालयों में शिक्षक ही नहीं होंगे तो बच्चों को पढ़ायेगा कौन और कौन अभिभावक ऐसी स्थिति में अपने बच्चों का यहां दाखिला करवायेगा। गिरते शिक्षा स्तर का प्रमुख कारण शिक्षकों की कमी है। आंकडे़ चौंकाने वाले हैं,क्योंकि देश में कहीं-कहीं तो 200 बच्चों पर 1 शिक्षक ही तैनात है और कहीं-कहीं तो पूरा का पूरा विद्यालय शिक्षामित्र के सहारे ही चलता है। ज्ञात हो कि इस समय देश में 13.62 लाख प्राथमिक विद्यालय हैं। परन्तु इनमें कुल 41 लाख शिक्षक ही तैनात हैं,जबकि देश में अनुमानित 19.88 करोड़ बच्चे प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ रहे हैं । साथ ही पूरे देश में करीब 1.5 लाख विद्याालयों में 12 लाख से भी ज्यादा पद खाली पड़े हैं। इस कारण करीब 1 करोड़ से ज्यादा बच्चे विद्याालयों से बाहर हैं। प्रतिभाशाली शिक्षकों के अभाव का ही परिणाम है कि उत्तर प्रदेश सहित कई प्रदेशांे के बच्चों के सीखने,पढ़ने व समझने के स्तर में बराबर गिरावट हो रही है। इन विद्यालयों के कक्षा छ: तक के बच्चे ठीक से जोड़-घटाना और गुणा-भाग तक नहीं कर पाते हैं। इन परिस्थितियों में समझा जा सकता है कि प्राथमिक शिक्षा की ढांचागत गुणवत्ता,शिक्षण-प्रशिक्षण तथा शिक्षा की गारन्टी जैसे लक्ष्यांे की वास्तविक दशा का हश्र क्या हो सकता है।
संचार प्रौद्योगिकी की हालत
मानव संसाधन विकास मंत्रालय की बेबसाइट पर इसे लेकर आंकड़े तो ढेर सारे पड़े हैं पर वे हकीकत से कोसों दूर हैं। प्राथमिक विद्यालयों के बच्चे इस क्रान्ति से कितने परिचित हैं इसे लेकर मन डगमगाने लगता है। केन्द्र सरकार द्वारा कुछ शहरी क्षेत्रों के विद्यालयों के लिए कम्प्यूटर आए भी हैं तो वे स्कूल में न होकर ग्राम प्रधान या फिर हेडमास्टर साहब के घर की शोभा बढ़ाते हैं और धोखे से स्कूल में पहुंच भी गए तो भाषा शिक्षक की अनुपलब्धता एवं विजली न आने के कारण धूल ही फांकते रहते हैं ।
मध्याह्न भोजन से चौपट होती पढ़ाई !
सरकार ने यह योजना इसलिए चलाई थी कि गरीब बच्चों को पोषकतत्व युक्त भोजन मिलेगा, जिससे उनके शारीरिक एवं मानसिक विकास में वृद्धि होगी। पर हकीकत में इस योजना से नुकसान ज्यादा हो रहा है। असल में सरकार बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए प्राथमिक व उच्च प्राथमिक बच्चे के लिए 100 से 150 ग्राम प्रतिदिन मीनू के अनुसार भोजन की व्यवस्था करती है, लेकिन जब पाञ्चजन्य ने इस बारे अध्यापकों से इस योजना पर राय जानी तो उन सभी का मानना है कि यह योजना पूरी तरह से दलाली और भ्रष्टाचारियों के चुंगुल में फंसी है और इससे बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह बर्बाद हो रही है। बच्चे पढ़ने के लिए कम सिर्फ भोजन के समय खाने में ज्यादा रुचि दिखाते हैं। ज्यादातर विद्यालयों में तैनात एक दो अध्यापक पल्स पोलियो, जनगणना, चुनाव जैसे तमाम गैर शैक्षिक कार्यों में लगे रहते हैं और बाकी समय बच्चों के मध्याह्न भोजन में। खाना बनाने के लिए सरकार द्वारा बच्चों के हिसाब से कार्य करने वालों की व्यवस्था की गई है पर हकीकत में इतना सारा काम किसी एक के वश की बात नहीं। लिहाजा बच्चे भी इसमें हाथ बंटाते रहते हैं। असल में यह योजना विद्यालयों में भ्रष्टाचार का एक जरिया है। स्कूलों को मिलने वाला राशन खाद्य निगम या कोटेदार उपलब्ध कराता है। कोटेदार और प्रधानाध्यापक की इसमें सांठगांठ रहती है और पहले तो राशन में ही घोटालेबाजी होती है तथा दूसरी ओर भोजन में अन्य सामान बनाने से लेकर अन्य चीजों का पैसा ग्राम प्रधान के ‘कनवर्जन कास्ट’ के तहत भुगतान होता है,जो स्कूल का प्रधानाध्यापक चेक बनाकर देता है। अब यहां भी ग्राम प्रधान और प्रधानाध्यापक के बीच जमकर बंदरबांट होती है। ऐसे हालात में पढ़ाई कहीं गुम सी होती जा रही है।
पेयजल व बैठने की व्यवस्था तक नहीं
यूनीसेफ की रपट बताती है कि देश के 30 फीसदी से अधिक विद्यालयों में पेयजल की व्यवस्था ही नहीं है। साथ ही 40 से 60 फीसदी विद्यालयों में खेल के मैदान तक नहीं हैं। पिछले दिनों देश की शीर्ष अदालत के सामने केन्द्र में रही कांग्रेस सरकार खुद बता चुकी है कि देश में अब भी लगभग 1800 से अधिक स्कूल टेंट और पेड़ों के नीचे चल रहे हैं। 24 हजार विद्यालयों में पक्के भवन नहीं हैं, जो बच्चे पढ़ने के लिए आते भी हैं वे घर से ‘बोरी या टाट पट्टी’ लेकर आते हैं। ऐसे में समझा जा सकता है कि हमारे देश के प्राथमिक विद्यालयों का स्तर क्या है और ऐसे में किन परिस्थितियों में पढ़ाई होती होगी दिन में तारे देखने जैसा है।
निजी विद्यालयों की ओर बढ़ता मध्यवर्ग
प्राथमिक शिक्षा की गिरती साख का ही परिणाम है कि शिक्षा का निजीकरण हो रहा है। इसका परिणाम है कि ग्रामीण क्षेत्रों में जो असहाय एवं वंचित-गरीब वर्ग है वह इससे बेदखल होने को मजबूर है। जिनके पास पैसा और सभी प्रकार से समृद्ध हैं वे अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम और मिशनरी स्कूलों में पढ़ा रहे हैं पर जिनके पास पैसा नहीं है उनके नौनिहाल पढ़ाई छोड़कर खेत-खलिहान में धान लगाने और पिपरमिंट लगाने में अपने पढ़ाई-लिखाई के दिनों को जाया कर रहे हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि गरीब-अमीर के शैक्षणिक स्तर में गहरी विषमता उत्पन्न हो रही है। यूनेस्को की जिस रपट में कहा गया है कि दुनिया में सबसे ज्यादा वयस्क निरक्षर भारत में हैं, वह उस सच की ओर ध्यान दिलाती है, जिस पर राज्य सरकारें परदा डाले रहती हैं। इनकी शिक्षा की उदासीनता और ठोस नीति न होने से यह खाई दिनो-दिन चौड़ी होती जा रही है।
अपने समाज की सच्चाई
प्राथमिक विद्यालयों की शिक्षा की बद से बदतर हालत के लिए कुछ हदतक हमारा समाज भी जिम्मेदार है। इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि देश के अधिकतर अभिभावक मौजूदा दौर को देखते हुए अपने बच्चों को तो अंग्रेजी माध्यम या फिर मिशनरी स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं,लेकिन ठीक इसके विपरीत अभिभावक स्वयं प्राथमिक स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं। इसके पीछे कारण है, क्योंकि प्राथमिक स्कूल में पढ़ाई के अलावा और सभी कार्य होते हैं और आप दबाव वाले हैं तो घर बैठ कर सरकारी पैसों पर मौज कर सकते हैं। बच्चों को वे यहां इसलिए नहीं पढ़ाते क्योंकि यहां पढ़ाई न के बराबर होती है। ऐसे में वे अपने बच्चों को जो बनाना चाहते हैं वह इन परिस्थितियों में रहकर बना नहीं सकते। क्योंकि अंगे्रजी एवं मिशनरी स्कल में शिक्षा का जो अत्याधुनिक रूप है उसके सामने गावों की प्राथमिक शिक्षा कहीं भी नहीं टिकती।
गांव-गाव तेजी से फैलती अंग्रेजी व मिशनरी शिक्षा के सामने सरकारी प्राथमिक शिक्षा की हालत देखते ही बनती है। शिक्षा का अधिकार व मध्याह्न भोजन की योजना के बाद भी हम सही ढंग से खड़े नहीं हो पा रहे हैं। यदि हमारी विद्यालयी शिक्षा की यह दशा है तो शिक्षा के समग्र स्तर पर उत्कृष्टता की उम्मीद कैसे की जा सकती है? सरकारी विद्यालयों से मिशनरी व अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में बच्चों का लगातार पलायन देश में बुनियादी सरकारी शिक्षा की दरकती दीवारों का साफ संकेत दे रही है। इस सच से इंकार नहीं किया जा सकता कि मध्याह़्न भोजन, वेशभूषा, साइकिल, पुस्तकों के लालच में कुछ प्रवेश तो बढ़ सकते हैं लेकिन हकीकत में प्राथमिक शिक्षा की दशा कुछ और ही है।

