शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आर०टी०ई०)

1. निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम- 2009

http://www.upefa.com/upefa/rte/rte.pdf
2.सूचना का अधिकार अधिनियम के बारे में, 2005 में सूचना

http://www.upefa.com/upefaweb/SuchnaKaAdhikar.pdf

सर्व शिक्षा अभियान- परिचय

भारत सरकार की राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 (यथा अधतनीकृत नीति-1992) एवंकार्यक्रम क्रियान्वयन परियोजना, 1992 के अन्तर्गत प्राथमिक शिक्षा अर्थात कक्षा-8 तक की शिक्षा  को सर्वजन सुलभ करने की राष्ट्रीय वचनबद्धता की पुन: पुष्टि करती है।एनण्पीण्र्इण् के प्रस्तर 5.12 में यह निर्णय पारित हो चुका है कि 21वीं शताब्दी केआगमन के पूर्व यथेष्ट कोटि की गुणवत्ता प्रधान मुक्त एवं अनिवार्य शिक्षा 14 वर्ष कीआयु तक के सभी बच्चों को प्रदान की जायेगी।उपरोक्त को दृष्टिगत रखते हुये, प्रदेश में उच्च कोटि की प्राथमिक शिक्षा केअभिवृद्धि एवं व्यापक प्रचार-प्रसार हेतु विष्व बैंक समर्थित बेसिक शिक्षा परियोजना. वर्ष 1993 से स्वीकृत एवं क्रियानिवत की गयी। इस परियोजना के निर्विघ्न क्रियान्वयन हेतुसंस्था पंजीयन अधिनियम, 1860 के अन्तर्गत ”उत्तर प्रदेश सभी के लिये शिक्षापरियोजना परिषद 17 मर्इ, 1993 को स्थापित की गयी। इसके उददेष्य हैं -स्वायत्तशासी एवं स्वतन्त्र इकार्इ के रूप में कार्यरत यह परिषद उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा परियोजना की रूपरेखा सहित प्रकाशित अभिलेख एवं समय-समय परपुनरीक्षण के आधार पर तैयार किये गये संशोधित प्रारूप के अनुसार सर्व शिक्षापरियोजना (जो अब ”परियोजना सन्दर्भित की जायेगी) को क्रियानिवत करेगी। परिषदकी गतिविधियां चयनित जनपदों में ही केनिद्रत रहेंगी तथापि चयनित एवं समर्थितपरियोजनाओं के दृष्टिगतपरियोजना सम्पूर्ण प्रदेश् में विस्तारित की जा सकेगी। परिषदकी स्थापना लक्ष्य प्रापित के निमित्त की गयी है ताकि बेसिक शिक्षा व्यवस्था मेंआधारभूत परिवर्तन क्रियानिवत करते हुये समग्र रूप में सम्पूर्ण सामाजिक- सांस्कृतिक परिवेष में आमूल-चूल परिवर्तन किया जा सके। परिषद निम्नलिखित उददेष्यों कीप्रतिपूर्ति हेतु कार्यरत रहेगी –

  • शिक्षा की समग्रता एवं सार्वजनिकता को दृशिटगत रखते हुए . (1) 14वर्ष की सीमा तक के सभी बच्चों हेतु प्राथमिक शिक्षा के निमित्त प्रवेश मार्गनिर्मित करना (2)औपचारिक अथवा अनौपचारिक शिक्षा कार्यक्रम के माध्यम से प्राथमिक स्तर की शिक्षा पूर्ण होने तक सभी की प्रतिभागिता (3)सभी को न्यूनतमस्तर की शिक्षा प्रापित के योग्य बनाना।
  • युवाओं हेतु शिक्षा एवं कौशल विकास के प्राविधानों का संचालन।
  • शिक्षा के क्षेत्र में लिंग समानता एवं महिला सषक्तीकरण के सुझावों को अधिकाधिक लागू करना।
  • अनुसूचित जाति,अनुसूचित जनजाति एवं समाज के गरीब वर्ग के बच्चों को शिक्षा का समान अवसर प्रदान करने हेतु आवष्यक हस्तक्षेप करना।
  • संस्कृति, संचार, विज्ञान, पर्यावरण आदि विषयक समस्त शैक्षिक गतिविधियों को विशेष महत्व देते हुए सामाजिक न्याय की भावना को विकसित करना।

1993 में प्रारम्भ की गयी बेसिक शिक्षा परियोजना 17 जनपदों में क्रियानिवत की गयी। यह परियोजना वर्ष 2000 में पूर्ण हो गयी। वर्ष 1997 में प्रारम्भ की गयी जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम की द्वितीय श्रृंखला प्रदेश के 22 जनपदों में क्रियानिवत की गयी जो वर्ष 2003 में पूर्ण हो गयी। इसके अतिरिक्त डी० पी० ई० पी० (फेज-3) अर्थात उपयर्ुक्त परियोजना की तीसरी श्रृंखला वर्ष 2000 में प्रदेश के 32 जनपदों में क्रियानिवत की गयी और यह श्रृंखला भी 31 मार्च, 2006 को पूर्ण हो गयी। जनशाला परियोजना वर्ष 2000 से 2003 के मध्य लखनऊ जनपद मेंक्रियानिवत की गयी। वर्ष 2001-2002 में सर्व शिक्षा अभियान परियोजना 16 जनपदों में प्रारम्भ की गयी और सम्प्रति यह परियोजना प्रदेश के सभी जनपदों में क्रियानिवत की जा रही है।

किसी भी प्रकार के विकास एवं उन्नति के लिए शिक्षा एक महत्वपूर्ण साधन है। शिक्षा के अभाव में कुछ भी अर्थपूर्ण हांसिल नहीं किया जा सकता। यह लोगों के जीवन स्तर में सुधार तथा उनके जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाने हेतु क्षमताओं का निर्माण कर तथा बेहतर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। साक्षरता के स्तर में वृद्धि से उच्च उत्पादकता बढ़ती है तथा अवसरों के सृजन से स्वास्थ्य में सुधार, सामाजिक विकास और उचित निष्पपक्षता को प्रोत्साहन मिलता है। यह लोगों को अपने बलबूते पर किसी भी निर्णय लेने तथा विचार करने हेतु सामर्थ्य‍ प्रदान करता है।

साक्षरता स्तर में वृद्धि तथा कुशल कार्यबल का विकास, मध्य प्रदेश को जीवन की गुणवत्ता में सुधार हेतु सहायता कर रहा है। आज के बदलते युग में उच्च शिक्षित एवं कुशल पेशेवरों की आवश्यकता निरंतर बढ़ रही है। राज्य के लिए यह अत्यावश्यक है कि वह सभी स्तर के लोगों के लिए शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराए। साथ ही यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि सभी अपनी बुनियादी शिक्षा गुणवत्ता के साथ पूर्ण करे और सभी के लिए उच्च शिक्षा एवं उन्नत कौशल प्राप्त करने के अवसर यहां उपलब्ध हो।

शिक्षा के क्षेत्र में मध्य्प्रदेश ने बहुत अधिक उन्नति की है। साक्षरता दर वर्ष 2001 में 64.11 प्रतिशत थी, (संपूर्ण भारत – 65 प्रतिशत) जो वर्ष 2011 में बढ़कर 70.63 प्रतिशत (संपूर्ण भारत में 74.04 प्रतिशत) हुई।

6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों के दाखिलों का लक्ष्य लगभग पूरा कर लिया गया है। वर्ष 2011 में, प्राथमिक स्तर (कक्षा 1 से 5) के लिए सकल दाखिला अनुपात 98.88 प्रतिशत तथा उच्च प्राथमिक सस्तर (कक्षा 6 से 8) के लिए सकल दाखिला अनुपात 99.27 प्रतिशत रहा है। ड्रॉपआउट रेट में भी कमी आयी है और अब यह प्राथमिक स्तर पर 8.2 प्रतिशत तथा उच्च प्राथमिक स्तर पर 7.4 प्रतिशत हो गई है। मध्य प्रदेश में महिला साक्षरता में सुधार लाने हेतु अधिक जोर दिया जा रहा है। राज्य का लक्ष्य न केवल साक्षर राज्य के रूप में बल्कि स्कू्ली समाज से परे शिक्षा के प्रति जागरूक समाज के रूप में शिक्षित राज्य होना है। इसलिए मध्यप्रदेश शासन सभी को उचित गुणवत्ता तथा प्रासंगिक शिक्षा के अवसर प्रदान करने और साथ ही रोजगारोन्मुखी तथा कौशल विकास के पाठ्यक्रम (कोर्स) पर अधिकतम बल दे रही है। इस क्षेत्र में, शासन भी निजी उद्यमियों को राज्य में रखने हेतु उत्सुक है, जो कि इन उद्देश्यों को वास्तविकता में लाने हेतु सहयोग प्रदान कर सकते हैं।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम 6 से 14 वर्ष के बीच के सभी बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार को प्रमाणित करने हेतु 1 अप्रैल, 2010 को प्रभाव में लाया गया। इस अधिनियम के द्वारा शासन तथा स्थानीय अधिकारियों पर निर्धारित मापदण्ड और नियम के अनुसार विद्यालय, शिक्षक तथा अन्य सुविधायें उपलब्ध कराने हेतु दायित्व सौंपा गया।

समाज या राज्य अपना अधिकतम विकास करने में तभी सक्षम होगा, जब समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता में वृद्धि कर पाएगा। अपनी इस क्षमता को हांसिल करने के लिए व्यक्ति को शिक्षित होना होगा। ‘’बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम, 2009” के द्वारा राज्य शासन और स्थानीय निकायों को यह सुनिश्चित करने हेतु आदेश दिया गया है कि 6-14 वर्ष के आयु का प्रत्येक बच्चा कम से कम प्राथमिक शिक्षा पूरी करे।

साक्षरता स्थिति

मध्यप्रदेश राज्य की साक्षरता की रूपरेखा का सारांश निम्नलिखित तालिका में दिया गया है

साक्षरता दर (2001) साक्षरता दर (2011)
पुरूष    76.8   80.5
महिला    50.2   60

स्कूल शिक्षा

Schools in Madhya Pradesh
Government Primary Schools    83412
Aided Primary Schools (Private)    852
Unaided Primary Schools (Private)    12533
Government Upper Primary Schools    28479
Aided Upper Primary Schools (Private)    410
Unaided Upper Primary Schools (Private)    14773
Total High Schools (Including Private)    6636
Total Higher Secondary Schools (Including Private)    5211
Govt. Primary School Govt. Upper Primary School
Teacher in Position    191368    74552
Enrolment    6804712    3315843
Pupil-teacher Ratio (Private)    35.6    44.5

राज्य में प्राथमिक शिक्षा के सर्वव्यापीकरण हेतु शासन प्रतिबद्ध है। बेहतर बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने, शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार, शिक्षा तक पहुंच में सुधार और समुदाय की भागीदारी को प्रोत्साहित करने पर ध्यान केंद्रित है।

  • शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के प्रावधानों के अनुसार, राज्य ने प्राथमिक तथा उच्च प्राथमिक स्कूलों तक पहुंच के सर्वव्यापीकरण का लक्ष्य लगभग हांसिल कर लिया है।
  • आगामी वर्षों में 5 कि.मी. की दूरी के अंदर उच्च विद्यालय स्थाथपित करने का निर्णय लिया गया है।
  • बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के प्रावधानों के अनुसार, तीन वर्ष के भीतर सभी उच्च विद्यालयों में आवश्यक सुविधाओं की उपलब्धता को सुनिश्चित करने के प्रयास किये जा रहे हैं।
  • सर्व शिक्षा अभियान अब आरटीई अधिनियम को कार्यान्वित करने का एक जरिया है।
बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की प्रमुख विशेषताएं है |
  • 6 से 14 वर्ष के वर्ग के सभी बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा ।
  • प्राथमिक शिक्षा पूर्ण होने तक किसी भी बच्चे को रोका नही जायेगा, न ही निष्काषित किया जायेगा और न ही बोर्ड परीक्षा हेतु अग्रेषित किया जायेगा।
  • यदि 6 वर्ष से अधिक उम्र का बच्चा किसी भी स्कूल में भर्ती नहीं हुआ है या जो भर्ती हैं, उसने अपनी प्राथमिक शिक्षा पूर्ण नहीं की है, तो वे अपनी उम्र के अनुसार उचित कक्षा में भर्ती किये जायेंगे और यदि कोई बच्चाम अपनी उम्र के अनुसार उचित कक्षा में प्रवेश लेता है, तो वह संबंधित शिक्षा पाने का हकदार होगा।
  • प्राथमिक शिक्षा हेतु प्रवेश लेने के लिए बच्चे की उम्र का निर्धारण जन्म प्रमाण पत्र के आधार पर, जो कि जन्म, मृत्यु और विवाह पंजीकरण अधिनियम, 1856 के प्रावधानों के अनुसार हो या संबंधित अन्य दस्तावेज, जो प्रमाणित कर सकते हों, उनके आधार पर किया जायेगा। उम्र प्रमाण पत्र न होने की स्थिति में बच्चे को प्रवेश से वंचित नहीं किया जायेगा।
  • प्राथमिक शिक्षा पूर्ण करने वाले बच्चे को एक प्रमाण पत्र आबंटित किया जायेगा।
  • शिक्षक की स्थिति का आंकलन शिक्षक-छात्र अनुपात के आधार पर किया जायेगा।
  • न्यूनतम 25 प्रतिशत सुविधाहीन तथा कमजोर वर्ग के बच्चों के प्रवेश, सहायता रहित निजी स्कूलों में कक्षा 1 में किये जायें।
  • अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान की जाये।
  • स्कूल शिक्षक को पांच साल के भीतर पेशेवर डिग्री प्राप्त करना बंधनकारक होगा अन्यथा वे नौकरी खो देंगे।
  • स्कूल का बुनियादी ढांचा तीन वर्ष में उन्नत किया जायेगा ।
  • वित्तीय भार राज्य और केन्द्र शासन के बीच बांटा जायेगा।