जनसरोकार से जुड़े प्राथमिक शिक्षा

प्राथमिक शिक्षा के गिरते स्तर पर राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद(एनसीईआरटी) के पूर्व निदेशक जे.एस.राजपूत ने पाञ्चजन्य से बात करते हुए कहा कि अनेक योजनाओं के बावजूद प्राथमिक स्कूल के बच्चों का स्तर लगातार घट रहा है। सरकारी आंकड़े यह जरूर बताते हैं कि समय-समय पर इन विद्यालयों में बच्चों की संख्या में बढ़ोतरी तो होती है, लेकिन गुणवत्ता क्या है,उसपर चुप्पी साध लेते हैं। शिक्षा का अधिकार कानून को चार साल गुजर जाने के बाद भी वह पूरी तरह से असफल रहा है। शिक्षा में फैलते भ्रष्टाचार की हालत यह है कि हरियाणा और म. प्र. के भूतपूर्व मंत्री जेल में हैं। यह हालत किसी एक प्रदेश की नहीं है,अपितु अधिकतर प्रदेशों में ऐसे लोगों का बोलबाला है। ऐसे में जब बड़े-बड़े लोग भ्रष्टाचार में संलिप्त होंगे तो छोटे अधिकारियों से क्या उम्मीद रखी जाए। मेरा मानना है कि अगर उच्च पद पर आसीन राजनेता एवं शिक्षा विभाग के अधिकारी ईमानदार हैं तो निश्चित रूप से शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा और भ्रष्टाचार पर लगाम कसेगी। साथ ही अगर सरकार को प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति सुधारनी है तो वह स्थानीय स्तर पर जनता का सहयोग ले और उन्हें बताए कि स्कूल उनका है और उन्हें ही संभालना है। सरकार द्वारा इन विद्यालयों को पर्याप्त धन मुहैया कराया जाए। प्रतिदिन निरीक्षण की व्यवस्था हो एवं शिक्षा के नाम पर लोकलुभावन योजनाओं के द्वारा छात्रों को बरगलाया न जाए।
पहले सीटैट, अब किनारा
केंद्रीय प्रशासनिक पंचाट (कैट) ने केन्द्र व दिल्ली सरकार से शिक्षक नियुक्ति में सीटैट की अनिवार्यता में छूट देने का निर्देश दिया है। इस आदेश का मतलब साफ है कि कि अब सीटैट के बगैर भी आप शिक्षक बन सकते हैं । लेकिन सवाल इस बात का है कि अभी कुछ वर्ष पूर्व सरकार ने शिक्षक बनने के लिए इस परीक्षा को आधार बनाया और इसी के चलते देश के राज्यों में अध्यापक पात्रता परीक्षा की शुरुआत हुई। राज्य सरकारें इसी परीक्षा को आधार बनाकर शिक्षकों की नियुक्त कर रहीं हैं। ऐसे में आगे चलकर राज्यों में भी टेट परीक्षा समाप्त करने की मांग उठेगी। ऐसे में इसको उत्तीर्ण करने वाले स्वयं को ठगा महसूस करेंगे और बाकी उम्मीद करेंगे।
(अतुल कुमार श्रीवास्तव)(पांचजन्य)

शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आर०टी०ई०)

1. निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम- 2009

http://www.upefa.com/upefa/rte/rte.pdf
2.सूचना का अधिकार अधिनियम के बारे में, 2005 में सूचना

http://www.upefa.com/upefaweb/SuchnaKaAdhikar.pdf

किसी भी प्रकार के विकास एवं उन्नति के लिए शिक्षा एक महत्वपूर्ण साधन है। शिक्षा के अभाव में कुछ भी अर्थपूर्ण हांसिल नहीं किया जा सकता। यह लोगों के जीवन स्तर में सुधार तथा उनके जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाने हेतु क्षमताओं का निर्माण कर तथा बेहतर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। साक्षरता के स्तर में वृद्धि से उच्च उत्पादकता बढ़ती है तथा अवसरों के सृजन से स्वास्थ्य में सुधार, सामाजिक विकास और उचित निष्पपक्षता को प्रोत्साहन मिलता है। यह लोगों को अपने बलबूते पर किसी भी निर्णय लेने तथा विचार करने हेतु सामर्थ्य‍ प्रदान करता है।

साक्षरता स्तर में वृद्धि तथा कुशल कार्यबल का विकास, मध्य प्रदेश को जीवन की गुणवत्ता में सुधार हेतु सहायता कर रहा है। आज के बदलते युग में उच्च शिक्षित एवं कुशल पेशेवरों की आवश्यकता निरंतर बढ़ रही है। राज्य के लिए यह अत्यावश्यक है कि वह सभी स्तर के लोगों के लिए शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराए। साथ ही यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि सभी अपनी बुनियादी शिक्षा गुणवत्ता के साथ पूर्ण करे और सभी के लिए उच्च शिक्षा एवं उन्नत कौशल प्राप्त करने के अवसर यहां उपलब्ध हो।

शिक्षा के क्षेत्र में मध्य्प्रदेश ने बहुत अधिक उन्नति की है। साक्षरता दर वर्ष 2001 में 64.11 प्रतिशत थी, (संपूर्ण भारत – 65 प्रतिशत) जो वर्ष 2011 में बढ़कर 70.63 प्रतिशत (संपूर्ण भारत में 74.04 प्रतिशत) हुई।

6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों के दाखिलों का लक्ष्य लगभग पूरा कर लिया गया है। वर्ष 2011 में, प्राथमिक स्तर (कक्षा 1 से 5) के लिए सकल दाखिला अनुपात 98.88 प्रतिशत तथा उच्च प्राथमिक सस्तर (कक्षा 6 से 8) के लिए सकल दाखिला अनुपात 99.27 प्रतिशत रहा है। ड्रॉपआउट रेट में भी कमी आयी है और अब यह प्राथमिक स्तर पर 8.2 प्रतिशत तथा उच्च प्राथमिक स्तर पर 7.4 प्रतिशत हो गई है। मध्य प्रदेश में महिला साक्षरता में सुधार लाने हेतु अधिक जोर दिया जा रहा है। राज्य का लक्ष्य न केवल साक्षर राज्य के रूप में बल्कि स्कू्ली समाज से परे शिक्षा के प्रति जागरूक समाज के रूप में शिक्षित राज्य होना है। इसलिए मध्यप्रदेश शासन सभी को उचित गुणवत्ता तथा प्रासंगिक शिक्षा के अवसर प्रदान करने और साथ ही रोजगारोन्मुखी तथा कौशल विकास के पाठ्यक्रम (कोर्स) पर अधिकतम बल दे रही है। इस क्षेत्र में, शासन भी निजी उद्यमियों को राज्य में रखने हेतु उत्सुक है, जो कि इन उद्देश्यों को वास्तविकता में लाने हेतु सहयोग प्रदान कर सकते हैं।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम 6 से 14 वर्ष के बीच के सभी बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार को प्रमाणित करने हेतु 1 अप्रैल, 2010 को प्रभाव में लाया गया। इस अधिनियम के द्वारा शासन तथा स्थानीय अधिकारियों पर निर्धारित मापदण्ड और नियम के अनुसार विद्यालय, शिक्षक तथा अन्य सुविधायें उपलब्ध कराने हेतु दायित्व सौंपा गया।

समाज या राज्य अपना अधिकतम विकास करने में तभी सक्षम होगा, जब समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता में वृद्धि कर पाएगा। अपनी इस क्षमता को हांसिल करने के लिए व्यक्ति को शिक्षित होना होगा। ‘’बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम, 2009” के द्वारा राज्य शासन और स्थानीय निकायों को यह सुनिश्चित करने हेतु आदेश दिया गया है कि 6-14 वर्ष के आयु का प्रत्येक बच्चा कम से कम प्राथमिक शिक्षा पूरी करे।

साक्षरता स्थिति

मध्यप्रदेश राज्य की साक्षरता की रूपरेखा का सारांश निम्नलिखित तालिका में दिया गया है

साक्षरता दर (2001) साक्षरता दर (2011)
पुरूष    76.8   80.5
महिला    50.2   60

स्कूल शिक्षा

Schools in Madhya Pradesh
Government Primary Schools    83412
Aided Primary Schools (Private)    852
Unaided Primary Schools (Private)    12533
Government Upper Primary Schools    28479
Aided Upper Primary Schools (Private)    410
Unaided Upper Primary Schools (Private)    14773
Total High Schools (Including Private)    6636
Total Higher Secondary Schools (Including Private)    5211
Govt. Primary School Govt. Upper Primary School
Teacher in Position    191368    74552
Enrolment    6804712    3315843
Pupil-teacher Ratio (Private)    35.6    44.5

राज्य में प्राथमिक शिक्षा के सर्वव्यापीकरण हेतु शासन प्रतिबद्ध है। बेहतर बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने, शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार, शिक्षा तक पहुंच में सुधार और समुदाय की भागीदारी को प्रोत्साहित करने पर ध्यान केंद्रित है।

  • शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के प्रावधानों के अनुसार, राज्य ने प्राथमिक तथा उच्च प्राथमिक स्कूलों तक पहुंच के सर्वव्यापीकरण का लक्ष्य लगभग हांसिल कर लिया है।
  • आगामी वर्षों में 5 कि.मी. की दूरी के अंदर उच्च विद्यालय स्थाथपित करने का निर्णय लिया गया है।
  • बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के प्रावधानों के अनुसार, तीन वर्ष के भीतर सभी उच्च विद्यालयों में आवश्यक सुविधाओं की उपलब्धता को सुनिश्चित करने के प्रयास किये जा रहे हैं।
  • सर्व शिक्षा अभियान अब आरटीई अधिनियम को कार्यान्वित करने का एक जरिया है।
बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की प्रमुख विशेषताएं है |
  • 6 से 14 वर्ष के वर्ग के सभी बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा ।
  • प्राथमिक शिक्षा पूर्ण होने तक किसी भी बच्चे को रोका नही जायेगा, न ही निष्काषित किया जायेगा और न ही बोर्ड परीक्षा हेतु अग्रेषित किया जायेगा।
  • यदि 6 वर्ष से अधिक उम्र का बच्चा किसी भी स्कूल में भर्ती नहीं हुआ है या जो भर्ती हैं, उसने अपनी प्राथमिक शिक्षा पूर्ण नहीं की है, तो वे अपनी उम्र के अनुसार उचित कक्षा में भर्ती किये जायेंगे और यदि कोई बच्चाम अपनी उम्र के अनुसार उचित कक्षा में प्रवेश लेता है, तो वह संबंधित शिक्षा पाने का हकदार होगा।
  • प्राथमिक शिक्षा हेतु प्रवेश लेने के लिए बच्चे की उम्र का निर्धारण जन्म प्रमाण पत्र के आधार पर, जो कि जन्म, मृत्यु और विवाह पंजीकरण अधिनियम, 1856 के प्रावधानों के अनुसार हो या संबंधित अन्य दस्तावेज, जो प्रमाणित कर सकते हों, उनके आधार पर किया जायेगा। उम्र प्रमाण पत्र न होने की स्थिति में बच्चे को प्रवेश से वंचित नहीं किया जायेगा।
  • प्राथमिक शिक्षा पूर्ण करने वाले बच्चे को एक प्रमाण पत्र आबंटित किया जायेगा।
  • शिक्षक की स्थिति का आंकलन शिक्षक-छात्र अनुपात के आधार पर किया जायेगा।
  • न्यूनतम 25 प्रतिशत सुविधाहीन तथा कमजोर वर्ग के बच्चों के प्रवेश, सहायता रहित निजी स्कूलों में कक्षा 1 में किये जायें।
  • अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान की जाये।
  • स्कूल शिक्षक को पांच साल के भीतर पेशेवर डिग्री प्राप्त करना बंधनकारक होगा अन्यथा वे नौकरी खो देंगे।
  • स्कूल का बुनियादी ढांचा तीन वर्ष में उन्नत किया जायेगा ।
  • वित्तीय भार राज्य और केन्द्र शासन के बीच बांटा जायेगा।

मध्ये प्रदेश, देश के कुछ ऐसे राज्यों में से एक था, जिन्होने आरटीई अधिनियम प्रारंभ होने के एक वर्ष में ही शिक्षा का अधिकार अधिनियम अधिसूचित किया। अधिनियम के प्रावधानों के कार्यान्वयन की निगरानी हेतु राज्य स्तर पर आरटीई सेल का गठन किया गया है। इस प्रणाली में पारदर्शिता लाने एवं निगरानी हेतु सूचना प्रौद्योगिकी टूल्स का इस्तेमाल किया जा रहा है।

पहलें

“बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009” यह प्रमाणित करता है कि बच्चों के अनुकूल दृष्टिकोण से, निष्पक्षता और समानता के साथ शिक्षा की गुणवत्ता बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए सुगम हो। अधिनियम के अन्य संबंधित वर्ग (24, 29 एवं इत्यादि) यह स्पष्ट करते हैं कि अधिनियम की पूर्णरूपेण सुचारूता सुनिश्चित करने हेतु, शिक्षा के क्षेत्र में बच्चों में शिक्षा संबंधी दृष्टिकोण पुनर्निर्मित करना आवश्यक है। अधिनियम विस्तृत रूप से आवश्यक जरूरतें प्रदान करता है, जो कि स्कूल प्रणाली को सर्व शिक्षा अभियान कार्यक्रम के तहत आवश्यक है। इसके अतिरिक्त यह एक राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा (नेशनल करिक्युलम फ्रेमवर्क) 2005, या आरटीई अधिनियम, या नेशनल करिक्युलम फ्रेमवर्क फॉर टीचर्स ट्रेनिंग 2010 है, और निष्पक्षता एवं समानता के साथ शिक्षा को सुनिश्चित करना इसका मुख्य उद्देश्य है। मध्यरप्रदेश में बच्चों के अध्ययन स्तर को बढ़ावा देने के लिए निम्नलिखित गतिविधियां की जा रही है;

प्रतिभा विकास कार्यक्रम

राज्य में अभ्यास वृद्धि कार्यक्रम के तहत् दक्षता संवर्धन कार्यक्रम लिया गया था। यह कार्यक्रम आरटीई एवं सतत् एवं अवधारणा मूल्यांकन मापदण्डों के आधार पर उन्न्त एवं विकसित किये गये हैं, जिसे प्रतिभा विकास कार्यक्रम का नाम दिया गया है। यह अब दार्शनिक तथा सह दार्शनिक क्षेत्रों को भी शामिल करता है। प्रतिभा विकास कार्यक्रम यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक बच्चा उसकी क्षमता के अनुसार निर्धारित समय सीमा के भीतर सामर्थ्यता के स्तर को प्राप्त करे। कार्यक्रम के उद्देश्य निम्नलिखित है ;

  • शैक्षणिक वर्ष के अंत तक सभी बच्चे पढ़ने, लिखने तथा उनके विषय का ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम हो।
  • सभी बच्चे बुनियादी शिक्षा और गणना कुशलता/सामर्थ्यता तथा विषयवस्तु का ज्ञान हासिल करें|
  • पढ़ने की आदत को विकसित करना तथा बच्चे को एक स्वतंत्र पाठक बनाना।
  • निरंतर कक्षा की आवाजाही तथा विद्यार्थी उपलब्धि पर ध्यान केंद्रित करने हेतु प्रभावी निगरानी प्रणाली की स्थापना करना।
प्रतिभा विकास कार्यक्रम की प्रमुख विशेषताएं

इस कार्यक्रम में शामिल उन्नत क्षेत्रों के कुछ मुख्य अंश निम्नलिखित है;

  • हिन्दी और अंग्रेजी भाषाओं में आधारभूत सामर्थ्यता।
  • गणित से संबंधित सामर्थ्यता जैसे : अंकों की पहचान, प्लस वेल्यूस, ऐक्सपेन्डेड नोटेशन, जोड़ना, घटाना, गुणा करना, भाग देना, यूनिटरी विधि तथा फ्रेक्शन।
  • कक्षा 4 में, सामर्थ्यता के आधार पर 75 प्रतिशत तथा पाठ्यपुस्तक अभ्यास के आधार पर 25 प्रतिशत मूल्यांकन किया जायेगा। कक्षा 5 के लिए यह प्रतिशत 50-50 होगा ।
  • कक्षा 4 एवं 5 में, सामाजिक विज्ञान का निर्धारण महीने वार और स्कूल स्तर पर किया जायेगा ।
  • कक्षा 6 और 8 के सभी विषयों का मूल्यांकन पाठ्यपुस्तक में दिये गये विषयवस्तु के आधार पर किया जायेगा ।
  • शिक्षक को किसी संबंधित प्रश्न को समझने एवं उसे तैयार करने हेतु एक प्रश्न बैंक का विकास किया जा रहा है।
  • प्राथमिक कक्षा के बच्चों के उपयोग हेतु वर्कशीट तैयार की गयी है, ताकि विकास के तहत वे उच्च प्राथमिक कक्षा में पहुंचे ।
प्राथमिक स्कूलों में गतिविधि आधारित शिक्षण

गतिविधि आधारित शिक्षण (एबीएल) दृष्टिकोण से आशा है कि यह न केवल कक्षा के वातावरण की गुणवत्ता में सुधार करें बल्कि बहस्तरीय कक्षाओं के मुद्दों को भी सम्बोधित करे। गतिविधि आधारित शिक्षण (एबीएल) दृष्टिकोण के तहत् आने वाले मील के पत्थरों का सामना करने हेतु दक्षताओं/सामर्थ्यताओं को छोटी इकाईयों में बांटा गया है। इन मील के पत्थरों को अभ्यास सीढि़यों के रूप में रखा गया है और यह अभ्यास सीढि़यां कक्षा 1, 2, 3 और 4 के लिए प्रत्येक विषय हेतु विकसित की गयी हैं। गतिविधि आधारित शिक्षण को राज्य के 50 जिलों के 4000 प्राथमिक स्कूलों में प्रारंभिक रूप से क्रियान्वित किया गया है। अब प्रत्येक जिले में एक विकासखण्ड को कार्यक्रम के तहत कवर किया गया है। प्रारंभ में कक्षा 1 और 2 के सभी विषय जैसे : हिन्दी, अंग्रेजी और गणित के लिए गतिविधि आधारित शिक्षण दृष्टिकोण लिया गया और अब इसे कक्षा 4 तक के लिए बढ़ा दिया गया है। एक परिणाम के रूप में निम्न परिवर्तन सफलतापूर्वक कक्षा संबंधी प्रक्रियाओं में शुरू किए गए थे|