मध्ये प्रदेश, देश के कुछ ऐसे राज्यों में से एक था, जिन्होने आरटीई अधिनियम प्रारंभ होने के एक वर्ष में ही शिक्षा का अधिकार अधिनियम अधिसूचित किया। अधिनियम के प्रावधानों के कार्यान्वयन की निगरानी हेतु राज्य स्तर पर आरटीई सेल का गठन किया गया है। इस प्रणाली में पारदर्शिता लाने एवं निगरानी हेतु सूचना प्रौद्योगिकी टूल्स का इस्तेमाल किया जा रहा है।

पहलें

“बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009” यह प्रमाणित करता है कि बच्चों के अनुकूल दृष्टिकोण से, निष्पक्षता और समानता के साथ शिक्षा की गुणवत्ता बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए सुगम हो। अधिनियम के अन्य संबंधित वर्ग (24, 29 एवं इत्यादि) यह स्पष्ट करते हैं कि अधिनियम की पूर्णरूपेण सुचारूता सुनिश्चित करने हेतु, शिक्षा के क्षेत्र में बच्चों में शिक्षा संबंधी दृष्टिकोण पुनर्निर्मित करना आवश्यक है। अधिनियम विस्तृत रूप से आवश्यक जरूरतें प्रदान करता है, जो कि स्कूल प्रणाली को सर्व शिक्षा अभियान कार्यक्रम के तहत आवश्यक है। इसके अतिरिक्त यह एक राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा (नेशनल करिक्युलम फ्रेमवर्क) 2005, या आरटीई अधिनियम, या नेशनल करिक्युलम फ्रेमवर्क फॉर टीचर्स ट्रेनिंग 2010 है, और निष्पक्षता एवं समानता के साथ शिक्षा को सुनिश्चित करना इसका मुख्य उद्देश्य है। मध्यरप्रदेश में बच्चों के अध्ययन स्तर को बढ़ावा देने के लिए निम्नलिखित गतिविधियां की जा रही है;

प्रतिभा विकास कार्यक्रम

राज्य में अभ्यास वृद्धि कार्यक्रम के तहत् दक्षता संवर्धन कार्यक्रम लिया गया था। यह कार्यक्रम आरटीई एवं सतत् एवं अवधारणा मूल्यांकन मापदण्डों के आधार पर उन्न्त एवं विकसित किये गये हैं, जिसे प्रतिभा विकास कार्यक्रम का नाम दिया गया है। यह अब दार्शनिक तथा सह दार्शनिक क्षेत्रों को भी शामिल करता है। प्रतिभा विकास कार्यक्रम यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक बच्चा उसकी क्षमता के अनुसार निर्धारित समय सीमा के भीतर सामर्थ्यता के स्तर को प्राप्त करे। कार्यक्रम के उद्देश्य निम्नलिखित है ;

  • शैक्षणिक वर्ष के अंत तक सभी बच्चे पढ़ने, लिखने तथा उनके विषय का ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम हो।
  • सभी बच्चे बुनियादी शिक्षा और गणना कुशलता/सामर्थ्यता तथा विषयवस्तु का ज्ञान हासिल करें|
  • पढ़ने की आदत को विकसित करना तथा बच्चे को एक स्वतंत्र पाठक बनाना।
  • निरंतर कक्षा की आवाजाही तथा विद्यार्थी उपलब्धि पर ध्यान केंद्रित करने हेतु प्रभावी निगरानी प्रणाली की स्थापना करना।
प्रतिभा विकास कार्यक्रम की प्रमुख विशेषताएं

इस कार्यक्रम में शामिल उन्नत क्षेत्रों के कुछ मुख्य अंश निम्नलिखित है;

  • हिन्दी और अंग्रेजी भाषाओं में आधारभूत सामर्थ्यता।
  • गणित से संबंधित सामर्थ्यता जैसे : अंकों की पहचान, प्लस वेल्यूस, ऐक्सपेन्डेड नोटेशन, जोड़ना, घटाना, गुणा करना, भाग देना, यूनिटरी विधि तथा फ्रेक्शन।
  • कक्षा 4 में, सामर्थ्यता के आधार पर 75 प्रतिशत तथा पाठ्यपुस्तक अभ्यास के आधार पर 25 प्रतिशत मूल्यांकन किया जायेगा। कक्षा 5 के लिए यह प्रतिशत 50-50 होगा ।
  • कक्षा 4 एवं 5 में, सामाजिक विज्ञान का निर्धारण महीने वार और स्कूल स्तर पर किया जायेगा ।
  • कक्षा 6 और 8 के सभी विषयों का मूल्यांकन पाठ्यपुस्तक में दिये गये विषयवस्तु के आधार पर किया जायेगा ।
  • शिक्षक को किसी संबंधित प्रश्न को समझने एवं उसे तैयार करने हेतु एक प्रश्न बैंक का विकास किया जा रहा है।
  • प्राथमिक कक्षा के बच्चों के उपयोग हेतु वर्कशीट तैयार की गयी है, ताकि विकास के तहत वे उच्च प्राथमिक कक्षा में पहुंचे ।
प्राथमिक स्कूलों में गतिविधि आधारित शिक्षण

गतिविधि आधारित शिक्षण (एबीएल) दृष्टिकोण से आशा है कि यह न केवल कक्षा के वातावरण की गुणवत्ता में सुधार करें बल्कि बहस्तरीय कक्षाओं के मुद्दों को भी सम्बोधित करे। गतिविधि आधारित शिक्षण (एबीएल) दृष्टिकोण के तहत् आने वाले मील के पत्थरों का सामना करने हेतु दक्षताओं/सामर्थ्यताओं को छोटी इकाईयों में बांटा गया है। इन मील के पत्थरों को अभ्यास सीढि़यों के रूप में रखा गया है और यह अभ्यास सीढि़यां कक्षा 1, 2, 3 और 4 के लिए प्रत्येक विषय हेतु विकसित की गयी हैं। गतिविधि आधारित शिक्षण को राज्य के 50 जिलों के 4000 प्राथमिक स्कूलों में प्रारंभिक रूप से क्रियान्वित किया गया है। अब प्रत्येक जिले में एक विकासखण्ड को कार्यक्रम के तहत कवर किया गया है। प्रारंभ में कक्षा 1 और 2 के सभी विषय जैसे : हिन्दी, अंग्रेजी और गणित के लिए गतिविधि आधारित शिक्षण दृष्टिकोण लिया गया और अब इसे कक्षा 4 तक के लिए बढ़ा दिया गया है। एक परिणाम के रूप में निम्न परिवर्तन सफलतापूर्वक कक्षा संबंधी प्रक्रियाओं में शुरू किए गए थे|

  • बच्चों को उनकी अभ्यास क्षमता के अनुसार सीखने की स्वतंत्रता है।
  • बच्चे विभिन्न गतिविधियों द्वारा सीखे।
  • बच्चें अपने स्तर पर सीखने का प्रयास करें।
  • मल्टीं ग्रेड और बहुस्तारीय शिक्षण व्यपवस्था संभव की गयी है।
  • विभिन्न तरह की गतिविधियों और खेल के माध्यम से अभ्यास कराते हुए आनंददायक शिक्षण देना संभव किया गया है।
  • परीक्षा के डर को दूर करने हेतु मूल्यांकन की एक प्रणाली को अपनाया गया है।
  • बच्चों पर आवश्यकतानुसार ध्यान देने के लिए शिक्षक के पास अवसर है।
  • बच्चों से स्कूल बैग का बोझ बहुत दूर किया गया है।
  • बच्चों के लिए अभ्यास करने हेतु बहुत अवसर है।
  • अभ्यास हेतु साथी वर्ग बढ़ाया गया है।
  • अभ्यास हेतु प्रचुर मात्रा में सामग्री तथा उनका उपयोग करना सुनिश्चित किया गया है।
  • बच्चों के लिए अनुकूल कक्षाएं गतिविधि और वातावरण।
  • शिक्षक पूर्ण रूप से बच्चों के सामने आने वाली कठिनाईयों का सामना करने हेतु जागृत हैं।
उच्च प्राथमिक स्कूलों में सक्रिय अभ्यास क्रियाविधि (एएलएम)

विज्ञान और सामाजिक विज्ञान पर एएलएम को एक विस्तृत टक्कर के रूप में माना जाता है। एएलएम को राज्य संदर्भ के आधार पर विकसित किया गया है।

कक्षा 6 से 8 तक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करने हेतु एएलएम का लक्ष्य रखा गया है। यह दृष्टिकोण बच्चों को विचार/विषय और किसी अवधारणा संबंधी इच्छाशक्ति को बढ़ाने के योग्य बनाता है। सामान्यत: राज्यो और अन्य स्थानों के एएलएम में बस इतना अन्तर है कि शिक्षक के लिए कोई भी विचार/विषय नक्शे, किसी पाठ की योजना बनाने के काम आता है और साथ ही यह बच्चों की अवधारणा शक्ति को बढ़ाने हेतु एक अग्रिम आयोजक का भी काम करता है। प्रथम चरण में एएलएम को पूरे राज्य भर में प्रारंभ किया गया था और अब यह हर जिले के तीन विकासखण्ड तक बढ़ा दिया गया है।

कुछ प्रमुख कार्यक्रम

सर्व शिक्षा अभियान

सर्व शिक्षा अभियान के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित है;

  • सभी बच्चों का स्कूल के लिए नामांकन।
  • उच्च प्रा‍थमिक स्तर तक के सभी बच्चों का रिटेंशन।
  • प्राथमिक तथा उच्च प्राथमिक स्तर के बच्चों में अभ्यास उपलब्धि संबंधी महत्वपूर्ण बढ़ोत्तरी सुनिश्चित करना।
सर्वव्यापीकरण पहुंच
  • प्रत्येक निवासस्थान के 1 किलोमीटर के भीतर 6 से 11 वर्ष तक के वर्ग के 40 बच्चों की उपस्थिति के साथ प्राथमिक शिक्षा सुविधा उपलब्ध कराने के लिए राज्य शासन नीति।
  • इसी प्रकार उच्च प्राथमिक शिक्षा सुविधा, निवास स्थान के 3 कि.मी. के भीतर, जिसमें कि 12 बच्चे जो 5 वी कक्षा उत्तीर्ण कर चुके हों।
स्कूल से बाहर के माहौल के लिए रणनीति
  • जागृति अभियान इत्यादि के फलस्वरूप हमें लाभ में महत्वपूर्ण वृद्धि और एकल दाखिला अनुपात प्राप्त हुआ।
  • कभी भी दाखिला न किये गये बच्चे तथा स्कूल छोड़ने वाले उन बच्चों को उचित उम्र के अनुसार कक्षा में भर्ती किया गया तथा उनको अन्य बच्चों के समतुल्य लाने हेतु खास प्रशिक्षण उपलब्ध कराये गये।
  • वर्ष 2011-12 में लगभग 1.26 लाख बच्चे स्कूल से दूर पाये गये थे। उनकी उम्र के अनुसार उन्हें सक्षम बनाने के लिए खास प्रशिक्षण आयोजित किये गये थे।
  • आवासीय मुख्य प्रशिक्षण केन्द्र :- यह केन्द्र प्राय: उप विकासखण्ड स्तर पर शुरू किये गये थे, खास तौर से वहां, जहां बड़ी संख्या में बच्चे स्कूल से अनभिज्ञ थे और साथ ही उन बच्चों के लिए जो कि अपनी खास परेशानियों की वजह से शिक्षा पूरी नहीं कर सकते थे।
  • गैर आवासीय मुख्य प्रशिक्षण केन्द्र :- जहां बच्चे स्थानीय स्तर पर शिक्षा पूरी कर सकते है, वहां पर ये केन्द्र शुरू किये गये थे।
विश्वव्यापी रिटेंशन रणनीति
  • बच्चों को आकर्षित करने हेतु प्रलोभन :- सभी बच्चों को मुफ्त पाठ्यपुस्तकें, 2 जोड़ी यूनिफॉर्म, कक्षा 6 के उन बच्चों को साईकिल भेंट जो अपने आवास से दूर थे, सामाजिक तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए छात्रवृत्ति योजना, मध्यान्ह भोजन सुविधा ।
  • एसएमसी के लिए प्रेरणा :- संपूर्ण शिक्षित ग्राम योजना।
  • बच्चों का उच्च स्तर सुधारने के लिए :- 100 प्रतिशत दाखिला तथा प्रतिदिन उपस्थिति।
  • ‘’ए” केटेगरी प्राप्त करने के लिए :- (‍न्यूनतम शिक्षण स्तर परिभाषित करने के लिए 90 प्रतिशत विद्यार्थी) – रू. 5000/- प्रति कक्षा।
  • ‘’बी” केटेगरी प्राप्त् करने के लिए :- (‍न्यूनतम शिक्षण स्तर परिभाषित करने के लिए 80 प्रतिशत विद्यार्थी) – रू. 2500/- प्रति कक्षा।
स्कूल चलें हम अभियान

मध्यिप्रदेश शासन ने ‘’स्कू‍ल चलें हम अभियान” यह सुनिश्चित करने हेतु चलाया कि शिक्षा के महत्व का संदेश प्रत्येक परिवार और व्यक्तियों तक पहुंचे, ताकि सभी माता-पिता उनके बच्चों को स्कूल भेजें। एक जन आंदोलन ‘स्कू‍ल चलें हम’ के रूप में शुरू किया गया, जिसमें समाज के सभी वर्गों ने यह सुनिश्चित करने हेतु भाग लिया कि सभी बच्चों को नियमित रूप से स्कूलों में भर्ती किया जा रहा है। स्कूल चलें हम अभियान की प्रमुख गतिविधियां इस प्रकार है :-

  • डोर टू डोर संपर्क अभियान। यह सर्वेक्षण 0 से 14 वर्ष तक के वर्ग के बच्चों को शामिल करता है।
  • नारा लिखना।
  • डाटा संग्रहण और स्कू‍ल जाने/या न जाने वालों की जानकारी रखने हेतु ग्रामीण शिक्षा रजिस्टर / शहरी वार्ड शिक्षा रजिस्टर।
  • स्कूल से अलग बच्चों का स्कूल लौटने जैसी रणनीति पर ध्यान रखते हुए सभी पात्र बच्चों को दाखिला ड्राइव की सुविधा।
  • शिक्षा चौपाल का आयोजन।
  • कभी भी नामांकित न किये गये तथा शिक्षा छोड़ने वाले बच्चों की पहचान।
  • आकर्षित करने के लिए स्कूल की स्वूच्छता – हमारी शाला सुन्दर शाला।
  • मीडिया अभियान।
  • प्रवेशोत्सव ।
  • पाठ्य पुस्तकों को वितरण।
  • यूनिफॉर्म और साईकिल के लिए चेक का वितरण।
मध्यान्ह भोजन योजना
  • नामांकन मे वृद्धि कर, रिटेंशन और उपस्थिति के माध्यम से और साथ ही स्कूल में बच्चों के लिए पोषण को ध्यान में रखते हुए शिक्षा के विश्वव्यापिता को बढ़ावा देने हेतु इस योजना का उद्देश्य रखा गया।
लिंग निष्पक्षता पर प्रमुखता से फोकस

मौलिक स्तर पर लड़कियों की शिक्षा के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम (एनपीईजीईएल) ।

उद्देश्य
  • लड़कियों के लिए मौलिक शिक्षा पहुंच उपलब्ध कराने हेतु सुविधाओं को विकसित करना और बढ़ावा देना।
  • स्कूली शिक्षा प्रणाली में लड़कियों को रिटेंशन (रखवाली) की सुविधा प्रदान करना।
  • शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं और लड़कियों की अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित करना।
  • शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना।
  • लड़कियों के सशक्तिकरण हेतु उनकी शिक्षा की गुणवत्ता और संबंधित प्रासंगिकता पर जोर देना।

एनपीईजीईएल शैक्षणिक रूप से 280 पिछड़े विकासखण्डों में लागू किया गया ।

एनपीईजीईएल के अंतर्गत निम्नलिखित मुद्दों को संबोधित किया गया :

  • लैंगिक अंतर में कमी लाना।
  • हॉस्टल के माध्यम से लड़कियों की पहुंच बढ़ाना।
  • जीवन कौशल शिक्षा प्रदान करना।
  • स्कूल वर्दी के अतिरिक्त भी प्रोत्साहन देना।
  • स्कू‍लों को पुरूस्कार – एक स्कूल के प्रत्येुक समूह में पुरूस्का्र दिया गया, जो कि लड़कियों के शिक्षा रूचि के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। पुरूस्कार लड़कियों के उपलब्धि स्तर के आधार पर दिये गये।
  • मॉडल क्लस्टर स्कूल – उन समूहों में एक स्कूल लड़कियों के लिए मॉडल क्लस्टर स्कूल के रूप में विकसित करने हेतु चुना गया। यह वह स्कूल है, जहां सबसे अधिक संख्या में अनुसूचित जाति/जनजाति/ पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक वर्ग की लड़कियां दाखिल हैं। लड़कियों के लिए अनुकूल शिक्षण उपकरण, किताबें, खेल हैं। लड़कियों के लिए अनुकूल शिक्षण उपकरण, किताबें, गेम्स और खेल सामग्रियां इत्यादि इस स्कूल में लायी गयीं।
  • गर्ल्स होस्टल – उच्च प्राथमिक स्त़र पर एक खास रणनीति के रूप में लड़कियों के रिटेंशन (रखवाली) सुनिश्चित करने हेतु गर्ल्स होस्टल खोले गये। परिवार में निहित कारकों या बालिकाओं के सामाजिक सांस्कृतिक परिवेश के अतिरिक्त‍ स्कूलों की दूरी तथा संबंधित सुरक्षा भी मौलिक स्तर पर लड़कियों की कम जीईआर का कारण था। हालांकि, इन मुद्दों को संबोधित करने हेतु गर्ल्स होस्टल खोले गये। आज की स्थिति में एनईपीजीईएल के अंतर्गत 239 होस्टल जिसमें 16415 लड़कियां और सर्वशिक्षा अभियान के अंतर्गत 81 होस्टल जिसमें 5635 लड़कियां है। इन सबमें कुल 320 होस्टल क्रियान्वित है और इस नीति से लगभग 22050 लड़कियां लाभान्वित है।
कस्तू़रबा गांधी बालिका विद्यालय

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग की लड़कियों पर विशेष ध्यान ।

कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय एक आवासीय विद्यालय हैं, जो कि शिक्षा से वंचित लड़कियां, विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग समुदाय और अल्पसंख्यक समूहों को कवर करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। लड़कियों के स्कूल से दूर, छोटे और बिखरे हुए निवास स्थान की समस्या का यह एक समाधान है। वर्तमान में, 207 कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय राज्य् में चल रहे है। लगभग 26898 लड़कियां इन कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में दाखिल की गयी है।

नवीन तकनीकि का प्रयोग

कम्प्यूटर एडेड लर्निंग कार्यक्रम(CAL)

कम्प्यूटर सक्षम शिक्षा राज्य सरकार की एक प्रमुख प्राथमिकता है। राज्य ने वर्ष 2000 में विद्यार्थियों के लिए एक कम्प्यूटर सक्षम शिक्षा कार्यक्रम प्रारंभ किया, जिसे ‘’हेडस्टार्ट” नाम दिया गया। इस कार्यक्रम ने प्रारंभिक स्तर पर कम्प्यूटर का उपयोग शिक्षण उपकरण के रूप में किया। हेडस्टार्ट पर आधारित प्रारंभिक शिक्षा विद्यार्थी उपलब्धि में सुधार का संकेत दर्शाती है और साथ ही प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने वाली संख्या में वृद्धि करती है। राज्य शिक्षा केंद्र द्वारा कक्षा में शिक्षण अभ्यास क्रियाविधि को सहायता देने हेतु विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए इंटरेक्टिव मल्टी‍ मीडिया रीच लेसन (आईएमएमआरएल) और वीडियो फिल्म विकसित की गयी है। राज्य शिक्षा केंद्र द्वारा विकसित इंटरेक्टिव मल्टी मीडिया रीच लेसन का उपयोग भारत के कुछ अन्य हिंदी-भाषी राज्यों और कुछ गैर सरकारी संगठनों द्वारा किया जा रहा है।

नयी आईसीटी लैब की स्थापना

कुछ चुने गये उच्च प्राथमिक स्कूलों में नये कम्प्यूटर टर लैब रखे जायेंगे। इन प्रयोगशालाओं को पूरी तरह से कम्प्यूटर सक्षम शिक्षा प्रदान करने और साथियों के समूहों में सीखने के लिए सुसज्जित किया जाएगा।

एजूसेट कक्षायें

500 स्कू‍लों में आरओटी उपलब्ध कराने की प्रक्रिया चल रही है। आरजीपीईईई के तहत मौजूदा संचरण का उपयोग कर, एमएचआरडी प्रस्ताव के साथ स्कूलों के लिए 24X7 चैनल प्रारंभ करने हेतु, उपग्रह प्राप्त स्टेशनों को स्थापित करने हेतु स्कूल ही एक विकल्प‍ होगा। सीआईईटी-एनसीईआरटी और आरजीपीईईई से प्रसारित कार्यक्रमों को स्कूलों के लिए उपलब्ध कराया जाएगा। स्कूलों का चयन बेहतर बुनियादी रूपरेखा, शिक्षकों की उपलब्धता और उपयुक्त सुरक्षा व्य्वस्था के आधार पर किया जायेगा । अर्थात हेडस्टार्ट और नॉन हेडस्टाष्ट दोनों तरह के स्कू्ल होंगे।

कम्प्यूटर एडेड लर्निंग कार्यक्रम में शिक्षकों का प्रशिक्षण

सेवाकालीन प्रशिक्षण घटक का ही एक हिस्सा है। हेडस्टार्ट केंद्र में कार्यरत सभी शिक्षकों के लिए यह प्रशिक्षण आयोजित किया गया है। यह प्रशिक्षण सीएएल क्षेत्र में, ऑपरेटिंग सॉफ्टवेयर, सीएएल के शिक्षण विज्ञान और कम्प्यूटर केंद्र प्रबंधन में आयोजित है। ये प्रशिक्षण कोर्स जिला तथा विकासखण्ड‍ स्तर पर आयोजित किये गये हैं। 6000 से अधिक शिक्षक प्रशिक्षित किये गये हैं।

इंटरनेट

वर्ष 2009-10 के दौरान, इंटरनेट सुविधा 800 स्कूलों में प्रदान की गयी थी, जहां यूएसओएफ के तहत सुविधा उपलब्ध थी । वर्ष 2012-13 के दौरान, उन हेडस्टार्ट स्कूलों में जहां बीएसएनएल (बायर और बायरलैस) ब्राडबैंड सुविधा उपलब्ध है को इंटरनेट सुविधा उपलब्धल कराने का प्रयास किया जायेगा।

यह प्रणाली विभिन्न योजनाओं के प्रभाव को सुधारने हेतु लागू की गयी है |

(www.educationportal.mp.gov.in) के साथ निगरानी तथा आईसीटी सक्रिय पहल।

  • जिला और राज्य स्तर पर नियत अवधि में डाटा संग्रहण, समीक्षा और प्रबंधन ।
  • मीटिंग और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से नियमित आवधिक समीक्षा।
  • समवर्ती और इंटरनल ऑडिट ।
  • उपलब्ध संसाधनों के इष्टतम उपयोग और सुव्यवस्थीकरण हेतु स्कूल शिक्षा की जिला जानकारी (DISE) की गुणवत्ता में सुधार।
  • टेली समाधान।
  • ऑनलाईन निगरानी व्यवस्था – सभी निरीक्षण अधिकारी उनके द्वारा किए गए निरीक्षण की जानकारी दर्ज कर सकते हैं। निरीक्षक द्वारा रिपोर्ट की गयी कोई परेशानी, जैसे शिक्षक की अनुपस्थिति, कम हाजिरी, पाठ्य पुस्तवक संबंधी कठिनाई पर संबंधित अधिकारी द्वारा तत्कााल कार्यवाही हेतु सुविधा उपलब्ध है।
  • संबंधित अधिकारी द्वारा राज्य स्तर/जिला स्तर/ब्लॉक स्तर और स्कूल स्तेर के किसी भी मामलों/कठिनाईयों का विश्लेषण तथा निगरानी और उस पर तत्काल कार्यवाही की जायेगी।
  • स्कूल से बाहर के बच्चों के लिए ऑनलाईन चाइल्डवाईज ट्रेकिंग प्रणाली।
  • स्कूल से बाहर के बच्चों की रूपरेखा अनुसार पंजीकरण व्यवस्था ।
  • संबंधित अधिकारियों द्वारा उनके दाखिलें और उन्हे मुख्य धारा में लाने के लिए किए गए प्रयासों की सतत ट्रैकिंग।
  • बच्चों को शिक्षा की मुख्य धारा में लाने हेतु सामान्य व्याक्ति भी किसी स्कू ल के बाहर के बच्चे की रिपोर्ट दे सकता है।
  • 1.5 लाख से अधिक बच्चे पहले ही रजिस्टर्ड किये जा चुके है और आगे भी सक्रियता के साथ किये जा रहे हैं।
  • ओओएस के लिए कारणों का विश्लेषण।

पुरूस्कार

विभिन्न स्तरों पर शिक्षा के क्षेत्र में आईसीटी सक्षम जांच उपकरण का उपयोग अधिक सराहनीय है। पोर्टल http://www.educationportal.mp.gov.in/ के लिए निम्नलिखित पुरूस्कार प्राप्त किये गये है|

  • भारत सरकार, डीओपीटी, डीआईटी के द्वारा गोल्ड आइकन नेशनल ई-शासन पुरूस्कार।
  • मध्य प्रदेश राज्य शासन द्वारा वर्ष 2008-09 में जनसाधारण वर्ग के अंतर्गत ई-शासन पहल में उत्कृ्ष्ट ता के लिए सर्वश्रेष्ठ सूचना प्रौद्योगिकी परियोजना।
  • विभागीय वर्ग के तहत भारत में ई-शासन पहल की पहचान हेतु सीएसआई निहिलेंट ई-शासन पुरूस्का-र 2008-09।
  • कक्षा 1, 6, और 9 के चाईल्डवाईज डाटा प्राप्त किया जा रहा है। आने वाले वर्ष में चाईल्डवाईज डाटा प्राप्त कर लिया जायेगा और चाईल्ड् वाईज प्रणाली लागू कर दी जावेगी।
  • नवीन आईटी उपयोगिता द्वारा प्रभावी जन सेवा वितरण के लिए मंथन साउथ एशिया ई-शासन पुरूस्कार 2009।
  • पीसी क्वेस्ट द्वारा सर्वश्रेष्ठ ई-शासन परियोजना पुरूस्कार।