  • बच्चों को उनकी अभ्यास क्षमता के अनुसार सीखने की स्वतंत्रता है।
  • बच्चे विभिन्न गतिविधियों द्वारा सीखे।
  • बच्चें अपने स्तर पर सीखने का प्रयास करें।
  • मल्टीं ग्रेड और बहुस्तारीय शिक्षण व्यपवस्था संभव की गयी है।
  • विभिन्न तरह की गतिविधियों और खेल के माध्यम से अभ्यास कराते हुए आनंददायक शिक्षण देना संभव किया गया है।
  • परीक्षा के डर को दूर करने हेतु मूल्यांकन की एक प्रणाली को अपनाया गया है।
  • बच्चों पर आवश्यकतानुसार ध्यान देने के लिए शिक्षक के पास अवसर है।
  • बच्चों से स्कूल बैग का बोझ बहुत दूर किया गया है।
  • बच्चों के लिए अभ्यास करने हेतु बहुत अवसर है।
  • अभ्यास हेतु साथी वर्ग बढ़ाया गया है।
  • अभ्यास हेतु प्रचुर मात्रा में सामग्री तथा उनका उपयोग करना सुनिश्चित किया गया है।
  • बच्चों के लिए अनुकूल कक्षाएं गतिविधि और वातावरण।
  • शिक्षक पूर्ण रूप से बच्चों के सामने आने वाली कठिनाईयों का सामना करने हेतु जागृत हैं।
उच्च प्राथमिक स्कूलों में सक्रिय अभ्यास क्रियाविधि (एएलएम)

विज्ञान और सामाजिक विज्ञान पर एएलएम को एक विस्तृत टक्कर के रूप में माना जाता है। एएलएम को राज्य संदर्भ के आधार पर विकसित किया गया है।

कक्षा 6 से 8 तक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करने हेतु एएलएम का लक्ष्य रखा गया है। यह दृष्टिकोण बच्चों को विचार/विषय और किसी अवधारणा संबंधी इच्छाशक्ति को बढ़ाने के योग्य बनाता है। सामान्यत: राज्यो और अन्य स्थानों के एएलएम में बस इतना अन्तर है कि शिक्षक के लिए कोई भी विचार/विषय नक्शे, किसी पाठ की योजना बनाने के काम आता है और साथ ही यह बच्चों की अवधारणा शक्ति को बढ़ाने हेतु एक अग्रिम आयोजक का भी काम करता है। प्रथम चरण में एएलएम को पूरे राज्य भर में प्रारंभ किया गया था और अब यह हर जिले के तीन विकासखण्ड तक बढ़ा दिया गया है।

कुछ प्रमुख कार्यक्रम

सर्व शिक्षा अभियान

सर्व शिक्षा अभियान के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित है;

  • सभी बच्चों का स्कूल के लिए नामांकन।
  • उच्च प्रा‍थमिक स्तर तक के सभी बच्चों का रिटेंशन।
  • प्राथमिक तथा उच्च प्राथमिक स्तर के बच्चों में अभ्यास उपलब्धि संबंधी महत्वपूर्ण बढ़ोत्तरी सुनिश्चित करना।
सर्वव्यापीकरण पहुंच
  • प्रत्येक निवासस्थान के 1 किलोमीटर के भीतर 6 से 11 वर्ष तक के वर्ग के 40 बच्चों की उपस्थिति के साथ प्राथमिक शिक्षा सुविधा उपलब्ध कराने के लिए राज्य शासन नीति।
  • इसी प्रकार उच्च प्राथमिक शिक्षा सुविधा, निवास स्थान के 3 कि.मी. के भीतर, जिसमें कि 12 बच्चे जो 5 वी कक्षा उत्तीर्ण कर चुके हों।
स्कूल से बाहर के माहौल के लिए रणनीति
  • जागृति अभियान इत्यादि के फलस्वरूप हमें लाभ में महत्वपूर्ण वृद्धि और एकल दाखिला अनुपात प्राप्त हुआ।
  • कभी भी दाखिला न किये गये बच्चे तथा स्कूल छोड़ने वाले उन बच्चों को उचित उम्र के अनुसार कक्षा में भर्ती किया गया तथा उनको अन्य बच्चों के समतुल्य लाने हेतु खास प्रशिक्षण उपलब्ध कराये गये।
  • वर्ष 2011-12 में लगभग 1.26 लाख बच्चे स्कूल से दूर पाये गये थे। उनकी उम्र के अनुसार उन्हें सक्षम बनाने के लिए खास प्रशिक्षण आयोजित किये गये थे।
  • आवासीय मुख्य प्रशिक्षण केन्द्र :- यह केन्द्र प्राय: उप विकासखण्ड स्तर पर शुरू किये गये थे, खास तौर से वहां, जहां बड़ी संख्या में बच्चे स्कूल से अनभिज्ञ थे और साथ ही उन बच्चों के लिए जो कि अपनी खास परेशानियों की वजह से शिक्षा पूरी नहीं कर सकते थे।
  • गैर आवासीय मुख्य प्रशिक्षण केन्द्र :- जहां बच्चे स्थानीय स्तर पर शिक्षा पूरी कर सकते है, वहां पर ये केन्द्र शुरू किये गये थे।
विश्वव्यापी रिटेंशन रणनीति
  • बच्चों को आकर्षित करने हेतु प्रलोभन :- सभी बच्चों को मुफ्त पाठ्यपुस्तकें, 2 जोड़ी यूनिफॉर्म, कक्षा 6 के उन बच्चों को साईकिल भेंट जो अपने आवास से दूर थे, सामाजिक तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए छात्रवृत्ति योजना, मध्यान्ह भोजन सुविधा ।
  • एसएमसी के लिए प्रेरणा :- संपूर्ण शिक्षित ग्राम योजना।
  • बच्चों का उच्च स्तर सुधारने के लिए :- 100 प्रतिशत दाखिला तथा प्रतिदिन उपस्थिति।
  • ‘’ए” केटेगरी प्राप्त करने के लिए :- (‍न्यूनतम शिक्षण स्तर परिभाषित करने के लिए 90 प्रतिशत विद्यार्थी) – रू. 5000/- प्रति कक्षा।
  • ‘’बी” केटेगरी प्राप्त् करने के लिए :- (‍न्यूनतम शिक्षण स्तर परिभाषित करने के लिए 80 प्रतिशत विद्यार्थी) – रू. 2500/- प्रति कक्षा।
स्कूल चलें हम अभियान

मध्यिप्रदेश शासन ने ‘’स्कू‍ल चलें हम अभियान” यह सुनिश्चित करने हेतु चलाया कि शिक्षा के महत्व का संदेश प्रत्येक परिवार और व्यक्तियों तक पहुंचे, ताकि सभी माता-पिता उनके बच्चों को स्कूल भेजें। एक जन आंदोलन ‘स्कू‍ल चलें हम’ के रूप में शुरू किया गया, जिसमें समाज के सभी वर्गों ने यह सुनिश्चित करने हेतु भाग लिया कि सभी बच्चों को नियमित रूप से स्कूलों में भर्ती किया जा रहा है। स्कूल चलें हम अभियान की प्रमुख गतिविधियां इस प्रकार है :-

  • डोर टू डोर संपर्क अभियान। यह सर्वेक्षण 0 से 14 वर्ष तक के वर्ग के बच्चों को शामिल करता है।
  • नारा लिखना।
  • डाटा संग्रहण और स्कू‍ल जाने/या न जाने वालों की जानकारी रखने हेतु ग्रामीण शिक्षा रजिस्टर / शहरी वार्ड शिक्षा रजिस्टर।
  • स्कूल से अलग बच्चों का स्कूल लौटने जैसी रणनीति पर ध्यान रखते हुए सभी पात्र बच्चों को दाखिला ड्राइव की सुविधा।
  • शिक्षा चौपाल का आयोजन।
  • कभी भी नामांकित न किये गये तथा शिक्षा छोड़ने वाले बच्चों की पहचान।
  • आकर्षित करने के लिए स्कूल की स्वूच्छता – हमारी शाला सुन्दर शाला।
  • मीडिया अभियान।
  • प्रवेशोत्सव ।
  • पाठ्य पुस्तकों को वितरण।
  • यूनिफॉर्म और साईकिल के लिए चेक का वितरण।
मध्यान्ह भोजन योजना
  • नामांकन मे वृद्धि कर, रिटेंशन और उपस्थिति के माध्यम से और साथ ही स्कूल में बच्चों के लिए पोषण को ध्यान में रखते हुए शिक्षा के विश्वव्यापिता को बढ़ावा देने हेतु इस योजना का उद्देश्य रखा गया।
लिंग निष्पक्षता पर प्रमुखता से फोकस

मौलिक स्तर पर लड़कियों की शिक्षा के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम (एनपीईजीईएल) ।

उद्देश्य
  • लड़कियों के लिए मौलिक शिक्षा पहुंच उपलब्ध कराने हेतु सुविधाओं को विकसित करना और बढ़ावा देना।
  • स्कूली शिक्षा प्रणाली में लड़कियों को रिटेंशन (रखवाली) की सुविधा प्रदान करना।
  • शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं और लड़कियों की अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित करना।
  • शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना।
  • लड़कियों के सशक्तिकरण हेतु उनकी शिक्षा की गुणवत्ता और संबंधित प्रासंगिकता पर जोर देना।

एनपीईजीईएल शैक्षणिक रूप से 280 पिछड़े विकासखण्डों में लागू किया गया ।

एनपीईजीईएल के अंतर्गत निम्नलिखित मुद्दों को संबोधित किया गया :