(अतुल कुमार श्रीवास्तव)

संविधान के अनुच्छेद – 45 में राज्य नीति निर्देशक तत्वों के अन्तर्गत यह व्यवस्था बनाई गई थी कि संविधान को अंगीकृत करके 10 वर्षों के अन्दर 6-14 वय वर्ग के सभी बालक / बालकाओं के लिये नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था की जायेगी किन्तु 57 वर्ष बीत जाने के बाद भी इस लक्ष्‍य को प्राप्‍त नही किया जा सका । यह ठीक है ‍कि 1986 में जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनी थी तब से लेकर अब तक विशेष रूप से प्राथमिक शिक्षा के सत्र में काफी सुधार हुआ है। वैसे हर पंचवर्षीय योजना में शिक्षा को विशेष महात्व दिया गया है।  केन्द्र एवं राज्यों ने दसवी पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत प्रारम्भिक शिक्षा के सर्व-सुलभीकरण और सभी के लिये शिक्षा के लक्ष्य की पूर्ति के लिये सर्व शिक्षा अभियान अपनाया गया है । यह अभियान क्रान्तिकारी है। इस अभियान के अन्तर्गत सभी बच्चें स्कलों तथा वैकल्पिक शिक्षा केन्द्रों मे होगें लक्ष्य यह भी है कि 6 – 14 वय वर्ग के सभी बच्चें पांच वर्ष की प्रारम्भ्कि शिक्षा पूरी कर ले साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जा रहा है कि 2010 तक ऐसी स्थिति आ जाये कि जो बच्चें स्कूल जाने लगे वे स्कूल जाना बन्द न कर दें।

 सर्व शिक्षा अभियान को सफल बनाने के लिये संविधान मे संशोधन की आवश्यकता थी, जिसके लिये भारतीय संविधान का 93वाँ संशोधन विधेयक संसद मे पारित कर दिया है और इसके साथ ही एक ऐसी क्रान्तिकारी व्यवस्था का सूत्रपात हुआ जिसके तहत 6-14 वय वर्ग के बालक /बालिकाओं को नि:शुल्क और अनिवार्य रूप से शिक्षा दिये जाने की व्यवस्था करना राज्य सरकारों का कर्तव्य होगा।

राज्य सरकार द्वारा 6-14 वय वर्ग के सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराने में उच्च प्राथमिकता प्रदान करते हुए कार्यक्रमों का निर्धारण कर अपनी प्रतिबद्धता  को प्रर्दर्शित किया गया है । जहॉ वर्ष 1950 -51 में 34833 प्राथमिक /उच्च् प्राथमिक विद्यालयों में 2875260 बच्चें अध्ययन कर रहे थे वही उनकी संख्या 2006 – 07 से 181487  विद्यालयों मे अध्ययनरत बच्चों की संख्या 35890437 तक पहुंच जाने का लक्ष्य है। इसी प्रकार वर्ष 1950 – 51 में 84804 अध्यापक शिक्षण कार्य कर रहे थे वही उनकी संख्या 2006 – 07 में 415990 हैं।

शिक्षा के सार्वभौमिकरण के लक्ष्य को सामाने रखते हुए राज्य सरकार द्वारा वर्ष  1996 में प्रत्येक 300 आबादी और 1.5 कि०मी० की दूरी पर प्राथमिक विद्यालय की सुविधा न उपलब्ध होने पर एक प्राथमिक विद्यालय उपलब्ध कराने एवं 3 कि0मी० की दूरी तथा 800 आबादी पर एक उच्च प्राथमिक विद्यालय की स्थापना का मानक निर्धारित करते हुए एक त्वरित सर्वेक्षण कराया गया था। जनपदों मे सर्वेक्षण के आधार पर प्राथमिक विद्यालयों की स्वीकृतियां राज्य सरकार द्वारा प्रदान की गई है। वर्तमान शासनादेश संख्या 20/79-5-2006-198/2005 दिनांक 2-2-2006 द्वारा नवीन प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना में 1.5 कि०मी० की दूरी के स्थान पर 1किमी० तथा नवीन उच्च प्राथमिक विद्यालय की स्थापना हेतु 3 किमी० के स्थान पर 2 किमी० दूरी निर्धारित की गई है ।

प्रदेश में 6 से 14 तक के बच्चों के  अनिवार्य रूप से नि:शुल्क शिक्षा प्रदान करने हेतु प्रारम्भिक शिक्षा के सार्वजनीकरण के कार्यक्रम को सर्वाधिक वरीयता प्रदान की गई है। इस हेतु शिक्षा के वार्षिक बजट का अधिकांश भाग इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम पर व्यय करने का उददेश्य है।

शिक्षा कार्य में चिन्हित कारणों से उत्पन्न ह्रास एवं अवरोध को समाप्त करने के लिये वर्तमान में पूर्ववर्ती कार्यक्रमों को और अधिक प्रभावोत्पादक एवं उपयोगी बनाने हेतु विद्यालयों की धारण क्षमता से अभिवृद्धि की जानी है।

अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जन जातियों तथा पिछडे वर्गो के बालक / बालिकाओं को विद्यालयों मे प्रवेश दिलाने मे विशेष बल दिया जाता है।

कक्षा 1 से 5 तक के सभी वर्ग के शिक्षाथियों को नि:शुल्क पाठ्य पुस्तक एवं कक्षा 6 से 8 तक सभी शिक्षार्थियों को नि:शुल्क पाठ्य पुस्तक वितरण की व्यवस्था है। इसके साथ ही साथ मध्यान्ह पोषाहार तथा छात्रवृत्तियों की अधिकाधिक व्यव्स्था की जाती है।

शिक्षा के परिवेश मे सुधार हेतु नये भवनों के निर्माण के साथ-साथ पुराने भवनों मे सुधार तथा अन्य आवश्यक उपकरणों /शैक्षिक उपकरणों की व्यवस्था की जाती है।

गत सर्वेक्षण के आधार पर ही वरीयता क्रम मे नये विद्यालय खोले जाते है।

वित्तीय वर्ष 2006 -07 के लिये अशासकीय उच्च प्राथमिक विद्यालयों के अनुरक्षण अनुदान

माध्यमिक शिक्षा के क्षेत्र में निजी प्रबन्ध तन्त्र द्वारा संचालित अशासकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय का योगदान है। कतिपय कारणों से जनता में दान आदि देने की प्रवृत्ति में कमी के कारण इन विद्यालय को अनुदान सूची पर लेकर विद्यालयों के कर्मचारियों को वेतन वितरण कराने की योजना संचालित है।

शासन द्वारा प्रदेश के अशासकीय असहायिक स्थायी मान्यता प्राप्त पू०मा०वि० को अनुदान सूची मे सम्मिलित करने हेतु निर्णय लिया गया और शासनादेश संख्या 2813/79-6-2006-28(31) /03 दिनांक 2-12-2006 द्वारा 800 बालक विद्यालय एवं 200 बालिका विद्यालयों को अनुदानित किया गया है। उक्त अनुदानित विद्यालयों में कार्यरत शिक्षक / शिक्षणेत्त्तर  कर्मचारियों को वित्तीय वर्ष 2006-07 में दिनांक 1 दिसम्बर 2006 से वेतन भुगतान हेतु शासनादेश संख्या 2150/79-6-2006-7(2)/06 टी0सी0-1 दिनांक 10-01-2007 द्वारा रू0 1500.00 लाख की धनराशि स्वीकृत की गई, जिसे सम्बन्धित जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी एवं वित्त्त एवं लेखाधिकारी, बेसिक शिक्षा को पत्रांक अर्थ (4)/बेसिक/1391-1691/06-07 दिनांक 23-1-2007 द्वारा इस निर्दश के साथ निर्गत कर दी गई है कि शासन द्वारा निर्धारित प्रतिबन्धों एवं निर्देशों का अनुपालन करते हुए जाचोपरान्त भुगतान की कार्यवाही सुनिश्चित कराई जाय। जनपद एवं मण्डल स्तर पर उक्त कार्यवाही गतिमान है।

बेसिक शिक्षा परिषद उत्तर प्रदेश द्वारा संचालित बेसिक परिषदीय विद्यालयों के अध्यापक/ अध्यापिकाओं को दक्षता पुरस्कार हेतु अनुदान की स्वीकृति

मैदानी  जनपदों के बेसिक शिक्षा परिषद उत्तर प्रदेश द्वारा संचालित बेसिक विद्यालयों के उन अध्यापक /अध्यापिकाओं को जो प्राइम्ररी स्कूलों की कक्षा के छात्र / छात्राओं तथा जूनियर हाईस्कूल की कक्षा 8 के छात्र/ छात्राओं को पढ़ाते /पढ़ाती है, से सम्बन्ध्रित नियमावली मे निर्धारित अर्हताओं /शर्तों के अधीन प्रत्येक अध्यापक का रूपये 500/ – (पांच सौ) मात्र की दर से दक्षता पुरस्कार दिये जाने का प्राविधान शासनादेश संख्या – 2625/15 (5)-540 /73 दिनांक 30 जून, 1975 के अनुसार निर्धारित अर्हताओं शर्तो अधीन किया जाता है।

इस योजनान्तर्गत शासन द्वारा प्रति वर्ष रू० 4.00 लाख की स्वीकृति प्राप्त होती है जिसे जनपदवार फॉट के अनुसार उत्त्तर प्रदेश के समस्त बेसिक शिक्षा अधिकारी की द्वारा आवंटित किया जाता है।

शिक्षा मित्र योजना

प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमिकरण के लक्ष्य को ध्यान मे रखते हुए प्राथमिक विद्यालयों मे निर्धारित मानकानुसार छात्र अनुपात को बनाये रखने एवं ग्रामीण युवा शक्ति को अपने ही ग्राम में शिक्षा जगत की सेवा का अवसर उपलब्ध कराने हेतु उन्हें उत्प्रेरित करने के लक्ष्य को दृष्टिगत रखते हुए शिक्षा मित्र योजना का कर्यान्वयन वर्ष 2000-2001 मे प्रारम्भ किया गया । उक्त योजना 2006-07 से नगर क्षेत्रों मे भी लागू की गई है।

बेसिक शिक्षा परियोजना (बी0ई0पी0)  एवं बेसिक शिक्षा निदेशालय के अन्तर्गत कुल स्वीक़त 19865 शिक्षा मित्रों के सापेक्ष 17661 शिक्षा मित्र शिक्षण कार्य कर रहे है। शिक्षा मित्रों का चयन ग्राम शिक्षा समिति/नगर वार्ड समिति द्वारा संस्त़ति /प्रस्ताव करने के उपरान्त जिला स्तरीय समिति द्वारा अनुमोदन किये जाने के पश्‍चात किया जाता है।

चयनित शिक्षा मित्रों को जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान द्वारा 30 दिवसीय प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है। प्रशिक्षणोपरान्त सम्बन्धित ग्राम शिक्षा समिति शिक्षा मित्र को ग्राम पंचायत के अधीन जिस विद्यालय हेतु चयनित किया गया है मे शिक्षण कार्य करने की अनुमति प्रदान करती है। चयनित शिक्षा मित्र का कार्यकाल चालू शिक्षा सत्र के माह मई के अन्तिम कार्य दिवस को स्वत: समाप्‍त हो जाती है तथा उसके कार्य, व्यहवार एवं आचरण से संतुष्ट होने पर जिला स्तरीय समिति को प्रस्ताव प्रेषित करती है जिसके अनुमति के पश्‍चात सम्बन्धित शिक्षा मित्र  की पुन: अगले शिक्षा सत्र में  15 दिवसीय प्रशिक्षण प्रदान करने के उपरान्त शिक्षण कार्य करने की अनुमति प्रदान की जाती है।

चयनित शिक्षा मित्र को प्रथम 30 दिवसीय प्रशिक्षण अवधि मे रू0 400/ एवं 15 दिवसीय प्रशिक्षण पुनर्बोधात्मक प्रशिक्षपण अवधि में रू0 750/ – तथा शिक्षण अवधि मे रू0 3000/- प्रतिमाह की दर से मानदेय का भुगतान किया जाता है। शिक्षण मित्रों के प्रशिक्षण एवं मानदेय के भुगतान हेतु रू० 4900.00  लाख का बजट प्राविधान किया गया है। जिसके सापेक्ष शासन द्वारा रू० 4900.00 लाख की स्वीकृति निर्गत की गई जिसके सापेक्षय मानदेय हेतु रूपया 3930-93 लाख की धनराशि व्यय की गई।

कार्यालय जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी भवन निर्माण

जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय भवन निर्माण हेतु जनपदों में आवश्यकतानुसार (जिला योजनान्तर्गत) जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय भवन निर्माण कराया जाता है। शासन द्वारा जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय भवन निर्माण हेतु रू0 24.65 लाख की निर्माण लागत निर्धारित की गई। इस धनराशि से छ: नवीन जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय निर्मित कराये जाने की कार्यवाही की जा चुकी है। तथा पूर्व वर्षें के छ: अधूरे कार्यालय भवनों के पूर्ण कराने की कार्यावाही की गयी है।