  • लैंगिक अंतर में कमी लाना।
  • हॉस्टल के माध्यम से लड़कियों की पहुंच बढ़ाना।
  • जीवन कौशल शिक्षा प्रदान करना।
  • स्कूल वर्दी के अतिरिक्त भी प्रोत्साहन देना।
  • स्कू‍लों को पुरूस्कार – एक स्कूल के प्रत्येुक समूह में पुरूस्का्र दिया गया, जो कि लड़कियों के शिक्षा रूचि के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। पुरूस्कार लड़कियों के उपलब्धि स्तर के आधार पर दिये गये।
  • मॉडल क्लस्टर स्कूल – उन समूहों में एक स्कूल लड़कियों के लिए मॉडल क्लस्टर स्कूल के रूप में विकसित करने हेतु चुना गया। यह वह स्कूल है, जहां सबसे अधिक संख्या में अनुसूचित जाति/जनजाति/ पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक वर्ग की लड़कियां दाखिल हैं। लड़कियों के लिए अनुकूल शिक्षण उपकरण, किताबें, खेल हैं। लड़कियों के लिए अनुकूल शिक्षण उपकरण, किताबें, गेम्स और खेल सामग्रियां इत्यादि इस स्कूल में लायी गयीं।
  • गर्ल्स होस्टल – उच्च प्राथमिक स्त़र पर एक खास रणनीति के रूप में लड़कियों के रिटेंशन (रखवाली) सुनिश्चित करने हेतु गर्ल्स होस्टल खोले गये। परिवार में निहित कारकों या बालिकाओं के सामाजिक सांस्कृतिक परिवेश के अतिरिक्त‍ स्कूलों की दूरी तथा संबंधित सुरक्षा भी मौलिक स्तर पर लड़कियों की कम जीईआर का कारण था। हालांकि, इन मुद्दों को संबोधित करने हेतु गर्ल्स होस्टल खोले गये। आज की स्थिति में एनईपीजीईएल के अंतर्गत 239 होस्टल जिसमें 16415 लड़कियां और सर्वशिक्षा अभियान के अंतर्गत 81 होस्टल जिसमें 5635 लड़कियां है। इन सबमें कुल 320 होस्टल क्रियान्वित है और इस नीति से लगभग 22050 लड़कियां लाभान्वित है।
कस्तू़रबा गांधी बालिका विद्यालय

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग की लड़कियों पर विशेष ध्यान ।

कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय एक आवासीय विद्यालय हैं, जो कि शिक्षा से वंचित लड़कियां, विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग समुदाय और अल्पसंख्यक समूहों को कवर करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। लड़कियों के स्कूल से दूर, छोटे और बिखरे हुए निवास स्थान की समस्या का यह एक समाधान है। वर्तमान में, 207 कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय राज्य् में चल रहे है। लगभग 26898 लड़कियां इन कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में दाखिल की गयी है।

नवीन तकनीकि का प्रयोग

कम्प्यूटर एडेड लर्निंग कार्यक्रम(CAL)

कम्प्यूटर सक्षम शिक्षा राज्य सरकार की एक प्रमुख प्राथमिकता है। राज्य ने वर्ष 2000 में विद्यार्थियों के लिए एक कम्प्यूटर सक्षम शिक्षा कार्यक्रम प्रारंभ किया, जिसे ‘’हेडस्टार्ट” नाम दिया गया। इस कार्यक्रम ने प्रारंभिक स्तर पर कम्प्यूटर का उपयोग शिक्षण उपकरण के रूप में किया। हेडस्टार्ट पर आधारित प्रारंभिक शिक्षा विद्यार्थी उपलब्धि में सुधार का संकेत दर्शाती है और साथ ही प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने वाली संख्या में वृद्धि करती है। राज्य शिक्षा केंद्र द्वारा कक्षा में शिक्षण अभ्यास क्रियाविधि को सहायता देने हेतु विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए इंटरेक्टिव मल्टी‍ मीडिया रीच लेसन (आईएमएमआरएल) और वीडियो फिल्म विकसित की गयी है। राज्य शिक्षा केंद्र द्वारा विकसित इंटरेक्टिव मल्टी मीडिया रीच लेसन का उपयोग भारत के कुछ अन्य हिंदी-भाषी राज्यों और कुछ गैर सरकारी संगठनों द्वारा किया जा रहा है।

नयी आईसीटी लैब की स्थापना

कुछ चुने गये उच्च प्राथमिक स्कूलों में नये कम्प्यूटर टर लैब रखे जायेंगे। इन प्रयोगशालाओं को पूरी तरह से कम्प्यूटर सक्षम शिक्षा प्रदान करने और साथियों के समूहों में सीखने के लिए सुसज्जित किया जाएगा।

एजूसेट कक्षायें

500 स्कू‍लों में आरओटी उपलब्ध कराने की प्रक्रिया चल रही है। आरजीपीईईई के तहत मौजूदा संचरण का उपयोग कर, एमएचआरडी प्रस्ताव के साथ स्कूलों के लिए 24X7 चैनल प्रारंभ करने हेतु, उपग्रह प्राप्त स्टेशनों को स्थापित करने हेतु स्कूल ही एक विकल्प‍ होगा। सीआईईटी-एनसीईआरटी और आरजीपीईईई से प्रसारित कार्यक्रमों को स्कूलों के लिए उपलब्ध कराया जाएगा। स्कूलों का चयन बेहतर बुनियादी रूपरेखा, शिक्षकों की उपलब्धता और उपयुक्त सुरक्षा व्य्वस्था के आधार पर किया जायेगा । अर्थात हेडस्टार्ट और नॉन हेडस्टाष्ट दोनों तरह के स्कू्ल होंगे।

कम्प्यूटर एडेड लर्निंग कार्यक्रम में शिक्षकों का प्रशिक्षण

सेवाकालीन प्रशिक्षण घटक का ही एक हिस्सा है। हेडस्टार्ट केंद्र में कार्यरत सभी शिक्षकों के लिए यह प्रशिक्षण आयोजित किया गया है। यह प्रशिक्षण सीएएल क्षेत्र में, ऑपरेटिंग सॉफ्टवेयर, सीएएल के शिक्षण विज्ञान और कम्प्यूटर केंद्र प्रबंधन में आयोजित है। ये प्रशिक्षण कोर्स जिला तथा विकासखण्ड‍ स्तर पर आयोजित किये गये हैं। 6000 से अधिक शिक्षक प्रशिक्षित किये गये हैं।

इंटरनेट

वर्ष 2009-10 के दौरान, इंटरनेट सुविधा 800 स्कूलों में प्रदान की गयी थी, जहां यूएसओएफ के तहत सुविधा उपलब्ध थी । वर्ष 2012-13 के दौरान, उन हेडस्टार्ट स्कूलों में जहां बीएसएनएल (बायर और बायरलैस) ब्राडबैंड सुविधा उपलब्ध है को इंटरनेट सुविधा उपलब्धल कराने का प्रयास किया जायेगा।

यह प्रणाली विभिन्न योजनाओं के प्रभाव को सुधारने हेतु लागू की गयी है |

(www.educationportal.mp.gov.in) के साथ निगरानी तथा आईसीटी सक्रिय पहल।

  • जिला और राज्य स्तर पर नियत अवधि में डाटा संग्रहण, समीक्षा और प्रबंधन ।
  • मीटिंग और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से नियमित आवधिक समीक्षा।
  • समवर्ती और इंटरनल ऑडिट ।
  • उपलब्ध संसाधनों के इष्टतम उपयोग और सुव्यवस्थीकरण हेतु स्कूल शिक्षा की जिला जानकारी (DISE) की गुणवत्ता में सुधार।
  • टेली समाधान।
  • ऑनलाईन निगरानी व्यवस्था – सभी निरीक्षण अधिकारी उनके द्वारा किए गए निरीक्षण की जानकारी दर्ज कर सकते हैं। निरीक्षक द्वारा रिपोर्ट की गयी कोई परेशानी, जैसे शिक्षक की अनुपस्थिति, कम हाजिरी, पाठ्य पुस्तवक संबंधी कठिनाई पर संबंधित अधिकारी द्वारा तत्कााल कार्यवाही हेतु सुविधा उपलब्ध है।
  • संबंधित अधिकारी द्वारा राज्य स्तर/जिला स्तर/ब्लॉक स्तर और स्कूल स्तेर के किसी भी मामलों/कठिनाईयों का विश्लेषण तथा निगरानी और उस पर तत्काल कार्यवाही की जायेगी।
  • स्कूल से बाहर के बच्चों के लिए ऑनलाईन चाइल्डवाईज ट्रेकिंग प्रणाली।
  • स्कूल से बाहर के बच्चों की रूपरेखा अनुसार पंजीकरण व्यवस्था ।
  • संबंधित अधिकारियों द्वारा उनके दाखिलें और उन्हे मुख्य धारा में लाने के लिए किए गए प्रयासों की सतत ट्रैकिंग।
  • बच्चों को शिक्षा की मुख्य धारा में लाने हेतु सामान्य व्याक्ति भी किसी स्कू ल के बाहर के बच्चे की रिपोर्ट दे सकता है।
  • 1.5 लाख से अधिक बच्चे पहले ही रजिस्टर्ड किये जा चुके है और आगे भी सक्रियता के साथ किये जा रहे हैं।
  • ओओएस के लिए कारणों का विश्लेषण।

पुरूस्कार

विभिन्न स्तरों पर शिक्षा के क्षेत्र में आईसीटी सक्षम जांच उपकरण का उपयोग अधिक सराहनीय है। पोर्टल http://www.educationportal.mp.gov.in/ के लिए निम्नलिखित पुरूस्कार प्राप्त किये गये है|