सघन क्षेत्रीय विकास योजना

भारत सरकार द्वारा शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े जनपदों के वे ब्लाक जहां की जनसंख्या 20 प्रतिशत या उससे अधिक अल्पसंख्यक बाहुल्य है जो सघन क्षेत्रीय विकास योजना के अन्तर्गत अच्छादित किया गया है। इस योजना के अन्तर्गत  वर्ष 1994-95 से 2002-03 तक 596 प्राथमिक तथा 950 कन्या उच्च प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना की गई हैा भारत सरकार द्वारा वर्ष 2001-02 में 250 कन्या उच्च प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना हेतु रू0 1170.00 लाख का वित्त्तीय लक्ष्य था जिसके सापेक्ष रू0 1070.89 लाख की धनराशि स्वीकृत की जा चुकी है (वर्ष् 2001-02 में रू0  400.0 लाख प्रथम किश्त, वर्ष 2002-03 मे स्‍0 400.00 लाख द्वितीय तथा वर्ष 2003-04 मे रू0 270.89 लाख की प्रथम किश्त, वर्ष 2002-03 में रू0 400.00 लाख द्वितीय तथा वर्ष 2003-04 में रू0 270.89 लाख की तृतीय किश्त स्वीकृत की जा चुकी है एवं विद्यालयों का निर्माण किया जा चुका है विद्यालय भवन की चहारदीवारी के निर्माण हेतु वर्ष 2006-07 मे रू0 110.00 लाख का बजट प्राविधान किया गया लेकिन भारत सरकार से कोई धनरशि प्राप्त न होने के कारण स्वीकृति निर्गत नही की जा सकी ।

नि:शुल्क पाठ्य पुस्तक की व्यवस्था

कक्षा 1 से 5 तक के परिषदीय विद्यालयों मे अध्ययनरत सामान्य वर्ग के बालकों मे वर्ष 2001-02 मे नि:शुल्क पाठ्य पुस्तको के वितरण हेतु रू0 550.75 लाख की धनराशि व्यय हुई थी जिसके प्रति 2061656 छात्र लाभन्वित हुए थे । वर्ष 2002-03 में रू0 597.55 लाख की धनराशि व्यय हुई थी जिसके प्रति 22.02,969 छात्र लाभन्वित हुए थे एवं वर्ष 2003-04 में रू0 1138.00 लाख की धनराशि स्वीक़त हुई थी जिसमें से रू0 993.49 की धनरशि व्यय हुई और 34.25,758 छात्र लाभन्वित हुए थे। वर्ष 2004-05‍ मे उक्त योजनान्तर्गत पुस्तक वितरण नही हुआ। वर्ष 2005-06 में शासनादेश संख्या 535/75-5-2005-60 (30)/96 दिनांक 14-2-05 द्वारा निर्णय लिया कि अब सामान्य वर्ग के बालकों मे पाठ्य पुस्तक वितरति किये जाने की स्थायी व्यव्स्था सुनिश्चित की जाय जिसके तहत रू० 2000.00 लाख  की धनरशि वर्ष 2005-06 के लिये स्वीकृत किया गया जिसमें से रू0 1882.87 लाख व्यय हुआ तथा 6528714 छात्र लाभान्वित हुए । सर्व शिक्षा अभियान के अन्तर्गत  कक्षा 1 से  8 तक अध्ययनरत समस्त बालिकाओं तथा अनुसूचति जाति, जनजाति के बालकों मे निशुल्क पाठ्य पुस्तकों के वितरण से कुल 1,54,08,985 छात्र लाभान्वित हुये । इस प्रकार वर्ष 20205-06 में  समान्य वर्ग के बालकों एवं समस्त वर्ग की  बा‍लिकाओं  तथा अनुसूचित जाति, जनजाति के बालकों में नि:शुल्क पाठ्य पुस्तकों के वितरण से कुल 219.37.699 छात्र लाभान्वित हुये।

वर्ष 2006 – 07 मे कक्षा 1 से 5 तक के सामान्य वर्ग के बालकों में निशुल्क पाठ्य पुस्तक वितरण हेतु रू0 22 करोड़ की धनराशि स्वीकृति  जिसमें से रू0 2192.79 लाख व्यय हुआ तथा 6724042 छात्र लाभा‍न्वित हुए । कक्षा 6 से 8 तक के सामान्य वर्ग के बालको के लिये रू0 2115  लाख की धनाशि स्वीकृत हई और सम्पूर्ण धनराशि व्यय हुआ जिसके प्रति 1197812 छात्र लाभान्वित हुए । सर्व शिक्षा अभियान के अन्तर्गत कक्षा 1 से 8 तक अध्ययनरत समस्त वर्ग की बालिकाएं एवं अनुसूचति जाति, जनजाति के बालकों मे नि:शुल्क पाठय पुस्तकों के वितरण से 1,59,14,678 छात्र लाभान्वित हुए। इस प्रकार वर्ष 2006-07 में कक्षा 1 से 8 तक के सामान्य वर्ग के बालकों एवं अनुसूचित जाति जनजाति के बालकों तथा सभी वर्ग की बालिकाओं में नि:शुल्क पाठ्य पुस्तकों के वितरण से कुल 2,38,36,532 छात्र लाभान्वित हुये।

स्काउटिंग रेडक्रास तथा जान्स एम्बुलेन्स

स्काउटिंग आन्दोलन के जनक राबर्ट स्टिफैंस स्मिथ बैडन पावेल थे। भारत स्काउटिंग 1913 में ऐनी बेसेन्ट द्वारा प्रारम्भ करायी गयी थी । स्काउटिंग से बच्चों से बड़ो तक के उच्च् कोटि की नैतिकता व योग्यता का विकास किया जाता है । अब भारत स्काउट व गाइड संस्था है बेसिक शिक्षा परिषद के नियंत्रणाधीन विद्यालयों के छात्रों को स्काउट /गाइड कार्यक्रमों मे प्रतिभाग कराने के लिये शिक्षा विभाग प्रत्येक जनपद में स्काउट प्रतियोगिताओं का संचालन कराते है शासन द्वारा रू0 3.75 लाख का अनुदान दिया जाता है जिसे जनपदों मे बांट कर उपलब्ध कराया जाता है जिन विद्यालयों मानक पूरे होते है उन्हें रू0 400/ अनुदान राशि दी जाती है। प्रतियोगिताओं के व्यय का वहन विद्यालयों से प्राप्‍त स्काउट शुल्क से किया जाता है जूनियर रेडक्रास प्रतियोगिता जो स्वास्थ्य से सम्बन्धित है, का अयोजन किया जाता है जिसके अध्यक्ष जिला विद्यालय  निरीक्षक होते है। इसके अतिरिक्त सेट जान्स एम्बुलेन्स प्रतियोगिता का भी आयोजन किया जाता है इसमें कैडेट डिवीजन तथा मैकन्जी कोर्स प्रतियोगिता आदि आयोजित की जाती है।

 विद्यालयी खेलकूद कार्यक्रम

शैक्षिक संस्थाओं मे शैक्षिक कार्यक्रमों के साथ-साथ शिक्षणेत्तर कार्यकलापों को भी विशेष महत्व दिया जाता है। खेलकूद से ही स्वस्थ्य शरीर में स्वस्थ्य मन का निर्माण होता है। विद्यालयी खेलकूद कार्यक्रम मे प्रतिस्पर्धा करने का बढावा मिलता है । इससे अपने ज्ञान व खेल के स्तर के उन्नयन के प्रति उत्कण्ठा पैदा होती है। इस हेतु बेसिक शिक्षा विभाग परिषदीय, विद्यालयों, सहायता प्राप्त विद्यालयों एवं मान्यता प्राप्‍त विद्यालयों के छात्रों के साथ अन्तर्विद्यालयीय प्रतियोगिताये ब्लाक व जनपद स्तर पर प्रतिवर्ष आयोजित की जाती है। इसमें सफल विजयी छात्र मण्डलीय एवं राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं मे प्रतिभाग करता है बेसिक शिक्षा विभाग र्वतमान में 16 खेलों में  प्रतियोगिताए अयो‍‍‍जित कराता है। जिनमें चयनित छात्र स्कूल गेम्स र्फडरेशन आफ इण्डिया द्वारा आयोजित राष्‍ट्रीय  प्रतियोगिताओं मे प्रतिभाग भाग करते हैं उपरोक्त प्रतियोगिताओं का आयोजन छात्रों से प्राप्त क्रीड़ा शुल्क से वहन किया जाता है। शासन द्वारा 5.00 लाख रूपये खेलकूद एव अन्य शैक्षिक कार्यकलापों हेतु अनुदान दिया जाता है जिसका जनपदवार कांट कर जनपदों को उपलब्ध कराया जाता है। इस धनाशि से खेल उपकरण एवं अन्य सहायक सामग्रियाँ क्रय की जाती है।     (अतुल कुमार श्रीवास्तव)

सवाल शिक्षा की गुणवत्ता का

यूनेस्को की एक ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में बच्चों को शिक्षा की उपलब्धता आसान हुई है. लेकिन गुणवत्ता का सवाल ज्यों का त्यों बना हुआ है और स्कूल जाने वाले बच्चे भी बुनियादी शिक्षा से वंचित हो रहे हैं.

इसके साथ-साथ भारत में वयस्क निरक्षरों की संख्या चौंकाने वाली है. संयुक्त राष्ट्र की संस्ता यूनेस्को की तरफ से जारी किए गए ग्लोबल मॉनिटरिंग रिपोर्ट (जीएमआई) के मुताबिक़ भारत में वयस्क निरक्षरों की संख्या 28 करोड़ 70 लाख है. जो दुनियाभर में कुल वयस्क निरक्षरों की संख्या का 37 प्रतिशत है.

साल 1991 में भारत में साक्षरता का प्रतिशत 48 प्रतिशत था, जो 2006 में बढ़कर 63 प्रतिशत हो गया. रिपोर्ट के अनुसार जनसंख्या में वृद्धि के कारण निरक्षरों की कुल संख्या में कोई परिवर्तन नहीं देखा गया .भारत ने पूर्व-प्राथमिक शिक्षा और प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में  महत्वपूर्ण प्रगति की है. भारत उन देशों में शामिल है जो 2015 तक पूर्व-प्राथमिक (नर्सरी) स्तर पर 70 प्रतिशत नामांकन का लक्ष्य हासिल कर लेंगे. इन देशों में ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया, कनाडा, डेनमार्क, नार्वे, स्वीडन, अमरीका और ब्रिटेन शामिल हैं. हालांकि रिपोर्ट में शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठाए गए हैं. भारत उन 21 देशों में शामिल हैं जहाँ बच्चों का शैक्षिक स्तर काफी कम है.

रिपोर्ट के अनुसार भारत शिक्षा क्षेत्र के ऊपर ध्यान दे रहा है, लेकिन शिक्षा क्षेत्र को मिलने वाले बजट में कमी आयी है. 1999 में कुल बजट का 13 फीसदी शिक्षा पर खर्च हो रहा था. लेकिन 2010 में यह घटकर मात्र 10 फीसदी रह गया है. यूनेस्को की ताजा रिपोर्ट वैश्वक शिक्षा के लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में होने वाले प्रयासों को सामने लाती है. वैश्विक निगरानी रिपोर्ट के मुताबिक़ शैक्षिक लक्ष्यों को 2015 तक हासिल नहीं किया जा सकता है.

यह रिपोर्ट कहती है कि समस्या केवल बच्चों को स्कूल भेजने की नहीं है. स्कूल जाने वाले बच्चे भी शिक्षा के घटिया स्तर के कारण पिछड़ रहे हैं. प्राथमिक स्कूल जाने वाले करीब एक तिहाई बच्चे, चाहे वे कभी स्कूल गए हों या नहीं बुनियादी शिक्षा नहीं प्राप्त कर रहे हैं. यूनेस्को की महानिदेशक इरिना बोकोवा रिपोर्ट में विभिन्न देशों की सरकारों से अपने प्रयासों को बढ़ाने की बात कहती हैं ताकि ताकि ग़रीबी, लिंग और भौगोलिक स्थिति जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद सभी को शिक्षा मुहैया करवाई जा सके.

उनके मुताबिक़, “शिक्षा की कोई व्यवस्था केवल तभी बेहतर हो सकती है, जब शिक्षक अच्छे हों. शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए शिक्षकों की क्षमताओं का विकास करना बहुत जरूरी है. अध्ययन के दौरान मिले साक्ष्यों से यह बात स्पष्ट हुई है कि शिक्षकों को सहयोग मिलने से शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होता है, उनको सहयोग न मिलने की स्थिति में शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट होती है और युवाओं में निरक्षरता अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाती है.”

रिपोर्टे के अनुसार 2015 तक सार्वजनिक प्राथमिक शिक्षा का लक्ष्य हासिल करने के लिए सरकारों को शिक्षकों के खाली पदों को भरने में तेजी लानी चाहिए. वैश्विक स्तर पर 16 लाख शिक्षकों की नियुक्ति करनी होगी. अच्छे शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने और बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दिलाने के लिए चार सूत्रीय कार्यक्रम पेश करती है.

1. अच्छे शिक्षकों का चयन बच्चों की विविधतता को ध्यान में रखते हुए किया जाय.
2. शिक्षकों को शुरुआती कक्षाओं से कमज़ोर बच्चों की मदद करने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए.
3. देश के ज़्यादा चुनौती वाले हिस्सों में सबसे अच्चे अध्यापकों की नियुक्ति की जानी चाहिए. ताकि असमानता को कम किया जा सके.
4. सरकार को शिक्षकों को पेशे में बने रहने लायक प्रोत्साहन देना चाहिए ताकि किसी भी परिस्थिति में यह सुनिश्चित किया जा सके कि सारे बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सके।

लेकिन यह जिम्मेदारी अकेले शिक्षकों पर नहीं डाली जा सकती है. रिपोर्ट शिक्षकों को काम करने के लिए अच्छे तरीके से निर्मित पाठ्यक्रम और मूल्यांकन पर ध्यान देने की बात कहती है. इसके साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र को होने वाली फंडिग में कमी का सवाल भी उठाया गया है. इस बजट को भारत जैसे देशों में कर बढ़ाकर पूरा किया जा सकता है. यूनेस्को की ताजा रिपोर्ट से भारत में प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र की चुनौतियां सामने आती हैं. नामांकन के लक्ष्य के करीब पहुंचने के बाद गुणवत्ता का सवाल सबसे अहम हो गया है. यह बात रिपोर्ट में सामने आती है. सरकार शिक्षकों के प्रशिक्षणों पर कागजों में तो काफी काम दिखा रही है, बजट भी खर्च हो रहा है, लेकिन शिक्षक प्रशिक्षणों से किसी लाभ की बात से इनकार करते हैं. शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों को औपचारिकता के रूप  में देखते हैं. इस मानसिकता में बदलाव के लिए भी प्रयास करने की जरूरत है।

गांव में हाईस्कूल नहीं, तो समाजसेवा,बालिकाओं के लिए अप्रैल में खोला जाएगा सिलाई केंद्र

 मुरैना. खुमानीपुरा गांव में कबड्‌डी खेलतीं बालिकाएं।

मुरैना. खुमानीपुरा गांव में कबड्‌डी खेलतीं बालिकाएं।

 खुमानीपुरा में रहने वाली मीनू के पिता सियाराम और मां रामवती की इच्छा थी कि उनकी बेटी पढ़-लिखकर काबिल बने, लेकिन गांव में मात्र एक अर्द्ध शासकीय प्राइमरी स्कूल होने के कारण उन्होंने बेटी को आठवीं तक तो तीन किलोमीटर दूर गांव छैरा में पढ़ाया। इसके बाद की पढ़ाई की समस्या फिर आई। ग
रीब माता-पिता सयानी होती बेटी को जौरा पढ़ने नहीं भेज पा रहे थे। इस बीच गांव में पहुंचीं तीन समाजसेवी संस्थाओं ने कुछ ऐसा किया कि अब न केवल मीनू, बल्कि गरीब खेतिहर मजदूर किसानों की बेटियां गांव में खुद ही पढ़ने लगीं। इन्हें पढ़ाने के लिए तीन शिक्षकों की व्यवस्था भी गांव में ही हो गई। अब गांव की 240 बेटियां अपने ही गांव में प्राइमरी से हाईस्कूल तक की शिक्षा ग्रहण कर रही हैं। इस गांव में 350 के करीब बालिकाएं हैं, जिनमें से कुछ स्कूल जाती हैं, बाकी गांव में ही पढ़ती हैं।

गांव से ही तैयार किए शिक्षक :बालिकाओं को पढ़ाने के लिए देशराज, गजराज व रामवीर को जिम्मेदारी सौंपी गई। तीनों शिक्षकों ने जिम्मा लिया कि वे इन बालिकाओं को पढ़ाएंगे। अच्छी बात यह है कि जिन बालिकाओं के माता-पिता फीस देने लायक हैं, उनसे तो न्यूनतम पारिश्रमिक लिया जाता है, जबकि जो सक्षम नहीं हैं, उन्हें मुफ्त शिक्षा दी जा रही है।

जागरूकता रैली निकाली : 14 नवंबर को खुमानीपुरा की बालिकाओं ने गांव में एक जागरूकता रैली निकाली। जिसमें शिक्षा अनिवार्य रूप से ग्रहण करने का संदेश दिया गया।

पहल 15 दिन में अवश्य पहुंचती है गांव में : खुमानीपुरा में पहल संस्था एक महीने में दो बार अनिवार्य रूप से पहुंचती है। इसकी सदस्य आशा सिंह एडवोकेट अपने साथ डीएसपी मुख्यालय अंजुलता पटले को भी एक बार गांव में ले गईं। बालिकाएं इनसे मिलकर खुश हुईं। प्रियंका नामक बालिका ने तो ठान लिया है कि उसे डीएसपी ही बनना है। वह 10वीं के बाद इंटर पास करेगी और बीए करके पीएससी की तैयारी करेगी।

ये बालिकाएं पढ़ रहीं गांव में :खुमानीपुरा में मीनू, प्रीती, कविता, भारती, प्रियंका, सरिता, भावना, आशा, सोनम, सरस्वती, काजल, अंजली, अंकिता, प्रतिभा, सुहानी, राधा, करीना, महेश्वरी, नीरज, पूनम, सुरक्षा, पूजा, राखी, मोनिका, चंचल, लक्ष्मी आदि करीब ढाई सौ बालिकाएं पढ़ रही हैं। इनमें से कुछ जौरा के स्कूल भी जा रही हैं।

ये होने वाला है : बालिकाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए गांव में अप्रैल में सिलाई केंद्र खोला जाएगा।

बालिकाओं के स्वास्थ्य परीक्षण के लिए अप्रैल के अंत में एक शिविर लगाया जाएगा।

गांव में लाइब्रेरी खोली गई है : बालिकाओं के लिए एक लाइब्रेरी खोली गई, जिसमें 200 पुस्तिकाएं रखवाई गईं।

बालिकाओं के लिए ब्लैक बोर्ड आदि के इंतजाम भी पहल संस्था ने किए हैं।

उत्साहित बालिकाएं भी अपनी पॉकेट मनी बचाकर कुछ किताबें लाइब्रेरी के लिए लाई हैं।

बालिकाओं के लिए खेल सामग्री भी उपलब्ध कराई गई, साथ ही बिना सामग्री वाले खेल कबड्डी व खो-खो शुरू कराए।

बालिकाएं जौरा से कैरम खरीद लाईं। उन्होंने अपने लिए एक स्पोर्ट्स क्लब भी गांव में गठित किया है।

गांव की बेटियों को शिक्षा व खेलों के प्रति संस्थाओं ने किया जागरूक : जौरा के खुमानीपुरा में छह महीने पहले आंगन नामक संस्था ने कदम रखा। साथ ही यह संस्था अपने साथ संगिनी व पहल को भी लेकर गई। इन तीन संस्थाओं ने इस गांव में बेटियों के बीच शिक्षा व खेलों संबंधी जागरूकता फैलाई और वहां इनकी पढ़ाई के प्रबंध किए। फिर समाजसेवी संस्था पहल ने इस गांव को गोद लेकर काम शुरू किया।

प्राइवेट परीक्षा देंगे : ”आठवीं तक तो हम छैरा में ही पढ़े। अब 10वीं की तैयारी अपने गांव से ही कर रहे हैं। प्राइवेट परीक्षा देंगे।”मीनू, कक्षा 10 खुमानीपुरा

गांव में ही कर रहे पढ़ाई : ”आठवीं तक छैरा गांव में पढ़ाई की। उसके बाद तो जौरा में ही हाईस्कूल है। इसलिए अब हम अपने गांव में ही पढ़ते हैं। ”प्रीती, कक्षा 10 खुमानीपुरा