  • भारत सरकार, डीओपीटी, डीआईटी के द्वारा गोल्ड आइकन नेशनल ई-शासन पुरूस्कार।
  • मध्य प्रदेश राज्य शासन द्वारा वर्ष 2008-09 में जनसाधारण वर्ग के अंतर्गत ई-शासन पहल में उत्कृ्ष्ट ता के लिए सर्वश्रेष्ठ सूचना प्रौद्योगिकी परियोजना।
  • विभागीय वर्ग के तहत भारत में ई-शासन पहल की पहचान हेतु सीएसआई निहिलेंट ई-शासन पुरूस्का-र 2008-09।
  • कक्षा 1, 6, और 9 के चाईल्डवाईज डाटा प्राप्त किया जा रहा है। आने वाले वर्ष में चाईल्डवाईज डाटा प्राप्त कर लिया जायेगा और चाईल्ड् वाईज प्रणाली लागू कर दी जावेगी।
  • नवीन आईटी उपयोगिता द्वारा प्रभावी जन सेवा वितरण के लिए मंथन साउथ एशिया ई-शासन पुरूस्कार 2009।
  • पीसी क्वेस्ट द्वारा सर्वश्रेष्ठ ई-शासन परियोजना पुरूस्कार।

(अतुल कुमार श्रीवास्तव)

संविधान के अनुच्छेद – 45 में राज्य नीति निर्देशक तत्वों के अन्तर्गत यह व्यवस्था बनाई गई थी कि संविधान को अंगीकृत करके 10 वर्षों के अन्दर 6-14 वय वर्ग के सभी बालक / बालकाओं के लिये नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था की जायेगी किन्तु 57 वर्ष बीत जाने के बाद भी इस लक्ष्‍य को प्राप्‍त नही किया जा सका । यह ठीक है ‍कि 1986 में जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनी थी तब से लेकर अब तक विशेष रूप से प्राथमिक शिक्षा के सत्र में काफी सुधार हुआ है। वैसे हर पंचवर्षीय योजना में शिक्षा को विशेष महात्व दिया गया है।  केन्द्र एवं राज्यों ने दसवी पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत प्रारम्भिक शिक्षा के सर्व-सुलभीकरण और सभी के लिये शिक्षा के लक्ष्य की पूर्ति के लिये सर्व शिक्षा अभियान अपनाया गया है । यह अभियान क्रान्तिकारी है। इस अभियान के अन्तर्गत सभी बच्चें स्कलों तथा वैकल्पिक शिक्षा केन्द्रों मे होगें लक्ष्य यह भी है कि 6 – 14 वय वर्ग के सभी बच्चें पांच वर्ष की प्रारम्भ्कि शिक्षा पूरी कर ले साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जा रहा है कि 2010 तक ऐसी स्थिति आ जाये कि जो बच्चें स्कूल जाने लगे वे स्कूल जाना बन्द न कर दें।

 सर्व शिक्षा अभियान को सफल बनाने के लिये संविधान मे संशोधन की आवश्यकता थी, जिसके लिये भारतीय संविधान का 93वाँ संशोधन विधेयक संसद मे पारित कर दिया है और इसके साथ ही एक ऐसी क्रान्तिकारी व्यवस्था का सूत्रपात हुआ जिसके तहत 6-14 वय वर्ग के बालक /बालिकाओं को नि:शुल्क और अनिवार्य रूप से शिक्षा दिये जाने की व्यवस्था करना राज्य सरकारों का कर्तव्य होगा।

राज्य सरकार द्वारा 6-14 वय वर्ग के सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराने में उच्च प्राथमिकता प्रदान करते हुए कार्यक्रमों का निर्धारण कर अपनी प्रतिबद्धता  को प्रर्दर्शित किया गया है । जहॉ वर्ष 1950 -51 में 34833 प्राथमिक /उच्च् प्राथमिक विद्यालयों में 2875260 बच्चें अध्ययन कर रहे थे वही उनकी संख्या 2006 – 07 से 181487  विद्यालयों मे अध्ययनरत बच्चों की संख्या 35890437 तक पहुंच जाने का लक्ष्य है। इसी प्रकार वर्ष 1950 – 51 में 84804 अध्यापक शिक्षण कार्य कर रहे थे वही उनकी संख्या 2006 – 07 में 415990 हैं।

शिक्षा के सार्वभौमिकरण के लक्ष्य को सामाने रखते हुए राज्य सरकार द्वारा वर्ष  1996 में प्रत्येक 300 आबादी और 1.5 कि०मी० की दूरी पर प्राथमिक विद्यालय की सुविधा न उपलब्ध होने पर एक प्राथमिक विद्यालय उपलब्ध कराने एवं 3 कि0मी० की दूरी तथा 800 आबादी पर एक उच्च प्राथमिक विद्यालय की स्थापना का मानक निर्धारित करते हुए एक त्वरित सर्वेक्षण कराया गया था। जनपदों मे सर्वेक्षण के आधार पर प्राथमिक विद्यालयों की स्वीकृतियां राज्य सरकार द्वारा प्रदान की गई है। वर्तमान शासनादेश संख्या 20/79-5-2006-198/2005 दिनांक 2-2-2006 द्वारा नवीन प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना में 1.5 कि०मी० की दूरी के स्थान पर 1किमी० तथा नवीन उच्च प्राथमिक विद्यालय की स्थापना हेतु 3 किमी० के स्थान पर 2 किमी० दूरी निर्धारित की गई है ।

प्रदेश में 6 से 14 तक के बच्चों के  अनिवार्य रूप से नि:शुल्क शिक्षा प्रदान करने हेतु प्रारम्भिक शिक्षा के सार्वजनीकरण के कार्यक्रम को सर्वाधिक वरीयता प्रदान की गई है। इस हेतु शिक्षा के वार्षिक बजट का अधिकांश भाग इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम पर व्यय करने का उददेश्य है।

शिक्षा कार्य में चिन्हित कारणों से उत्पन्न ह्रास एवं अवरोध को समाप्त करने के लिये वर्तमान में पूर्ववर्ती कार्यक्रमों को और अधिक प्रभावोत्पादक एवं उपयोगी बनाने हेतु विद्यालयों की धारण क्षमता से अभिवृद्धि की जानी है।

अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जन जातियों तथा पिछडे वर्गो के बालक / बालिकाओं को विद्यालयों मे प्रवेश दिलाने मे विशेष बल दिया जाता है।

कक्षा 1 से 5 तक के सभी वर्ग के शिक्षाथियों को नि:शुल्क पाठ्य पुस्तक एवं कक्षा 6 से 8 तक सभी शिक्षार्थियों को नि:शुल्क पाठ्य पुस्तक वितरण की व्यवस्था है। इसके साथ ही साथ मध्यान्ह पोषाहार तथा छात्रवृत्तियों की अधिकाधिक व्यव्स्था की जाती है।

शिक्षा के परिवेश मे सुधार हेतु नये भवनों के निर्माण के साथ-साथ पुराने भवनों मे सुधार तथा अन्य आवश्यक उपकरणों /शैक्षिक उपकरणों की व्यवस्था की जाती है।

गत सर्वेक्षण के आधार पर ही वरीयता क्रम मे नये विद्यालय खोले जाते है।

वित्तीय वर्ष 2006 -07 के लिये अशासकीय उच्च प्राथमिक विद्यालयों के अनुरक्षण अनुदान

माध्यमिक शिक्षा के क्षेत्र में निजी प्रबन्ध तन्त्र द्वारा संचालित अशासकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय का योगदान है। कतिपय कारणों से जनता में दान आदि देने की प्रवृत्ति में कमी के कारण इन विद्यालय को अनुदान सूची पर लेकर विद्यालयों के कर्मचारियों को वेतन वितरण कराने की योजना संचालित है।

शासन द्वारा प्रदेश के अशासकीय असहायिक स्थायी मान्यता प्राप्त पू०मा०वि० को अनुदान सूची मे सम्मिलित करने हेतु निर्णय लिया गया और शासनादेश संख्या 2813/79-6-2006-28(31) /03 दिनांक 2-12-2006 द्वारा 800 बालक विद्यालय एवं 200 बालिका विद्यालयों को अनुदानित किया गया है। उक्त अनुदानित विद्यालयों में कार्यरत शिक्षक / शिक्षणेत्त्तर  कर्मचारियों को वित्तीय वर्ष 2006-07 में दिनांक 1 दिसम्बर 2006 से वेतन भुगतान हेतु शासनादेश संख्या 2150/79-6-2006-7(2)/06 टी0सी0-1 दिनांक 10-01-2007 द्वारा रू0 1500.00 लाख की धनराशि स्वीकृत की गई, जिसे सम्बन्धित जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी एवं वित्त्त एवं लेखाधिकारी, बेसिक शिक्षा को पत्रांक अर्थ (4)/बेसिक/1391-1691/06-07 दिनांक 23-1-2007 द्वारा इस निर्दश के साथ निर्गत कर दी गई है कि शासन द्वारा निर्धारित प्रतिबन्धों एवं निर्देशों का अनुपालन करते हुए जाचोपरान्त भुगतान की कार्यवाही सुनिश्चित कराई जाय। जनपद एवं मण्डल स्तर पर उक्त कार्यवाही गतिमान है।

बेसिक शिक्षा परिषद उत्तर प्रदेश द्वारा संचालित बेसिक परिषदीय विद्यालयों के अध्यापक/ अध्यापिकाओं को दक्षता पुरस्कार हेतु अनुदान की स्वीकृति

मैदानी  जनपदों के बेसिक शिक्षा परिषद उत्तर प्रदेश द्वारा संचालित बेसिक विद्यालयों के उन अध्यापक /अध्यापिकाओं को जो प्राइम्ररी स्कूलों की कक्षा के छात्र / छात्राओं तथा जूनियर हाईस्कूल की कक्षा 8 के छात्र/ छात्राओं को पढ़ाते /पढ़ाती है, से सम्बन्ध्रित नियमावली मे निर्धारित अर्हताओं /शर्तों के अधीन प्रत्येक अध्यापक का रूपये 500/ – (पांच सौ) मात्र की दर से दक्षता पुरस्कार दिये जाने का प्राविधान शासनादेश संख्या – 2625/15 (5)-540 /73 दिनांक 30 जून, 1975 के अनुसार निर्धारित अर्हताओं शर्तो अधीन किया जाता है।

इस योजनान्तर्गत शासन द्वारा प्रति वर्ष रू० 4.00 लाख की स्वीकृति प्राप्त होती है जिसे जनपदवार फॉट के अनुसार उत्त्तर प्रदेश के समस्त बेसिक शिक्षा अधिकारी की द्वारा आवंटित किया जाता है।

शिक्षा मित्र योजना

प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमिकरण के लक्ष्य को ध्यान मे रखते हुए प्राथमिक विद्यालयों मे निर्धारित मानकानुसार छात्र अनुपात को बनाये रखने एवं ग्रामीण युवा शक्ति को अपने ही ग्राम में शिक्षा जगत की सेवा का अवसर उपलब्ध कराने हेतु उन्हें उत्प्रेरित करने के लक्ष्य को दृष्टिगत रखते हुए शिक्षा मित्र योजना का कर्यान्वयन वर्ष 2000-2001 मे प्रारम्भ किया गया । उक्त योजना 2006-07 से नगर क्षेत्रों मे भी लागू की गई है।

बेसिक शिक्षा परियोजना (बी0ई0पी0)  एवं बेसिक शिक्षा निदेशालय के अन्तर्गत कुल स्वीक़त 19865 शिक्षा मित्रों के सापेक्ष 17661 शिक्षा मित्र शिक्षण कार्य कर रहे है। शिक्षा मित्रों का चयन ग्राम शिक्षा समिति/नगर वार्ड समिति द्वारा संस्त़ति /प्रस्ताव करने के उपरान्त जिला स्तरीय समिति द्वारा अनुमोदन किये जाने के पश्‍चात किया जाता है।

चयनित शिक्षा मित्रों को जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान द्वारा 30 दिवसीय प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है। प्रशिक्षणोपरान्त सम्बन्धित ग्राम शिक्षा समिति शिक्षा मित्र को ग्राम पंचायत के अधीन जिस विद्यालय हेतु चयनित किया गया है मे शिक्षण कार्य करने की अनुमति प्रदान करती है। चयनित शिक्षा मित्र का कार्यकाल चालू शिक्षा सत्र के माह मई के अन्तिम कार्य दिवस को स्वत: समाप्‍त हो जाती है तथा उसके कार्य, व्यहवार एवं आचरण से संतुष्ट होने पर जिला स्तरीय समिति को प्रस्ताव प्रेषित करती है जिसके अनुमति के पश्‍चात सम्बन्धित शिक्षा मित्र  की पुन: अगले शिक्षा सत्र में  15 दिवसीय प्रशिक्षण प्रदान करने के उपरान्त शिक्षण कार्य करने की अनुमति प्रदान की जाती है।

चयनित शिक्षा मित्र को प्रथम 30 दिवसीय प्रशिक्षण अवधि मे रू0 400/ एवं 15 दिवसीय प्रशिक्षण पुनर्बोधात्मक प्रशिक्षपण अवधि में रू0 750/ – तथा शिक्षण अवधि मे रू0 3000/- प्रतिमाह की दर से मानदेय का भुगतान किया जाता है। शिक्षण मित्रों के प्रशिक्षण एवं मानदेय के भुगतान हेतु रू० 4900.00  लाख का बजट प्राविधान किया गया है। जिसके सापेक्ष शासन द्वारा रू० 4900.00 लाख की स्वीकृति निर्गत की गई जिसके सापेक्षय मानदेय हेतु रूपया 3930-93 लाख की धनराशि व्यय की गई।

कार्यालय जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी भवन निर्माण

जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय भवन निर्माण हेतु जनपदों में आवश्यकतानुसार (जिला योजनान्तर्गत) जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय भवन निर्माण कराया जाता है। शासन द्वारा जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय भवन निर्माण हेतु रू0 24.65 लाख की निर्माण लागत निर्धारित की गई। इस धनराशि से छ: नवीन जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय निर्मित कराये जाने की कार्यवाही की जा चुकी है। तथा पूर्व वर्षें के छ: अधूरे कार्यालय भवनों के पूर्ण कराने की कार्यावाही की गयी है।

सघन क्षेत्रीय विकास योजना

भारत सरकार द्वारा शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े जनपदों के वे ब्लाक जहां की जनसंख्या 20 प्रतिशत या उससे अधिक अल्पसंख्यक बाहुल्य है जो सघन क्षेत्रीय विकास योजना के अन्तर्गत अच्छादित किया गया है। इस योजना के अन्तर्गत  वर्ष 1994-95 से 2002-03 तक 596 प्राथमिक तथा 950 कन्या उच्च प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना की गई हैा भारत सरकार द्वारा वर्ष 2001-02 में 250 कन्या उच्च प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना हेतु रू0 1170.00 लाख का वित्त्तीय लक्ष्य था जिसके सापेक्ष रू0 1070.89 लाख की धनराशि स्वीकृत की जा चुकी है (वर्ष् 2001-02 में रू0  400.0 लाख प्रथम किश्त, वर्ष 2002-03 मे स्‍0 400.00 लाख द्वितीय तथा वर्ष 2003-04 मे रू0 270.89 लाख की प्रथम किश्त, वर्ष 2002-03 में रू0 400.00 लाख द्वितीय तथा वर्ष 2003-04 में रू0 270.89 लाख की तृतीय किश्त स्वीकृत की जा चुकी है एवं विद्यालयों का निर्माण किया जा चुका है विद्यालय भवन की चहारदीवारी के निर्माण हेतु वर्ष 2006-07 मे रू0 110.00 लाख का बजट प्राविधान किया गया लेकिन भारत सरकार से कोई धनरशि प्राप्त न होने के कारण स्वीकृति निर्गत नही की जा सकी ।

नि:शुल्क पाठ्य पुस्तक की व्यवस्था

कक्षा 1 से 5 तक के परिषदीय विद्यालयों मे अध्ययनरत सामान्य वर्ग के बालकों मे वर्ष 2001-02 मे नि:शुल्क पाठ्य पुस्तको के वितरण हेतु रू0 550.75 लाख की धनराशि व्यय हुई थी जिसके प्रति 2061656 छात्र लाभन्वित हुए थे । वर्ष 2002-03 में रू0 597.55 लाख की धनराशि व्यय हुई थी जिसके प्रति 22.02,969 छात्र लाभन्वित हुए थे एवं वर्ष 2003-04 में रू0 1138.00 लाख की धनराशि स्वीक़त हुई थी जिसमें से रू0 993.49 की धनरशि व्यय हुई और 34.25,758 छात्र लाभन्वित हुए थे। वर्ष 2004-05‍ मे उक्त योजनान्तर्गत पुस्तक वितरण नही हुआ। वर्ष 2005-06 में शासनादेश संख्या 535/75-5-2005-60 (30)/96 दिनांक 14-2-05 द्वारा निर्णय लिया कि अब सामान्य वर्ग के बालकों मे पाठ्य पुस्तक वितरति किये जाने की स्थायी व्यव्स्था सुनिश्चित की जाय जिसके तहत रू० 2000.00 लाख  की धनरशि वर्ष 2005-06 के लिये स्वीकृत किया गया जिसमें से रू0 1882.87 लाख व्यय हुआ तथा 6528714 छात्र लाभान्वित हुए । सर्व शिक्षा अभियान के अन्तर्गत  कक्षा 1 से  8 तक अध्ययनरत समस्त बालिकाओं तथा अनुसूचति जाति, जनजाति के बालकों मे निशुल्क पाठ्य पुस्तकों के वितरण से कुल 1,54,08,985 छात्र लाभान्वित हुये । इस प्रकार वर्ष 20205-06 में  समान्य वर्ग के बालकों एवं समस्त वर्ग की  बा‍लिकाओं  तथा अनुसूचित जाति, जनजाति के बालकों में नि:शुल्क पाठ्य पुस्तकों के वितरण से कुल 219.37.699 छात्र लाभान्वित हुये।

वर्ष 2006 – 07 मे कक्षा 1 से 5 तक के सामान्य वर्ग के बालकों में निशुल्क पाठ्य पुस्तक वितरण हेतु रू0 22 करोड़ की धनराशि स्वीकृति  जिसमें से रू0 2192.79 लाख व्यय हुआ तथा 6724042 छात्र लाभा‍न्वित हुए । कक्षा 6 से 8 तक के सामान्य वर्ग के बालको के लिये रू0 2115  लाख की धनाशि स्वीकृत हई और सम्पूर्ण धनराशि व्यय हुआ जिसके प्रति 1197812 छात्र लाभान्वित हुए । सर्व शिक्षा अभियान के अन्तर्गत कक्षा 1 से 8 तक अध्ययनरत समस्त वर्ग की बालिकाएं एवं अनुसूचति जाति, जनजाति के बालकों मे नि:शुल्क पाठय पुस्तकों के वितरण से 1,59,14,678 छात्र लाभान्वित हुए। इस प्रकार वर्ष 2006-07 में कक्षा 1 से 8 तक के सामान्य वर्ग के बालकों एवं अनुसूचित जाति जनजाति के बालकों तथा सभी वर्ग की बालिकाओं में नि:शुल्क पाठ्य पुस्तकों के वितरण से कुल 2,38,36,532 छात्र लाभान्वित हुये।