शिक्षा पर ताला

“विभिन्न राज्यों में धड़ल्ले से बंद किए जा रहे सरकारी स्कूल दरअसल मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा पाने के बच्चों के मौलिक अधिकार पर प्रहार है। बंद स्कूलों की कुल संख्या एक लाख से भी अधिक होने की आशंका ”
देश भर में  लगभग एक लाख सरकारी स्कूल या तो बंद किए जा चुके हैं या बंद होने की प्रक्रिया में हैं। धड़ल्ले से विभिन्न राज्यों में इन स्कूलों पर ताला लग रहा है और इसे नाम दिया जा रहा युक्तिकरण या समान्यीकरण। आम भाषा में कहें तो इसका अर्थ है दो या तीन स्कूलों का एक में विलय। इन स्कूलों को बंद करने के पीछे तर्क देश भर में एक जैसा है ;  बच्चों की कम संख्या, अध्यापकों की कमी और बुनियादी सुविधाओं का अभाव। इन स्कूलों को बंद  सीधे-सीधे वर्ष 2009 में पारित शिक्षा के अधिकार कानून की मूल भावना का उल्लंघन है, जो हर बच्चे को शिक्षा पाने को मौलिक अधिकार देता है और जिसका नारा  है, घर के दरवाजे पर स्कूल। लाखों बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो रहा है और देश की शिक्षा मंत्री स्मृति जुबिन ईरानी कहती हैं कि उन्हें को पता ही नहीं कि ऐसा कुछ घटित भी हो रहा है। इस बात का अंदेशा है कि यह सब विश्व बैंक के इशारे पर किया जा रहा है। इसकी कलई जिस तरह से मुंबई नगर निगम का अपने स्कूलों को निजी सरकारी साझेदारी (पीपीपी) में डालने के लिए  नीति पत्र खोलता है जिसमें तैयार किया, उसमें विश्व बैंक के निर्देशों और अध्ययनों का जिक्र किया है। (देखें बॉक्स)
देश भर में अगर एक लाख सरकारी स्कूल बंद होते हैं तो इसकी गाज किन समुदायों या समूहों पर पड़ रही होगी, इसका देशव्यापी आंकड़ा जुटाने में तो तो संभवत: समय लगेगा लेकिन राजस्थान में भारत ज्ञान विज्ञान समिति की रिपोर्ट में यह मूल्यांकन किया गया है, उससे साफ है कि इसकी मार वंचितों, दलितों, अल्पसंख्यकों और आदिवासियों के बच्चों पर सबसे ज्यादा पड़ रही है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात में भी छोटे स्तर पर इस तरह के अध्ययन इस बात की तस्दीक करते हैं। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 8 करोड़ बच्चे प्राथमकि शिक्षा पूरी होने से पहले स्कूल छोड़ देते हैं। और सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश के 80 फीसदी बच्चे सरकारी स्कूलों में ही शिक्षा हासिल करते हैं। देश के  बच्चों की अधिसंख्य आबादी जहां जाकर शिक्षा और मध्याह्न भोजन हासिल कर रही है, उन पर ताला लगाया जा रहा। इसके साथ ही यह भी ध्यान देने की बात है कि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में 12 लाख के करीब बाल श्रमिक हैं। बाल श्रमिक स्कूलों से बाहर हंै। बजाय इन लाखों बच्चों को स्कूल के भीतर लाने की रणनीति बनाने के, मौजूदा विकल्प को पूरी तरह से बंद किया जा रहा है।
ये तमाम बातें  संकेत दे रही है कि स्कूली शिक्षा में बड़े पैमाने पर नीतिगत परिवर्तन करने की तैयारी है। जनवरी 2015 से शिक्षा के अधिकार और सर्व शिक्षा अधिकार की समीक्षा होनी है। इससे पहले विभिन्न राज्यों में हजारों-लाखों सरकारी स्कूलों का बंद करना कई तरह की आशंकाओं को जन्म देता है। यह अंदेशा जताया जा रहा है कि सरकारी स्कूलों को रद्दी बताकर उन्हें बंद करके शिक्षा पर सरकारी खर्च को और कम करने तथा तमाम बच्चों को निजी स्कूलों के भरोसे छोडऩे की जमीन तैयार की जा रही है। शिक्षा के अधिकार के लिए अखिल भारतीय फोरम से जुड़े वरिष्ठ शिक्षाविद अनिल सदगोपाल का कहना सही प्रतीत होता है कि यह सरकारी स्कूलों के खिलाफ साजिश है। समान स्कूल व्यवस्था लागू करने के बजाय निजी स्कूलों को अंध बढ़ावा दिया जा रहा है और इसी के तहत सरकारी स्कूलों को मारा जा रहा है। इस वजह से शिक्षकों का स्तर खराब किया गया, बुनियादी सुविधाएं नहीं दी गईं और जब बच्चों ने आना बंद कर दिया तो सरकारी स्कूलों को बंद किया जा रहा है। ताकि आज के दिन तक सरकारी स्कूलों में पढऩे जा रहे गरीब बच्चों और खासकर बच्चियों को, उन्हें निजी स्कूलों की तरफ ढकेला जा सके।
वाकई जमीन पर यही दिखाई दे रहा है कि जहां-जहां सरकारी स्कूलों पर ताला लगा कर उन स्कूलों का विलय दूसरे सरकारी स्कूलों में किया गया है वहां बड़ी संख्या में बच्चों की पढ़ाई बीच में ही छूट गई है।
हैरानी की बात यह है कि देश भर में स्कूलों की बंदी और विलय हो रहा है या उन्हें निजी-सरकारी साझेदारी में दिया जा रहा है और इसके खिलाफ सशक्त आवाज नहीं उठ रही है। अगर उपलब्ध आंकड़ों की बात करें तो राजस्थान में 17 हजार 129 स्कूल, महाराष्ट्र में 13 हजार 905, कर्नाटक में 6,000, गुजरात में 13,450 आंध्र प्रदेश में 5503, तेलंगाना में 4,000, उड़ीसा में 5,000, मध्य प्रदेश में 3,500 , उत्तराखंड में 1200 स्कूलों के बंद किए गए जाने की सूचना है। आउटलुक द्वारा शिक्षा के अधिकार फोरम, भारत ज्ञान विज्ञान समिति और शिक्षा के अधिकार के लिए अखिल भारतीय फोरम सहित अन्य संगठनों से जुटाए गए आंकड़ों से पता चलता है कि देश भर में छोड़े-बड़े पैमाने पर सरकारी स्कूलों की बंदी जारी है और कुल मिलाकर यह आंकड़ा एक लाख के करीब बैठता है। आउटलुक ने अपनी पड़ताल में पाया कि अगर स्थानीय स्तर पर आंकड़े जुटाएं जाएं तो यह आंकड़ा एक लाख से बहुत अधिक हो सकता है।
यहां एक बात ध्यान देने योग्य है कि सरकारी स्कूलों की बंदी की रफ्तार पिछड़े राज्यों में कम है। मिसाल के तौर पर बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल आदि में सरकारी स्कूलों को बंद करने की रफ्तार कम है। इसकी बड़ी वजह यह है कि इन राज्यों में निजी स्कूलों का विकल्प नहीं है। यहां निजी स्कूल गांव-देहात-दूर-दराज के  बीहड़ इलाकों तक नहीं पहुंचे हैं। शिक्षा के अधिकार फोरम के मुताबिक महाराष्ट्र में 45 फीसदी बच्चे, उत्तर प्रदेश में 40 फीसदी बच्चे और केरल सहित बाकी दक्षिण भारत के राज्यों में 55 फीसदी बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं। इस बारे में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति जुबिन ईरानी ने वही बात दोहराई जो उन्होंने संसद में 6 अगस्त को एक सवाल के जवाब में दी थी, किसी भी राज्य सरकार ने यह रिपोर्ट नहीं दी है कि उनके राज्य में बच्चों या अध्यापकों की कमी की वजह से सरकारी स्कूल बंद किए गए हैं।
वरिष्ठ शिक्षाविद कृष्ण कुमार का कहना है कि जब भी सरकारी स्कूलों पर संकट छाएगा, उससे लड़कियों की साक्षरता सबसे ज्यादा प्रभावित होती। अगर स्कूल घर से दूर हुआ या सुरक्षित परिधि में नहीं हुआ तो सबसे पहले लोग लड़कियों को घर बैठाते हैं। दलित बच्चों की शिक्षा पर काम कर रही सेंटर फॉर सोशल एक्विटी एंड इनक्लूजन संस्था की निदेशक एनी नमाला का विश्लेषण है कि स्कूलों की बंदी या विलय से दलित बच्चों की शिक्षा पर बहुत बुरा असर पड़ा है। दलित बस्तियों में सरकारी स्कूलों को बड़े पैमाने पर बंद कर मुख्य गांव के सरकारी स्कूलों में उनका विलय कर दिया जा रहा है। यहां दबंग जातियों के बच्चों का बाहुल्य होता है और दलित बच्चों के लिए बराबरी का माहौल नहीं होता। इस वजह से ये बच्चे घर बैठ जाते हैं।
ये तमाम आशंकाएं हूबहू जमीन पर घटित होती दिख रही हैं। राजस्थान में भारत ज्ञान विज्ञान समिति (बीजीवीएस) ने राज्य में 17 हजार स्कूलों की बंदी और विलय के बाद पांच जिलों (जयपुर शहर, अलवर, पाली, बारां और बूंदी) में एक अध्ययन कराया। इस अध्ययन की रिपोर्ट बताती है कि एक स्कूल के बंद होने से कितने बच्चों की जिंदगी में अशिक्षा का अंधियारा छा जाता है। इस रिपोर्ट से जो बातें सामने आईं वे देश भर में लागू होती है।
स्कूलों को बंद कर दूसरे स्कूलों में उनके विलय का राजनीतिक नीतिगत फैसला होने के पीछे वह नौकरशाही भी है जो केवल बंद कमरों की नजर से स्कूलों से जुड़े आंकड़े देखती है। एक नजर में ही इसके पीछे यह गरीबों व वंचित तबकों के बच्चों को शिक्षा से बाहर करने की मानसिकता झलकती है। राजस्थान में 80 हजार सरकारी स्कूल हैं जिनमें से 17 हजार को इस साल अगस्त में अन्य स्कूलों के साथ मिला दिया गया। नतीजतन 22 फीसदी सरकारी स्कूल बंद हो गए। इसका असर दस लाख बच्चों व लाखों शिक्षकों पर पड़ा है। कुछ शहरों में तो जिन स्कूलों को दूसरे स्कूलों में मिला दिया गया है उनके एक-तिहाई बच्चों ने स्कूल जाना बंद कर दिया है। यह स्कूल जाने वाले कुल बच्चों का दस फीसदी है। बीजीवीएस की कोमल श्रीवास्तव ने बताया की बाद में राजस्थान सरकार ने कई स्कूलों को वापस खोल दिया लेकिन अधिकांश अब भी बंद हैं।
केवल आंकड़ों के आधार पर किए गए स्कूलों के विलय ने ऐसी स्थितियां पैदा कर दीं जिनके चलते कई बच्चों को स्कूल छोडऩा पड़ा। इसके कई कारण रहे हैं- जिस स्कूल में विलय किया गया है उसकी दूरी, स्कूल के समय में बदलाव जातिगत, धार्मिक तथा लैंगिक कारण।
इस अध्ययन से सामने आया कि कई स्कूल ऐसे थे जो दलित इलाकों में चल रहे थे और उन्हें ऐसे स्कूलों से मिला दिया गया जो दबंग जातियों के प्रभुत्व वाले इलाकों में थे। नए स्कूलों में जाकर जब दलित बच्चों को दबंग जातियों के हाथों भेदभाव का शिकार होना पड़ा तो वे पढ़ाई छोडऩे को मजबूर हो गए।
कुछ मामलों में लड़कियों के स्कूलों का विलय लडक़ों के स्कूलों के साथ कर दिया गया। लड़कियों के लिए अलग स्कूल खोलने का एकमात्र मकसद बालिका शिक्षा को बढ़ावा देना था क्योंकि कई परिवार सामाजिक-सांस्कृतिक कारणों से लडक़ों के स्कूलों में अपनी बच्चियों को भेजने पर राजी नहीं होते थे। विलय ने इन लड़कियों को शिक्षा से वंचित कर दिया। उदाहरण के तौर पर जयपुर में धानक्या बस्ती, जोटवाड़ा के लड़कियों के प्राथमिक स्कूल का विलय रैगर बस्ती के सह-शिक्षा स्कूल के साथ कर दिया गया जहां मुख्य रूप से लडक़े पढ़ते हैं। धानक्या बस्ती स्कूल में 165 हिंदू और मुस्लिम लड़कियां साथ पढ़ती थीं। लेकिन अब लड़कियों के माता-पिता बेहद नाराज हैं क्योंकि उन्होंने अपने  समुदायों को बड़ी मुश्किलों से लड़कियों की शिक्षा के लिए तैयार करवाया था। अब ज्यादातर लड़कियां स्कूल छोड़ चुकी हैं। सांप्रदायिक सदभाव का उदाहरण रहा यह स्कूल अधिकारियों के अतार्किक फैसले का शिकार हो गया।
गुजरात में शिक्षा के अधिकार के लिए काम कर रहे डॉ. विक्रम सिंह अमरावत ने बताया कि गुजरात सरकार ने बाकायदा सरकारी आदेश जारी करके कहा कि जिन स्कूलों में छात्रों की उपस्थिति कम है, उन स्कूलों का विलय अन्य स्कूलों में कर देना चाहिए। उन्होंने बताया कि गुजरात में तकरीबन 13,450 स्कूलों को बंद करने की तैयारी हो चुकी है। उन्होंने बताया कि अकेले गांधीनगर में पांच सरकारी स्कूलों का विलय हो चुका है और इसने गरीब बच्चों पर प्रतिकूल असर डाला है।
इस तरह के निर्देश तमाम राज्यों ने जारी किए हैं। मध्यप्रदेश में पिछले साल 5 जुलाई को राज्य शिक्षा केंद्र ने युक्तियुक्तकरण (रैशनललाइजेशन) यानि विलय को लेकर एक निर्देश जारी किया था। विरोध होने पर उस समय तो थम गया था लेकिन अब फिर शुरू हो गया है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के गृह जिले सिहोर में नौ सरकारी स्कूल बंद कर दिए गए और 37 स्कूलों का विलय दूसरे स्कूलों में कर दिया गया। खबर है कि पूरे राज्य में 3,500 स्कूलों को बंद कर दिया गया है। इसी क्रम में ग्वालियर के जिलाधिकारी ने विलय के लिए समिति गठित कर उसकी अनुशंसा पर अपने आदेश से जिले के 146 प्राथमिक स्कूलों एवं 8 मध्य स्कूलों का दूसरे स्कूलों के साथ विलय कर दिया है। इनमें से अधिकांश स्कूल शहरी बस्तियों एवं ग्रामीण इलाकों की हैं। कई कन्या प्राथमिक शालाओं को बालक प्राथमिक शालाओं में मिला दिया गया है। जन अधिकार मंच के राज्य समन्वयक संदेश बंसल कहते हैं, ‘ सरकार विलय के बहाने सरकारी स्कूलोंं को खत्म कर निजी शिक्षा व्यवस्था को बढ़ावा दे रही है।Ó राजधानी भोपाल में सरकारी स्कूलों के परिसर निजी स्कूलों को दिए गए हंै। मध्यप्रदेश शिक्षक संदर्भ समूह के समन्वयक शिक्षक दामोदर जैन कहते हैं, ‘यह शिक्षा पर ताला है, सिर्फ स्कूलों पर नहीं।
एक तरफ सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं वहीं दूसरी तरफ सरकारी स्कूलों को निजी हाथों में सौंपा जा रहा है। ऐसा देश भर में हो रहा है, लेकिन बहुत खामोशी से। ये खबरें वहीं से आ पा रही हैं जहां सामाजिक संगठन सक्रिय हैं। कितने बड़े पैमाने पर यह हो रहा है, इसे मुंबई नगर निगम और चेन्नै नगर निगम द्वारा अपने स्कूलों को निजी-सरकारी साझेदारी चलाने के फैसले से देखा जा सकता है। इन दोनों महानगरों में निगमों के स्कूलों को निजी हाथों में सौंप दिया गया है। चेन्नै में अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच से जुड़े प्रिंस गजेंद्र बाबू ने आउटलुक को बताया कि यह एक पूरी रणनीति के तहत किया जा रहा है। इन स्कूलों का स्तर बढ़ाने के नाम पर यह संपत्ति निजी हाथों को सौंपी जा रही है। ठीक यही मुंबई नगर निगम ने किया है। (देखें बॉक्स) इसके लिए बकाया के नीति पत्र जारी किया गया जिसमें विश्व बैंक के निर्देशों और अध्ययन का जिक्र किया गया है।
अशिक्षा और गरीबी की मार झेल रहे देश में सरकारी स्कूलों पर ताला शिक्षा पर ताला है। यह उस कानून का सरासर उल्लंघन है जो देश के तमाम बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा पाने का अधिकार देता है। यह अधिकार निजी स्कूलों में नहीं संभव है। बच्चों को शिक्षा का मौलिक अधिकार देने के लिए अच्छे सरकारी स्कूल जरूरी है। जो सरकार बेहतरीन केंद्रीय विद्यालय और नवोदय विद्यालय चला रही है वही इन सरकारी स्कूलों को चलाने के लिए क्यों नहीं तैयार है, यह एक बड़ा सवाल है। शिक्षा के अधिकार पर काम कर रहे संदीप पांडे का कहना है कि जिस तरह से सरकारी अधिकारियों के लिए एयर इंडिया से सफर करना अनिवार्य है, उसी तरह से अगर यह भी नियम बना दिया जाए कि उनके बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढऩा है, तो देखिए सारे स्कूल बेहतरीन स्कूलों में तब्दील हो जाएंगे। सरकारी स्कूलों को बचाने और उन्हें स्तरीय बनाने के लिए जो राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए वह सिरे से गायब है। शिक्षा के अधिकार फोरम के अंबरीश राय का यह कहना सही प्रतीत होता है कि इन एक लाख स्कूलों को बंद करके सरकार ने शिक्षा के अधिकार के लिए खतरे की घंटी बजा दी है।

खतरे की घंटी
शिक्षा का अधिकार फोरम एक राष्ट्रव्यापी मंच है, जिसमें विभिन्न संगठनों की शिरकत है, जो इस कानून के सही ढंग से लागू करने के लिए तैयार किया गया है। इस फोरम के राष्ट्रीय संयोजक अंबरीश राय से आउटलुक की ब्यूरो प्रमुख भाषा सिंह की हुई बातचीत के अंश
राष्ट्रीय स्तर पर स्कूलों की बंदी और विलय क्या शिक्षा के अधिकार के लिए खतरे की घंटी है
शिक्षा का अधिकार बहुत संघर्षों के बाद मिला है और इसे मारने की तैयारी बहुत समय से चल रही है। अगर सरकारी स्कूल ही नहीं रहेंगे तो वंचित समुदाय के बच्चों के लिए शिक्षा का विकल्प ही खत्म हो जाएगा। यह शिक्षा के अधिकार के लिए खतरे की घंटी है।
बंदी के पीछे क्या वजह है
निजी क्षेत्र के लिए जगह बनानी। यह बड़े पैमाने पर हो रहा है। चाहे वह सरकारी स्कूलों को निजी सरकारी साझेदारी में देने का फैसला हो या फिर बंद करने का, सब से सरकार शिक्षा मुहैया कराने की जिम्मेदारी से पिंड छुड़ाना चाहती है। उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा का 75 फीसदी हिस्से पर निजी क्षेत्र का कब्जा हो ही चुका है, अब प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा को भी उन्हें खोल देने की तैयारी हो गई है।
शिक्षा मौलिक अधिकार बनने के बाद भी ये अड़ंगे क्यों
शिक्षा के अधिकार को अधिकार नहीं एक योजना के तौर पर देखा जा रहा है। इसे लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं है। इस अधिकार के लिए मानव संसाधन मंत्रालय ने 53 हजार करोड़ रुपये मांगे थे, मिले 25 हजार करोड़ और नई सरकार ने भी सिर्फ 28 हजार करोड़ रुपये दिए। इससे प्राथमिकता साफ हो जाती है।