स्काउटिंग रेडक्रास तथा जान्स एम्बुलेन्स

स्काउटिंग आन्दोलन के जनक राबर्ट स्टिफैंस स्मिथ बैडन पावेल थे। भारत स्काउटिंग 1913 में ऐनी बेसेन्ट द्वारा प्रारम्भ करायी गयी थी । स्काउटिंग से बच्चों से बड़ो तक के उच्च् कोटि की नैतिकता व योग्यता का विकास किया जाता है । अब भारत स्काउट व गाइड संस्था है बेसिक शिक्षा परिषद के नियंत्रणाधीन विद्यालयों के छात्रों को स्काउट /गाइड कार्यक्रमों मे प्रतिभाग कराने के लिये शिक्षा विभाग प्रत्येक जनपद में स्काउट प्रतियोगिताओं का संचालन कराते है शासन द्वारा रू0 3.75 लाख का अनुदान दिया जाता है जिसे जनपदों मे बांट कर उपलब्ध कराया जाता है जिन विद्यालयों मानक पूरे होते है उन्हें रू0 400/ अनुदान राशि दी जाती है। प्रतियोगिताओं के व्यय का वहन विद्यालयों से प्राप्‍त स्काउट शुल्क से किया जाता है जूनियर रेडक्रास प्रतियोगिता जो स्वास्थ्य से सम्बन्धित है, का अयोजन किया जाता है जिसके अध्यक्ष जिला विद्यालय  निरीक्षक होते है। इसके अतिरिक्त सेट जान्स एम्बुलेन्स प्रतियोगिता का भी आयोजन किया जाता है इसमें कैडेट डिवीजन तथा मैकन्जी कोर्स प्रतियोगिता आदि आयोजित की जाती है।

 विद्यालयी खेलकूद कार्यक्रम

शैक्षिक संस्थाओं मे शैक्षिक कार्यक्रमों के साथ-साथ शिक्षणेत्तर कार्यकलापों को भी विशेष महत्व दिया जाता है। खेलकूद से ही स्वस्थ्य शरीर में स्वस्थ्य मन का निर्माण होता है। विद्यालयी खेलकूद कार्यक्रम मे प्रतिस्पर्धा करने का बढावा मिलता है । इससे अपने ज्ञान व खेल के स्तर के उन्नयन के प्रति उत्कण्ठा पैदा होती है। इस हेतु बेसिक शिक्षा विभाग परिषदीय, विद्यालयों, सहायता प्राप्त विद्यालयों एवं मान्यता प्राप्‍त विद्यालयों के छात्रों के साथ अन्तर्विद्यालयीय प्रतियोगिताये ब्लाक व जनपद स्तर पर प्रतिवर्ष आयोजित की जाती है। इसमें सफल विजयी छात्र मण्डलीय एवं राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं मे प्रतिभाग करता है बेसिक शिक्षा विभाग र्वतमान में 16 खेलों में  प्रतियोगिताए अयो‍‍‍जित कराता है। जिनमें चयनित छात्र स्कूल गेम्स र्फडरेशन आफ इण्डिया द्वारा आयोजित राष्‍ट्रीय  प्रतियोगिताओं मे प्रतिभाग भाग करते हैं उपरोक्त प्रतियोगिताओं का आयोजन छात्रों से प्राप्त क्रीड़ा शुल्क से वहन किया जाता है। शासन द्वारा 5.00 लाख रूपये खेलकूद एव अन्य शैक्षिक कार्यकलापों हेतु अनुदान दिया जाता है जिसका जनपदवार कांट कर जनपदों को उपलब्ध कराया जाता है। इस धनाशि से खेल उपकरण एवं अन्य सहायक सामग्रियाँ क्रय की जाती है।     (अतुल कुमार श्रीवास्तव)

सवाल शिक्षा की गुणवत्ता का

यूनेस्को की एक ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में बच्चों को शिक्षा की उपलब्धता आसान हुई है. लेकिन गुणवत्ता का सवाल ज्यों का त्यों बना हुआ है और स्कूल जाने वाले बच्चे भी बुनियादी शिक्षा से वंचित हो रहे हैं.

इसके साथ-साथ भारत में वयस्क निरक्षरों की संख्या चौंकाने वाली है. संयुक्त राष्ट्र की संस्ता यूनेस्को की तरफ से जारी किए गए ग्लोबल मॉनिटरिंग रिपोर्ट (जीएमआई) के मुताबिक़ भारत में वयस्क निरक्षरों की संख्या 28 करोड़ 70 लाख है. जो दुनियाभर में कुल वयस्क निरक्षरों की संख्या का 37 प्रतिशत है.

साल 1991 में भारत में साक्षरता का प्रतिशत 48 प्रतिशत था, जो 2006 में बढ़कर 63 प्रतिशत हो गया. रिपोर्ट के अनुसार जनसंख्या में वृद्धि के कारण निरक्षरों की कुल संख्या में कोई परिवर्तन नहीं देखा गया .भारत ने पूर्व-प्राथमिक शिक्षा और प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में  महत्वपूर्ण प्रगति की है. भारत उन देशों में शामिल है जो 2015 तक पूर्व-प्राथमिक (नर्सरी) स्तर पर 70 प्रतिशत नामांकन का लक्ष्य हासिल कर लेंगे. इन देशों में ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया, कनाडा, डेनमार्क, नार्वे, स्वीडन, अमरीका और ब्रिटेन शामिल हैं. हालांकि रिपोर्ट में शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठाए गए हैं. भारत उन 21 देशों में शामिल हैं जहाँ बच्चों का शैक्षिक स्तर काफी कम है.

रिपोर्ट के अनुसार भारत शिक्षा क्षेत्र के ऊपर ध्यान दे रहा है, लेकिन शिक्षा क्षेत्र को मिलने वाले बजट में कमी आयी है. 1999 में कुल बजट का 13 फीसदी शिक्षा पर खर्च हो रहा था. लेकिन 2010 में यह घटकर मात्र 10 फीसदी रह गया है. यूनेस्को की ताजा रिपोर्ट वैश्वक शिक्षा के लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में होने वाले प्रयासों को सामने लाती है. वैश्विक निगरानी रिपोर्ट के मुताबिक़ शैक्षिक लक्ष्यों को 2015 तक हासिल नहीं किया जा सकता है.

यह रिपोर्ट कहती है कि समस्या केवल बच्चों को स्कूल भेजने की नहीं है. स्कूल जाने वाले बच्चे भी शिक्षा के घटिया स्तर के कारण पिछड़ रहे हैं. प्राथमिक स्कूल जाने वाले करीब एक तिहाई बच्चे, चाहे वे कभी स्कूल गए हों या नहीं बुनियादी शिक्षा नहीं प्राप्त कर रहे हैं. यूनेस्को की महानिदेशक इरिना बोकोवा रिपोर्ट में विभिन्न देशों की सरकारों से अपने प्रयासों को बढ़ाने की बात कहती हैं ताकि ताकि ग़रीबी, लिंग और भौगोलिक स्थिति जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद सभी को शिक्षा मुहैया करवाई जा सके.

उनके मुताबिक़, “शिक्षा की कोई व्यवस्था केवल तभी बेहतर हो सकती है, जब शिक्षक अच्छे हों. शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए शिक्षकों की क्षमताओं का विकास करना बहुत जरूरी है. अध्ययन के दौरान मिले साक्ष्यों से यह बात स्पष्ट हुई है कि शिक्षकों को सहयोग मिलने से शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होता है, उनको सहयोग न मिलने की स्थिति में शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट होती है और युवाओं में निरक्षरता अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाती है.”

रिपोर्टे के अनुसार 2015 तक सार्वजनिक प्राथमिक शिक्षा का लक्ष्य हासिल करने के लिए सरकारों को शिक्षकों के खाली पदों को भरने में तेजी लानी चाहिए. वैश्विक स्तर पर 16 लाख शिक्षकों की नियुक्ति करनी होगी. अच्छे शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने और बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दिलाने के लिए चार सूत्रीय कार्यक्रम पेश करती है.

1. अच्छे शिक्षकों का चयन बच्चों की विविधतता को ध्यान में रखते हुए किया जाय.
2. शिक्षकों को शुरुआती कक्षाओं से कमज़ोर बच्चों की मदद करने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए.
3. देश के ज़्यादा चुनौती वाले हिस्सों में सबसे अच्चे अध्यापकों की नियुक्ति की जानी चाहिए. ताकि असमानता को कम किया जा सके.
4. सरकार को शिक्षकों को पेशे में बने रहने लायक प्रोत्साहन देना चाहिए ताकि किसी भी परिस्थिति में यह सुनिश्चित किया जा सके कि सारे बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सके।

लेकिन यह जिम्मेदारी अकेले शिक्षकों पर नहीं डाली जा सकती है. रिपोर्ट शिक्षकों को काम करने के लिए अच्छे तरीके से निर्मित पाठ्यक्रम और मूल्यांकन पर ध्यान देने की बात कहती है. इसके साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र को होने वाली फंडिग में कमी का सवाल भी उठाया गया है. इस बजट को भारत जैसे देशों में कर बढ़ाकर पूरा किया जा सकता है. यूनेस्को की ताजा रिपोर्ट से भारत में प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र की चुनौतियां सामने आती हैं. नामांकन के लक्ष्य के करीब पहुंचने के बाद गुणवत्ता का सवाल सबसे अहम हो गया है. यह बात रिपोर्ट में सामने आती है. सरकार शिक्षकों के प्रशिक्षणों पर कागजों में तो काफी काम दिखा रही है, बजट भी खर्च हो रहा है, लेकिन शिक्षक प्रशिक्षणों से किसी लाभ की बात से इनकार करते हैं. शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों को औपचारिकता के रूप  में देखते हैं. इस मानसिकता में बदलाव के लिए भी प्रयास करने की जरूरत है।