सरकार इस अधिकार और सर्वशिक्षा अभियान की समीक्षा करने जा रही है,  इसका क्या निहितार्थ है
अगर सरकार इस अधिकार के उदेश्यों की समीक्षा करती और इसे हल्का करना चाहती है, तो दिक्कत है। बाकी कानून के क्रियान्वयन में होने वाली दिक्कतों की समीक्षा हो और उसे सुधारा जाए तो अच्छा है।

सरकारी स्कूलों को मारने की साजिश
शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ समान शिक्षा के अधिकार को लेकर लंबे समय से सक्रिय शिक्षाविद् अनिल सदगोपाल अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच से जुड़े हुए हैं। उनसे भाषा सिंह की हुई बातचीत के अंश
स्कूलों को इस तर्क पर बंद किया जा रहा है कि यहां बच्चे नहीं आ रहे है
यहीं सबसे दिलचस्प पहलू है। पहले मारने की सारी तैयारी कर लीजिए और फिर कहिए कि अरे यह तो मर रहा है। सरकारी स्कूलों को पूरी सोची-समझी रणनीति के तहत बर्बाद किया गया, शिक्षा का स्तर गिराया गया, शिक्षकों की अभूतपूर्व कमी की गई और अब कहा जा रहा है कि ये स्कूल खराब हैं इन्हें बंद किया जाना चाहिए। जो लोग अज यह तर्क दे रहे है कि सरकारी स्कूल आर्थिक रूप से चलाना घाटे का सौदा है, दरअसल वे शिक्षा के निजीकरण के पक्षधर हैं।
हल क्या है
नीति में परिवर्तन करना। चाहे वह सर्व शिक्षा अधिकार हो या शिक्षा का मौजूदा कानून-दोनों इसी चक्रव्यूह में फंसने थे। इन्हें यहीं पहुंचना था। मेरा स्पष्ट मानना है कि शिक्षा के अधिकार का मकसद ही यही था कि सरकारी स्कूलों कचरणबद्ध ढंग से खत्म किया जाए। अच्छी-सस्ती शिक्षा और दø अध्यापकों की जिम्मेदारी राज्य की होनी चाहिए तभी हम इस ढांचे को बचा सकते हैं। आपने शिक्षा को देने का काम दो हजार से पांच हजार रुपये पर ठेके पर रखे अध्यापकों के हवाले कर दिया, फिर शिक्षा के स्तर में उन्नति बेमानी बात है।
कब से यह प्रक्रिया शुरू हुई
पिछले एक दशक से यह सिलसिला चल रहा है। लेकिन पिछले एक दो सालों में इसने विकराल रूप ले लिया है। सरकारी स्कूलों-निगम स्कूलों की जमीन को निजी हाथों में देने की तैयारी है। मध्यप्रदेश में स्कूलों को बंद करके शॉपिंग मॉल बनाए गए हैं। कर्नाटक सरकार ने 2013 में अलग से एक समिति बनाई थी ऐसे स्कूलों की शिनाख्त करने के लिए।

गरीब-दलित-अल्पसंख्यक बच्चों पर मार
भारत ज्ञान विज्ञान समिति की राजस्थान शाखा की अध्यक्ष कोमल श्रीवास्तव ने राजस्थान में स्कूलों की बंदी और विलय पर एक ऐतिहासिक रिपोर्ट प्रकाशित करके इस मुद्दे पर सघन चर्चा शुरू करवाई। पेश है आउटलुक की ब्यूरो प्रमुख भाषा से हुई बातचीत के अंश
आपकी रिपोर्ट के बाद राजस्थान सरकार ने कई स्कूल फिर खोले
जी, सही कहा आपने। लेकिन अभी भी हजारों स्कूल बंद है। लाखों बच्चों का भविष्य प्रभावित हो रहा है। यह दुखद है।
इन बच्चों में किस समुदाय या समूह के बच्चे ज्यादा है
निश्चित तौर पर गरीब और वंचित समुदाय के। हमने पाया कि अगर दलित बस्ती का स्कूल बंद कर दिया गया तो वहां के बच्चे सवर्ण जाति के इलाके के स्कूलों में नहीं जा रहे। मुस्लिम बस्ती के बच्चे भी दूसरे स्कूलों में जाने से डरते हैं। लकडिय़ों की शिक्षा पर तो बेहद बुरी मार पड़ी है। लड़कियों के स्कूलों को लडक़ों के स्कूलों के साथ मिला दिया गया है या बहुत दूर कर दिया गया है। उनके घर वालों ने इन बच्चियों की पढ़ाई बीच में ही छुड़ा दी है। इसी तरह से कई मामलों में प्राथमिक विद्यालय को माध्यमिक विद्यालयों के साथ विलय कर दिया गया है। यहां छोटे बच्चों के लिए न तो शौचालय हैं और न ही कोई जगह। दलित बच्चे और गरीब बच्चे स्कूल छोडक़र अब कूड़ा बीनते नजर आते हैं और जुआ खेलते दिखाई देते हैं। जितने हक उन्होंने हासिल किए थे वे एक ही आदेश से खत्म हो गए।
बच्चे स्कूल पर पढ़ रहे हैं, यह तो कानून का उल्लंघन है
सरासर उल्लंघन है। लेकिन सरकारें सुने तब ना। वह तो शिक्षा को बिजनेस बनाने पर तुली है। कल्याणकारी भाव तो खत्म हो गया है। गरीब के बच्चों को शिक्षा से महरूम किया जा रहा है।

गरीब के बच्चे

जगदीश ज्वलंत 

शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत शासन ने तय कर लिया कि गरीबी हटाने से अच्छा है गरीब के बच्चों को अमीरों वाले स्कूलों में भर्ती कर दिया जाए। गरीबी न मिटे न सही, गरीबी की हीन-भावना तो मिट जाएगी।

इंग्लिश स्कूल की लकधक मैम चिंचियाते बच्चों को समझाती है, ‘देखो, कल से कुछ गरीब के बच्चे अपने स्कूल में आएंगे। उन्हें प्रेम से अपने पास बिठाना है। उन्हें परेशान नहीं करना, समझे?’

‘मैम, वे कैसे होते हैं? हमें काट खाएंगे तो? कल ही पिंकी को एक कौए ने चोंच मार दी थी…।’

‘ओफ्फो! हनी, गरीब आदमी होते है। जैसे हम हैं वैसे वे भी हैं।’

‘तो वे इतने दिनों से कहां थे? और यहां क्यों आएंगे?

‘इन सब बातों का जवाब प्रिंसिपल मैम के पास है। बस, इतना ध्यान रखने का कि उन्हें देखकर किसी को हंसने का नहीं। चुप रहने का।’

‘मैम, ये स्वीटी पूछ रही है कि हम उन्हें हाथ लगा सकते हैं कि नहीं?’

‘चलो, फालतू बातें बंद करो और पीछे की पंक्ति के सारे चिल्ड्रेन आगे बैठेंगे। उस लाइन का रिजर्वेशन हो चुका है। उस पर गरीब बच्चे ही बैठेंगे।’

सभी बच्चों में जिज्ञासा है। कैसे होते होंगे गरीब के बच्चे? लकी अपने साथियों को समझाता है, एक बार मैं गांव गया था। वहां देखा मैंने एक गरीब का बच्चा। हुआ ये कि मैंने आम के पेड़ के नीचे से एक कच्चा आम उठाया कि वो पेड़ पर से ही कूदा-धम्म्‌। अंडरवियर गायब। बड़े-बड़े बाल और लंबे-लंबे नाखून। बोला, ‘केरी दे नी तो लबूरी दूंगा।’ मैं समझा ये कुछ देने का कह रहा है। मैंने भी कहा, ‘हां दे!” उसने झट बंदर की तरह अपने नाखूनों से मुझे नोंच दिया।’

यह सुनकर स्वीटी रोने लगी। लकी ने उसे समझाते हुए कहा, ‘डर मत स्वीटी, मैम ने उन्हें इसीलिए पीछे बैठाया है। और मैम की लेंग्वेज उनकी समझ में थोड़े ही आना है। वे अलग ही बोली बोलते हैं। उनके पास न पॉकेट-मनी होती है, न ही लंच-बॉक्स। खाद की थैली में तो किताबें रखते हैं और उसी में पानी की लिकेज बॉटल। अपनी मैडम जब इनको होमवर्क देगी तो ये तो क्या इनके पेरेंट्स भी नहीं कर पाएगे। और जब क्वेश्चन पूछेंगी ना, तो दो दिन में नौ दो ग्यारह हो जाएगे। पापा बता रहे थे कि ये सरकारी में समा नहीं रहे हैं। व्यवस्था नहीं है सरकार के पास। न टीचर, न स्कूल। और पढ़ाना सभी को है। कानूनन मजबूरी है। इसीलिए इनको कॉन्वेंट में डालकर सरकार इनके मजे ले रही है। सभी कल देखना कितने मजे आते हैं। वैसे पापा कहते थे उनका मजाक मत उड़ाना, पाप पड़ता है।”

पूरी कक्षा में सन्नाटा पसरा है। गरीब के बच्चे आ चुके हैं। पिछली पंक्ति में वे डरे-सहमे ऐसे बैठे हुए हैं कि जैसे कुछ अप्रत्याशित घटने वाला है। उनके पालक पुनः चार बजे संभाल लेने का आश्वासन देकर मेन गेट के बाहर खड़े उधर ही देख रहे हैं। कक्षा के सभी बच्चे पीछे देखने को आतुर हैं। कुछ तो कनखियों से देख भी रहे हैं। पल-पल दहशत-अब क्या होगा! क्लास टीचर चश्मे की संधि से उन्हें झांक रही है। आंखों से उनकी गहराई से पड़ताल की जा रही है। एक अपराध-बोध स्पष्ट झांक रहा है। सभी बच्चों के चेहरे पर। नवागंतुक बच्चों के परिचय की प्रक्रिया प्रारंभ हो रही है।

‘काना पिता नग्गा कौन है? यहां आओ…’काना खड़ा होता है। मुंह तो धोया किंतु पोंछना भूल गया। मटमैली लकीरों में भाग्य की लकीरें छुप-सी गई हैं। बालों में तेल डाला, किंतु कंघी करना भूल गया। यक्ष प्रश्न-से खड़े हैं बाल। फफककर रो देने के सारे भाव दबाते हुए शेर के निकट जा रहे खरगोश की भांति बेचारा काना पहुंच चुका है। मैडम की आंखों से तीर की भांति निकलती अधिकार, अधिनियम की धाराएं चीर डालना चाहती हैं उस मासूम में छुपी संभावनाओं को।’ ‘वॉट इज योर नेम..?’ बगले झांक रहा रहा काना।
तोते-सा हंस रहा है रट्टू-समुदाय। ‘साइलेंट…हंसने का नहीं।’ मैडम के निर्देश पर सभी की हंसी मुस्कुराहट में बदल जाती है। काना खेत में खड़े वजूके-सा खड़ा है। उसने अधिकार तो पा लिया किंतु स्थान नहीं मिल पाया। एबीसीडी, दस तक पहाड़े, शब्द ज्ञान से उपजे भ्रम ने आज उसे यहां पहुंचा दिया। लेकिन यहां तो सबसे हटकर और भी बहुत कुछ चाहिए जो उसकी पकड़ की परिधि से कोसों दूर है। हवाइयां उड़ रही है। उसकी आंखें पिछली पंक्ति पर जमीं हुई है, जहाँ उसके सजातीय बेसब्री से स्वयं का क्रम न आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अपने इलाके का होनहार काना अपना-सा मुंह लेकर अपने स्थान पर पहुंच जाता है।

‘भेरू पिता पूरा कौन है? चलो यहां आओ…।’ अब भेरू आता है। नजर न लगे, इसलिए उसकी दादी ने काजल अलग लगा दिया। शर्ट का ऊपरी बटन न होने से सारा क्रम बिगड़ गया। शर्ट एक ओर छोटी है, दूसरी ओर बड़ी। नेकर की चेन को भी आज ही बिगड़ना था। पुलिसिया परेड जारी है। सब कुछ दांव पर लगाकर खड़ा है भेरू।

‘एप्पल मीन्स..?’ पूछती है मैम। आंखें फाड़े हकबकाया भेरू मुंह तक रहा है मैडम का। काऊ मीन्स..?’ दूसरा प्रश्न पूछती है मैम। होता तो गाय है किंतु क्या पता यहां क्या होता है। भेरू न बोलने में ही अपनी भलाई समझता है, जैसे पहले काना ने समझी थी। मान-अपमान से परे हो चुकी है, पिछली पंक्ति। बस, भय यही है कि कोई मार-पिटाई न कर दे। ‘नेक्स्ट, गणपत पिता शंकर…’इतने में ही घंटी बज जाती है। पिछली पंक्ति की खुशी का ठिकाना नहीं है। साथ ही यह भय भी बना हुआ है कि कल क्या होगा?